बंदूक छोड़ हाथों में थामी कॉफी की महक, पंडुम कैफे ने पेश की भय से भरोसे की अनूठी मिसाल

Summary :

Pandum Cafe Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के बस्तर मेंजहां कभी आईईडी के धमाकोंऔर गोलियों की गूंज से बारूद की गंध हवा में घुली रहती थी, आज वहां कॉफी की खुशबू फैल रही है। जगदलपुर शहर में कोतवाली थाना के पीछेलालबाग की ओर जाने वाली सड़क पर एक अनोखा कैफे खुला है जिसका नाम ‘पंडुम कैफे’ है। जो हाथ कभी बंदूक थामते थे, वे आज इस कैफे में कॉफी के साथ समोसापरोसते हैं। जो आंखें जंगल के अंधेरे में रास्ता ढूंढती थीं, वो आज एक रोशन भविष्य की ओर देख रही हैं। यह सिर्फ एक कैफे की कहानी नहीं है, बल्कि भय से…

Pandum Cafe Chhattisgarh: छत्तीसगढ़ के बस्तर मेंजहां कभी आईईडी के धमाकोंऔर गोलियों की गूंज से बारूद की गंध हवा में घुली रहती थी, आज वहां कॉफी की खुशबू फैल रही है। जगदलपुर शहर में कोतवाली थाना के पीछेलालबाग की ओर जाने वाली सड़क पर एक अनोखा कैफे खुला है जिसका नाम ‘पंडुम कैफे’ है। जो हाथ कभी बंदूक थामते थे, वे आज इस कैफे में कॉफी के साथ समोसापरोसते हैं। जो आंखें जंगल के अंधेरे में रास्ता ढूंढती थीं, वो आज एक रोशन भविष्य की ओर देख रही हैं। यह सिर्फ एक कैफे की कहानी नहीं है, बल्कि भय से विश्वास की एक ऐतिहासिक यात्रा है।

देश का पहला अनूठा प्रयोग

पंडुम कैफे देशभर में अपनी तरह का पहला प्रयोग है जहां पूर्व नक्सली और नक्सल हिंसा के पीड़ित कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हैं। यह पहल छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति का सबसे मानवीय चेहरा है। जो लोग कभी एकदूसरे के दुश्मन थे, आज एक साथ अपने ग्राहकों की सेवा कर रहे हैं।छत्तीसगढ़ सरकार की पुनर्वास नीति ने हजारों भटके कदमों को वापस मुख्यधारा से जोड़ा है, जहां अब उन्हें सम्मानजनक जीवन और नई पहचान मिल रही है। “पंडुम कैफे” इसी परिवर्तन की सजीव तस्वीर है।

मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने इस कैफे का शुभारंभ करते हुए कहा था, “जिन हाथों में कभी बंदूकें थीं, उनमें आज उम्मीदें हैं, भरोसा है और कुछ अच्छा करने का जुनून भी। यही है बदलता बस्तर।शांति, सम्मान और नए भविष्य की ओर बढ़ता बस्तर।”गोंडी बोली में ‘पंडुम’ का अर्थ होता हैउत्सव। बस्तर के लोग स्वभाव से उत्सवप्रिय हैं।इसी सांस्कृतिक जड़ से प्रेरणा लेकर आईजी सुंदरराज पी. ने एक क्रांतिकारी विचार को आकार दिया। आत्मसमर्पित नक्सलियों और नक्सल हिंसा के पीड़ितों को एक ही छत के नीचे लाकर रोजगार और सम्मान दिया।पंडुम कैफे की टैगलाइन है- ‘जहां हर कप एक कहानी कहता है।’यह टैगलाइन शब्दशः सच है। यहां परोसी गई हर प्याले की कॉफी सिर्फ स्वाद नहीं, बल्कि संघर्ष पर विजय और एक नई जिंदगी की दास्तान अपने साथ लेकर आती है।

हुनर मिला, भविष्य संवरा

कैफे में काम करने से पहले आत्मसमर्पित पूर्व नक्सलियों को धरमपुरा के प्रशिक्षण केंद्र में 45 दिनों का गहन प्रशिक्षण दिया गया। इस प्रशिक्षण में आतिथ्य सेवा, कैफे प्रबंधन, ग्राहक सेवा, स्वच्छता मानक, खाद्य सुरक्षा और उद्यमिता कौशल शामिल थे। रायपुर के ‘नुक्कड़ कैफे’ से जुड़े प्रियांक पटेल और तुपेश चंद्राकर ने इस पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

प्रियांक पटेल के मुताबिक “यहां काम करने वाले पूर्व नक्सलियों का रिस्पांस कमाल का है। जिसे भी जहां का काम सौंपा गया, पूरी दक्षता से कर रहे हैं। ऐसा लगता ही नहीं कि ये इतने साल समाज की मुख्यधारा से कटकर जंगलों में भटकते रहे हैं। मौका मिलने पर इन्होंने साबित कर दिया कि ये पेशेवर भी हैं।”

सबकी दर्द भरी दास्तां

पंडुम कैफे में काम करने वाले हर व्यक्ति का दर्दभरा अतीत है। लोहंडीगुड़ा ब्लॉक के चंदेला गांव निवासी पूर्व नक्सली पवन नाग कहते हैं-नक्सली अक्सर गांव आते थे और बड़ेबुजुर्गों को धमकाते थे कि बच्चों को स्कूल न भेजकर हमारे साथ भेजो। मैं जब 8वीं कक्षा में था बाल संघम में भर्ती हो गई। जंगल-जंगल भटकना पड़ता था, झाड़ियों में एक घंटा सो गए तो बहुत था।सरेंडर के बाद भविष्य का ठिकाना नहीं था। आईजीसाहब ने पहल की, 45 दिन का प्रशिक्षण मिला और अब पंडुम कैफे से जुड़कर भविष्य संवरने लगा है।

कुछ ऐसी ही कहानी फूलमती की है जिन्होंने जनवरी 2025 में आत्मसमर्पण किया। फूलतमती कहती हैं, “जब मैं 12 साल की थी तो नक्सली उठा ले गए थे। सालों जंगलों में भटके।दलम में रहते हुए शादी भी हुई। सरेंडर के बाद अब यह नया जीवन रास आ गया है। कोई डर नहीं, सम्मान मिलता है और काम करके मन को बेहद सुकून मिला है।” पूर्व नक्सली फगनी कहती हैं, “धमकियों के चलते दलम में शामिल होना मजबूरी थी। वहांबम बनाना भी सीखा। 2025 में सरेंडर के बाद यहां नई ज़िंदगी मिली। बारूद की जगह कॉफी परोसना और मेहनत की कमाई से जीना, यह अहसास शांति और सम्मान दे रहा है। यह हमारा पुनर्जन्म है।”

संघर्ष से सहयोग का मॉडल

पंडुम कैफे की सफलता ने यह साबित कर दिया है कि नक्सलवाद का स्थायी समाधान गोली से नहीं, बल्कि रोजगार, सम्मान और पुनर्वास से निकलता है। पंडुम कैफे में पुनर्वासित नक्सलियों और अन्य कर्मचारियों को फिलहाल 10-12 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन दिया जाता है। पुनर्वास नीति के तहत मिलने वाली सुविधाएं अलग हैं।पंडुम कैफे अब केवल बस्तर की नहीं, पूरे देश की प्रेरणा बन रहा है। देश के अन्य नक्सल प्रभावित राज्योंजैसे झारखंड,ओडिशा, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के लिए यह मॉडल पुनर्वास नीति की नई दिशा तय कर सकता है।
आईजी सुंदरराज पी. का कहना है, “हम चाहते हैं कि हथियार छोड़ने वालों और हथियार से डरने वालों के बीच की दूरी कम हो। पुनर्वास के बाद कैफे के माध्यम से ये युवा समाज की मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं, उनकी सोच में बदलाव आ रहा है और पूरे क्षेत्र में शांति व नए भविष्य की उम्मीद जग रही है।”

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Kajal Yadav

काजल यादव पत्रकारिता में पिछले 2 वर्षों से सक्रिय हैं। वास्तु, ट्रैवल , वायरल, हेल्थ और लाइफस्टाइल के अलावा आद्यात्मिक खबरें लिखना पसंद करती हैं। रामा विश्वविद्यालय (कानपुर) से बैचलर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद दीनार टाइम्स (कानपुर) से पत्रकारिता की शुरुआत करते हुए बत्तौर 'सोशल मीडिया' संभालने से लेकर 'वॉइस ओवर' के रूप में काम किया। वर्तमान में पंजाब केसरी दिल्ली में हिन्दी सब-एडिटर के तौर पर काम कर रही हैं। कानपुर में जन्म लेने वाली काजल की शिक्षा उनके गृह जिले में ही हुई है।