यमुना की मछलियों में मिले माइक्रोप्लास्टिक कण. स्वास्थ्य जोखिम की आशंका

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Health News : यमुना नदी में मछलियों में पाए जा रहे ‘माइक्रोप्लास्टिक’ से तंत्रिका तंत्र में सूजन, चीजों को याद रखने की क्षमता में कमी और कोशिकाओं को नुकसान जैसी दीर्घकालिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा उत्पन्न हो सकता है। चिकित्सकों ने यह जानकारी दी। दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा चिकित्सकों ने यह चेतावनी यमुना की मछलियों में ‘माइक्रोप्लास्टिक’ के व्यापक प्रदूषण का खुलासा करने वाले एक हालिया अध्ययन के बाद दी। यह अध्ययन दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग की ‘फिश मॉलिक्यूलर बायोलॉजी लेबोरेटरी’ के शोधकर्ताओं ने किया है। ”भारत की यमुना नदी में…

Health News : यमुना नदी में मछलियों में पाए जा रहे ‘माइक्रोप्लास्टिक’ से तंत्रिका तंत्र में सूजन, चीजों को याद रखने की क्षमता में कमी और कोशिकाओं को नुकसान जैसी दीर्घकालिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का खतरा उत्पन्न हो सकता है। चिकित्सकों ने यह जानकारी दी।

दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा

चिकित्सकों ने यह चेतावनी यमुना की मछलियों में ‘माइक्रोप्लास्टिक’ के व्यापक प्रदूषण का खुलासा करने वाले एक हालिया अध्ययन के बाद दी। यह अध्ययन दिल्ली विश्वविद्यालय के प्राणी विज्ञान विभाग की ‘फिश मॉलिक्यूलर बायोलॉजी लेबोरेटरी’ के शोधकर्ताओं ने किया है। ”भारत की यमुना नदी में मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक के पर्यावरणीय कारक और जैव-संचयन के मार्ग” शीर्षक वाला यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘माइक्रोप्लास्टिक्स’ में प्रकाशित हुआ है।

शोधकर्ताओं ने बताया कि यह अध्ययन प्रोफेसर राम कृष्ण नेगी के मार्गदर्शन में लगभग चार वर्षों तक किया गया। अध्ययन का नेतृत्व पीएचडी शोधार्थी एवं सीएसआईआर की सीनियर रिसर्च फेलो स्नेहा सिवाच ने प्रयोगशाला के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर किया। शोधकर्ताओं ने हरियाणा और दिल्ली में यमुना नदी के चार स्थानों से एकत्रित मीठे पानी की 12 प्रजातियों की 220 मछलियों का विश्लेषण किया।

220 मछलियों में मिले 1,678 माइक्रोप्लास्टिक कण

शोधकर्ताओं को इस दौरान मछलियों में 1,678 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले। शोधकर्ताओं के अनुसार, यमुना के दिल्ली क्षेत्र से एकत्रित मछलियों में नदी के उद्गम स्थल की ओर के हिस्सों की तुलना में ‘माइक्रोप्लास्टिक’ का स्तर काफी अधिक पाया गया। उन्होंने बताया कि यह अपनी तरह का पहला वैज्ञानिक अध्ययन है, जो भारत के मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में ‘माइक्रोप्लास्टिक’ प्रदूषण, उससे जुड़े पारिस्थितिक जोखिम और खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव संबंधी आंकड़े उपलब्ध कराता है।

अध्ययन के अनुसार, मछलियों के जठरांत्र (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल) तंत्र में माइक्रोप्लास्टिक की सर्वाधिक मात्रा पाई गई, इसके बाद गलफड़े (गिल्स) और मांसपेशियों में इसकी मौजूदगी दर्ज की गई। अध्ययन में पाया गया कि मछलियों में पाये गए माइक्रोप्लास्टिक में लगभग 78 प्रतिशत हिस्सा कपड़ा-जनित रेशों का था, जबकि पॉलीथिलीन और पॉलीप्रोपिलीन सबसे अधिक पाए जाने वाले पॉलिमर के प्रकार थे।

विशेषज्ञों ने जताया स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा पर खतरा

शोधकर्ताओं के अनुसार, बरामद पॉलिमर मिश्रण को उच्च पारिस्थितिकीय जोखिम वाला माना गया। उन्होंने बताया कि माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषित नदी के पानी में मौजूद न्यूरोटॉक्सिन, भारी धातुओं और हार्मोन को प्रभावित करने वाले रसायनों को सोख सकते हैं और उन्हें शरीर तक पहुंचा सकते हैं।

चिकित्सक के अनुसार, इस तरह के संपर्क से मस्तिष्क में सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और तंत्रिका कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है, जिससे मस्तिष्क के कॉर्टिकल एवं सबकॉर्टिकल दोनों हिस्से प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि समय के साथ इन विषैले तत्वों के जमा होने से चीजों को याद रखने की क्षमता में कमी, तंत्रिका संबंधी विकार और ‘न्यूरोडीजेनेरेटिव’ बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। ‘न्यूरोडीजेनेरेटिव’ बीमारियों में मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र की कोशिकाएं धीरे-धीरे कमजोर या नष्ट होने लगती हैं।

Sumant Chaudhary