Middle East Conflict Impact India Pharma Industry: मिडिल ईस्ट में चल रहे इजरायल-ईरान तनाव का असर अब दुनिया के कई देशों पर दिखने लगा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। खासकर रोजमर्रा की जरूरतों से जुड़े उत्पादों पर इसका प्रभाव महसूस किया जा रहा है। इनमें आम लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयां भी शामिल हैं। दवा कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय हालात बिगड़ने के कारण कच्चे माल की कीमतों में तेज उछाल आया है। इसके अलावा शिपिंग में देरी, कंटेनरों की कमी और माल भाड़ा बढ़ने से दवा उत्पादन की लागत लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में दवा उद्योग ने सरकार और राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण से अस्थायी राहत देने की मांग की है।
Middle East Conflict Impact India Pharma Industry: दवा कंपनियों ने कीमत बढ़ाने की मांगी अनुमति

- फार्मा कंपनियों का कहना है कि मौजूदा स्थिति को देखते हुए ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) 2013 के नियमों में कुछ समय के लिए ढील दी जानी चाहिए।
- भारत में कई जरूरी दवाओं की कीमतें सरकार के नियंत्रण में होती हैं और इन्हें एनपीपीए तय करता है।
- दवा उद्योग से जुड़े संगठनों का कहना है कि कच्चे माल और परिवहन की लागत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन कंपनियों को दवाओं की कीमत बढ़ाने की अनुमति नहीं है।
- ऐसे में कंपनियों के लिए उत्पादन जारी रखना मुश्किल हो सकता है।
- इसी वजह से उद्योग ने सरकार से अपील की है कि विशेष परिस्थितियों को देखते हुए सीमित समय के लिए दवाओं की कीमतों में कुछ बढ़ोतरी की अनुमति दी जाए, ताकि उत्पादन प्रभावित न हो।
Rise in Raw Material Prices: कच्चे माल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी
- दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कई कच्चे पदार्थ पेट्रोकेमिकल्स से तैयार किए जाते हैं।
- अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोकेमिकल्स की कीमत बढ़ने का सीधा असर फार्मा उद्योग पर पड़ रहा है।
- उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों के अनुसार पिछले एक सप्ताह में कुछ कच्चे माल की कीमतों में लगभग 30 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है।
- कुछ मामलों में यह बढ़ोतरी इससे भी ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर ग्लिसरीन की कीमत पिछले कुछ महीनों में करीब 64 प्रतिशत तक बढ़ गई है।
- वहीं पैरासिटामोल बनाने की लागत में भी लगभग 26 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई है। कच्चे माल के महंगे होने से दवा बनाने की कुल लागत में बड़ा इजाफा हो रहा है।
शिपिंग और कंटेनर की कमी भी बनी चुनौती
दवा कंपनियों के सामने सिर्फ कच्चे माल की महंगाई ही समस्या नहीं है। अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स से जुड़ी दिक्कतें भी बढ़ती जा रही हैं। समुद्री मार्गों में बढ़ते तनाव और सुरक्षा जोखिमों की वजह से शिपिंग में देरी हो रही है। इसके अलावा कंटेनरों की कमी और माल भाड़े में बढ़ोतरी ने कंपनियों की परेशानी और बढ़ा दी है। फार्मा कंपनियों का कहना है कि इन परिस्थितियों में उत्पादन और आपूर्ति की योजना बनाना काफी कठिन हो गया है। यदि हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहते हैं तो बाजार में दवाओं की उपलब्धता भी प्रभावित हो सकती है।
कम स्टॉक से बढ़ रही चिंता
- दवा उद्योग के प्रतिनिधियों के मुताबिक अधिकांश कंपनियां “जस्ट-इन-टाइम” इन्वेंट्री सिस्टम पर काम करती हैं।
- इस सिस्टम में कंपनियां बहुत ज्यादा स्टॉक नहीं रखतीं और जरूरत के अनुसार कच्चा माल मंगाती हैं।
- ऐसे में अगर मौजूदा संघर्ष 10 से 15 दिन और जारी रहता है तो कई जरूरी दवाओं की सप्लाई प्रभावित हो सकती है।
- उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि स्थिति बिगड़ने पर बाजार में कुछ दवाओं की कमी भी देखने को मिल सकती है।
Dollar Impact on Pharma Imports: निर्यात और वैश्विक बाजार पर असर

- भारत दुनिया के कई देशों को किफायती और अच्छी गुणवत्ता वाली दवाएं निर्यात करता है।
- खासकर यूएई, सऊदी अरब और ओमान जैसे देश भारतीय दवाओं पर काफी हद तक निर्भर हैं।
- यदि उत्पादन लागत लगातार बढ़ती रही या आपूर्ति प्रभावित हुई तो इसका असर केवल भारत ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार पर भी पड़ सकता है।
- इसलिए उद्योग संगठनों ने सरकार से राहत पैकेज और नीतिगत सहयोग पर विचार करने की अपील की है।
सरकार से सब्सिडी और राहत की मांग
- फार्मा उद्योग का कहना है कि एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडिएंट्स, सॉल्वेंट्स और पैकेजिंग सामग्री की कीमतों में 30 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी हो चुकी है।
- इससे उत्पादन लागत काफी बढ़ गई है।
- इन परिस्थितियों को देखते हुए उद्योग ने सरकार से मांग की है कि छोटे और मध्यम स्तर के फार्मा निर्यातकों को बढ़ती लॉजिस्टिक्स लागत से राहत देने के लिए फ्रेट यानी परिवहन सब्सिडी दी जाए।
- साथ ही दवा मूल्य नियंत्रण नियमों में अस्थायी ढील देकर कंपनियों को उत्पादन जारी रखने में मदद की जाए, ताकि आम लोगों तक जरूरी दवाओं की आपूर्ति बनी रह सके।
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