वन्यजीवों के लिए 218 जलस्रोत विकसित, सिरसा बोले – “उद्देश्य क्षतिग्रस्त भू-खंडों को वन पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित करना”

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Delhi : दिल्ली सरकार के वन एवं वन्यजीव विभाग द्वारा असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य में बड़े पैमाने पर पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (इको-रिस्टोरेशन) और वन्यजीव संरक्षण के कार्य तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह अभयारण्य न केवल राजधानी की महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर है, बल्कि अरावली पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग भी है। विभाग क्षतिग्रस्त खनन क्षेत्रों को फिर से समृद्ध वन क्षेत्रों में बदलने की दिशा में वैज्ञानिक तरीके से काम कर रहा है।वन्यजीव संरक्षण को मजबूत बनाने के लिए अभयारण्य में 218 जलस्रोत (वाटर होल) विकसित किए गए हैं। इन जलस्रोतों को वन्यजीवों के आवागमन मार्गों के निकट रणनीतिक रूप…

Delhi : दिल्ली सरकार के वन एवं वन्यजीव विभाग द्वारा असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य में बड़े पैमाने पर पारिस्थितिक पुनर्स्थापन (इको-रिस्टोरेशन) और वन्यजीव संरक्षण के कार्य तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। यह अभयारण्य न केवल राजधानी की महत्वपूर्ण प्राकृतिक धरोहर है, बल्कि अरावली पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न अंग भी है।

विभाग क्षतिग्रस्त खनन क्षेत्रों को फिर से समृद्ध वन क्षेत्रों में बदलने की दिशा में वैज्ञानिक तरीके से काम कर रहा है।वन्यजीव संरक्षण को मजबूत बनाने के लिए अभयारण्य में 218 जलस्रोत (वाटर होल) विकसित किए गए हैं। इन जलस्रोतों को वन्यजीवों के आवागमन मार्गों के निकट रणनीतिक रूप से बनाया गया है, ताकि विशेषकर ग्रीष्मकाल में जानवरों को पर्याप्त पेयजल उपलब्ध हो सके।

नियमित रूप से स्वच्छ जल उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है, जिससे वन्यजीवों की प्यास बुझाने के साथ-साथ उनके आवास की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है। दक्षिणी रिज क्षेत्र में 10 लाख से अधिक देशी पौधों का रोपण करने की योजना बनाई गई है। यह अभियान अरावली के प्राकृतिक स्वरूप को पुनर्स्थापित करने और दिल्ली के हरित आवरण को बढ़ाने में महत्वपूर्ण साबित होगा।

दक्षिणी रिज क्षेत्र में 10 लाख से अधिक देशी पौधों का रोपण किया जाएगा : सिरसा

पर्यावरण, वन एवं वन्यजीव मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने कहा, “असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य दिल्ली की सबसे महत्वपूर्ण पारिस्थितिक धरोहरों में से एक है। हमारा उद्देश्य केवल वृक्षारोपण नहीं, बल्कि वैज्ञानिक तरीकों से क्षतिग्रस्त भू-खंडों को वन पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित करना है, जो वन्यजीवों को संरक्षण प्रदान करें, वायु गुणवत्ता सुधारें और दिल्ली के पर्यावरण को सुदृढ़ बनाएं।”

मंत्री ने आगे बताया कि विभाग का वैज्ञानिक इको-रिस्टोरेशन कार्यक्रम पूर्व खनन क्षेत्रों और क्षतिग्रस्त भूमि को देशी प्रजातियों के माध्यम से पुनर्जीवित कर रहा है। इसमें उचित प्रजातियों का चयन, वैज्ञानिक योजना, नियमित निगरानी और दीर्घकालिक रखरखाव पर विशेष जोर दिया जा रहा है। अभयारण्य परिसर में स्थित भारत नर्सरी में वर्तमान में लगभग 6 लाख देशी पौधों का संवर्धन किया जा रहा है। इन पौधों का उपयोग वृक्षारोपण कार्यक्रमों, आवास पुनर्स्थापन, शहरी हरितीकरण तथा आम नागरिकों को निःशुल्क वितरण के लिए किया जाएगा।

हाल ही में कैमरा ट्रैप और फील्ड सर्वेक्षणों में अभयारण्य में भारतीय तेंदुआ, धारीदार लकड़बग्घा, चीतल, साही, विभिन्न सरीसृप और अनेक पक्षी प्रजातियों की उपस्थिति दर्ज की गई है। बर्ड वॉचिंग ट्रेल, प्राकृतिक जल निकायों के संरक्षण और वृक्षारोपण प्रबंधन जैसी गतिविधियां भी लगातार संचालित हो रही हैं। कुछ समय पहले मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा के साथ असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य का दौरा किया।

सरकार अगले माह में ‘क्लीन दिल्ली, ग्रीन दिल्ली’ जन अभियान करेगी शुरू

मुख्यमंत्री ने नीली झील, तेंदुए, हिरण, नीलगाय और विविध पक्षी प्रजातियों से समृद्ध इस क्षेत्र की सराहना की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधारोपण करते हुए उन्होंने प्रकृति से जुड़ाव पर जोर दिया।कैबिनेट मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा ने घोषणा की कि दिल्ली सरकार आगामी जुलाई माह में ‘क्लीन दिल्ली, ग्रीन दिल्ली’ जन अभियान शुरू करेगी।

इस अभियान के तहत पूरे शहर में 70 लाख पौधे लगाने का लक्ष्य रखा गया है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, संस्थानों और आम नागरिकों की भागीदारी से इसे जन आंदोलन का रूप दिया जाएगा। असोला भाटी वन्यजीव अभयारण्य में चल रहे ये कार्य राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरणीय स्थिरता को मजबूत करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये प्रयास निरंतर जारी रहे तो दिल्ली का अरावली क्षेत्र न केवल वन्यजीवों का सुरक्षित आवास बनेगा, बल्कि पूरे शहर के लिए स्वच्छ हवा और बेहतर जलवायु का प्राकृतिक कवच भी साबित होगा। ये पहलें साबित करती हैं कि विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं, बशर्ते इरादे सही और प्रयास वैज्ञानिक हों।

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