Delhi News : दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने 6.495 किलोग्राम वजन और लगभग 9.90 करोड़ रुपए की कीमत वाली 23 सोने की चेन की तस्करी मामले में आठ आरोपियों को जमानत दे दी है। आरोपियों की जमानत अर्जी स्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी भी आरोपी के पास से सोना बरामद नहीं हुआ और ना ही पुलिस बरामद सोने से उन्हें जोड़ने वाला कोई स्वतंत्र सबूत पेश कर सकी। पटियाला हाउस कोर्ट के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने बीएनएसएस की धारा 480 के तहत दायर आठ ज़मानत याचिकाओं पर यह आदेश दिया। आरोपियों की ओर से अधिवक्ता प्रदीप राणा और अधिवक्ता मोहित मलिक पेश हुए।
आरोपियों को गैर कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया
आरोपियों की ओर से पेश अधिवक्ता प्रदीप राणा ने कहा कि आरोपियों को औपचारिक तौर पर गिरफ्तार करने से पहले गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया और इस दौरान उनके हिंसा और अमानवीय व्यवहार किया गया। उन्होंने मेडिकल जांच रिपोर्ट में दिख रही चोटों और निशानों का हवाला देते हुए कहा कि कस्टम्स एक्ट की धारा 108 के तहत दर्ज बयान स्वेच्छा से नहीं, बल्कि दबाव में लिए गए थे। बचाव पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपियों से पहले से लिखे हुए दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए थे। अधिवक्ता प्रदीप राणा ने दलील दी कि कस्टम्स का मामला मुख्य रूप से दुबई में कथित तौर पर की गई एक व्यवस्था के बारे में अटकलों और अनुमानों पर आधारित है।
इस व्यवस्था के तहत, सिक्योरिटी एरिया से पहले आरोपियों के बीच सोने की चेन बांटी गई थीं और बाद में मुख्य आरोपी ने उन्हें वापस ले लिया था। उन्होंने यह भी बताया कि किसी भी आरोपी के शरीर, सामान या कब्ज़े से, या उनके बताए अनुसार कोई सोना बरामद नहीं हुआ था। उन्होंने यह भी दलील दी कि मुख्य आरोपी के घर की तलाशी लेने पर कस्टम्स की कार्यवाही से जुड़े सोने से संबंधित कोई भी आपत्तिजनक चीज बरामद नहीं हुई। कथित प्रतिबंधित सामान पहले ही ज़ब्त किया जा चुका था और आरोपियों के पासपोर्ट और मोबाइल फोन भी विभाग की कस्टडी में थे, जबकि यात्री, इमिग्रेशन, फ्लाइट और सीसीटीवी रिकॉर्ड जांचकर्ताओं के पास उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड थे।
कोर्ट ने गवाहों को प्रभावित करने की आशंका की खारिज
आरोपियों की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए कोर्ट ने अभियोजन पक्ष की इस आशंका को खारिज कर दिया कि आरोपी गवाहों को प्रभावित कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी चिंताओं का समाधान उचित ज़मानत शर्तों के माध्यम से किया जा सकता है, जिसमें सह-आरोपियों या गवाहों को धमकाने, प्रभावित करने या उकसाने के खिलाफ प्रतिबंध शामिल हैं। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि सभी आरोपी 23 सितंबर से न्यायिक हिरासत में हैं और उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है। साथ ही कोर्ट को ऐसा कोई ठोस सबूत भी नहीं मिला जिससे लगे कि वे भाग सकते हैं या उन्होंने पहले जांच में बाधा डालने की कोशिश की है।


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