कोर्ट के आदेश के बाद भी अपनी जमीन खाली क्यों नहीं करा पा रहा डूसिब ?

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Court News : सुप्रीम कोर्ट व दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (डूसिब) द्वारा अपनी जमीनें खाली न करवा पाने पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। डूसिब अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कब्जाधारी की याचिका खारिज किए जाने के बाद जल्द ही कोर्ट के आदेश की अवमानना को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा। हांलाकि, सवाल उठ रहे हैं कि जब जमीन पर कब्जा जमाए कंपनियों को कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है तो फिर डूसिब जमीन खाली करवाने में क्यों नाकाम साबित हो रहा है।…

Court News : सुप्रीम कोर्ट व दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (डूसिब) द्वारा अपनी जमीनें खाली न करवा पाने पर अब सवाल खड़े होने लगे हैं। डूसिब अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा कब्जाधारी की याचिका खारिज किए जाने के बाद जल्द ही कोर्ट के आदेश की अवमानना को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाएगा।

हांलाकि, सवाल उठ रहे हैं कि जब जमीन पर कब्जा जमाए कंपनियों को कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली है तो फिर डूसिब जमीन खाली करवाने में क्यों नाकाम साबित हो रहा है। जब कोर्ट ने साफ तौर पर कंपनियों को जमीन खाली करने का आदेश दिया है तो फिर डूसिब जमीन खाली कराने के बजाए दोबारा कोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाना चाह रही है।

हाईकोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट भी खारिज कर चुका है याचिका

बता दें कि दिल्ली अर्बन शेल्टर इम्प्रूवमेंट बोर्ड (डूसिब) की ओर से अलॉट की गई जमीन पर कब्जे को लेकर लंबे समय से कानूनी जंग चल रही थी। इस मामले में हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी जमीन पर कब्जाधारी कंपनी कवात्रा हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड की याचिका को खारिज कर दिया था। इससे पहले 10 अगस्त को सिंगल जज के आदेश के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट ने भी ईश्वर कामधेनु रेस्टोरेंट प्राइवेट लिमिटेड, कवात्रा हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड, कवात्रा टेंट एंड कैटरर्स प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों को जमीन खाली करने के लिए एक सप्ताह का अतिरिक्त समय दिया था, जिसकी मियाद भी 17 अगस्त को ही खत्म हो चुकी है। इन कंपनियों की याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि कॉन्ट्रैक्ट के तहत व्यवस्था एक तय समय के लिए थी और कब्जा रखने वाले, एग्रीमेंट में तय अधिकतम समय-सीमा से ज्यादा समय तक कब्जा बनाए रखने का दावा नहीं कर सकते।

निवेश के नुकसान के आधार पर नहीं मिल सकती राहत: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की खंडपीठ ने इस दलील को भी खारिज कर दिया था कि ज़मीन पर कब्जा रखने वालों द्वारा किया गया निवेश या आर्थिक नुकसान की आशंका, कॉन्ट्रैक्ट की अवधि के बाद भी लाइसेंस जारी रखने का आधार नहीं बन सकती है। जिसकेबाद हाईकोर्ट ने कब्जाधारियों को पंडाल और अन्य ढांचों को हटाने और जगह खाली करने के लिए 10 अगस्त से एक हफ्ते का अतिरिक्त समय दिया था।

बता दें कि यह विवाद तब शुरू हुआ जब कॉन्ट्रैक्ट के आधार पर जमीन हासिल करने वाली कंपनियों ने लीज पूरी होने के बाद भी जमीन खाली करने से इनकार कर दिया था। उनका तर्क था कि समझौतों की धारा-6 के तहत, वे नई नीलामी, टेंडर प्रक्रिया पूरी होने और सफल बोलीदाताओं के साथ समझौते होने तक कब्जा बनाए रख सकते हैं।

हांलाकि दिल्ली हाई कोर्ट ने इस व्याख्या को खारिज कर दिया और कहा कि इस धारा में डूसिब द्वारा समझौतों को ज्यादा से ज्यादा छह महीने तक बढ़ाने की बात कही गई थी, अगर मूल अनुबंध की अवधि खत्म होने तक नई नीलामी प्रक्रिया पूरी नहीं हुई हो। चूंकि कब्जा करने वाले पहले ही छह महीने का अधिकतम विस्तार ले चुके थे, इसलिए बेंच ने माना कि वे सिर्फ इसलिए और विस्तार नहीं मांग सकते कि नई टेंडर प्रक्रिया अधूरी रह गई थी।

डूसिब के प्रधान निदेशक पी.के.झा ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी जमीन न खाली करने वाली कंपनियों के खिलाफ हम जल्द ही अवमानना की कार्रवाई की मांग को लेकर तीन से चार दिनों में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करेंगे।

 

Sumant Chaudhary