भारत के राज्यों में चल रहे चुनावों की तस्वीर

भारत एक ऐसा संघीय ढांचे का देश है जिसे राज्यों का संघ ( यूनियन आफ इंडिया ) कहा जाता है अतः इसके विभिन्न राज्यों में जो भी घटनाएं होती हैं उनका असर सीधे इसकी संघीय व्यवस्था पर पड़ता है। हमने अपने संविधान की मार्फत स्वतन्त्र होने पर जो त्रिस्तरीय प्रशासनिक राजनीतिक ढांचा खड़ा किया उसमें राज्यों की विधानसभा और राष्ट्र की संसद के चुनाव ही राजनीतिक आधार पर लड़े जाते हैं जबकि स्थानीय निकायों को चुनावों को सैद्धान्तिक रूप से गैर राजनीतिक रखा गया है। इसकी वजह यही है कि स्थानीय ​िनकायों जैसे नगर पालिका व नगर निगम का मुख्य कार्य नागरिकों की दैनन्दिन की आवश्यक व मूलभूत सुविधायों को मुहैया करना होता है जिनके निपटारे के लिए किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा की जरूरत नहीं होती। फिर भी इनके चुनावों को राजनीतिक पहचान आगे रख कर लड़ने से कोई मनाही नहीं होती। वैसे तो लोकसभा व विधानभा के चुनावों मे भी कोई भी नागरिक निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर भी खड़ा हो सकता है और जीत कर सदन में भी पहुंच सकता है, परन्तु सरकार के गठन के समय किसी एक दल या कुछ दलों के गठबन्धन के बहुमत की आवश्यकता होती है जिसकी वजह से राजनीतिक दलों की इन चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। भारत में समय–समय पर चुनाव होते रहते हैं। इनमें सबसे ज्यादा राज्यों के चुनाव होते हैं, क्योंकि इनकी संख्या दो दर्जन से भी अधिक है। इस अप्रैल महीने में चार राज्यों केरल, तमिलनाडु, असम व पश्चिम बंगाल में चुनाव हो रहे हैं और एक केन्द्र शासित राज्य पुडुचेरी में भी उसकी सीमित अधिकार वाली विधानसभा के लिए चुनाव होना है। इन पांचों राज्यों में से केवल एक असम में ही केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी की सरकार है जबकि केरल में वामपंथी मोर्चे की सरकार है, तमिलनाडु में यहां की प्रभावशाली द्रविड़ पार्टी द्रमुक की सरकार है और प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। इन तीनों राज्यों में शासन करने वाली सभी पार्टियां केन्द्र में गठित विपक्षी गठबन्धन इंडिया की सदस्य हैं, परन्तु केरल व प. बंगाल में इस गठबन्धन की पार्टियां आपस में ही एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं, जबकि तमिलनाडु में द्रमुक का कांग्रेस के साथ गठबन्धन है। इससे भारतीय राजनीतिक व्यवस्था की उस विविधता का पता चला है जो केन्द्र व राज्य स्तर पर अपना स्वरूप बदलने में जरा भी संकोच नहीं करती। यह इस बात का भी प्रमाण है कि राष्ट्र व राज्य स्तर पर राजनीतिक दलों की वरीयताएं बदल जाती हैं। इसे हम भारतीय राजनीति की कमजोरी कदापि नहीं मान सकते, बल्कि यह राजनीति की एेसी शक्ति कही जा सकती है जिसमें क्षेत्रीय आकांक्षाओं की आपूर्ति के लिए राजनीतिक दलों के भीतर ही अन्तर्द्वन्द मच जाता है और वे परस्पर विरोधी रुख अपना लेते हैं। इसीलिए हम देख रहे हैं कि केरल में मार्क्सवादी पार्टी के मुख्यमन्त्री पिनारी विजयन की कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी व मल्लिकार्जुन खड़गे घोर निन्दा कर रहे हैं और प. बंगाल में यह काम वहां के कांग्रेसी नेता अधीररंजन चौधरी ममता दीदी की सरकार की आलोचना करते रहते हैं, जबकि संसद के भीतर ये सभी दल एक–दूसरे की मदद के लिए खड़े रहते हैं, लेकिन दूसरा पक्ष यह भी है कि राज्य की राजनीति का सीधा असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ता है अतः केन्द्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी इनके के परस्पर विरोध को दिखाकर आसानी से अपने विमर्श को लोकप्रिय बना देती है। इस नजरिये से हम देखें तो इस बार भारतीय जनता पार्टी प. बंगाल में ममता दीदी के 15 साल पुराने शासन को उखाड़ने के लिए कटिबद्ध लगती है क्योंकि राज्य में वामपंथी पार्टियां व कांग्रेस पार्टी पूर्णतः शिथिल पड़ चुकी हैं। ममता दीदी चूंकि जमीनी राजनीति करते हुए ही सत्ता के शिखर तक पहुंची हैं अतः वह इस हकीकत का डट कर मुकाबला कर रही हैं और राज्य में हुए मतादाता सूची पुनरीक्षण के दौरान काटे गये लाखों मतदाताओं के नाम को ही उन्होंने एक चुनावी मुद्दा बना दिया है।
इसका कारण एक ही है कि भाजपा राज्य में वामपंथी दलों के ठंडे पड़ जाने के बाद एकमात्र विकल्प के रूप में उभरी है। 294 सदस्यीय विधानसभा में पिछली बार उसके 77 विधायक चुने गये थे और दोनों पार्टियों के मतों के बीच मुश्किल से दस प्रतिशत का अन्तर ही था। यह अन्तर 2024 के लोकसभा चुनावों में और घट गया था। अतः भाजपा का जोर इस बात पर है कि वह ममता दीदी के 15 साल लम्बे शासन के दौरान पैदा हुए जनारोष को उत्कर्ष पर ले जाये जिससे उसे प्राप्त होने वाले मतों में वृद्धि दर्ज हो और वह हर सीट पर तृणमूल कांग्रेस प्रत्याशी को मुकाबला दे सके। भाजपा अपनी चुनावी राजनीति में प्रतीकों का अधिकतम प्रयोग करने वाली सफल पार्टी मानी जाती है अतः उसने कोलकाता की भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी के खिलाफ अपने सबसे शक्तिशाली उम्मीदवार शुभेन्दु अधिकारी को उतार कर उनके चुनाव प्रचार को समूचे बंगाल के केन्द्र में खड़ा कर दिया है। जिससे ममता बनर्जी को अपनी निजी जीत के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा, परन्तु यह काम इतना सरल भी नहीं है क्योंकि प. बंगाल की राजनीति अन्य उत्तर व पश्चिमी राज्यों से भिन्न मानी जाती है। इस राज्य में लगातार 34 सालों तक वामपंथी दलों का शासन रहा है जिन्होंने कृषि के क्षेत्र में तो अच्छा काम किया मगर औद्योगिक क्षेत्र में बंगाल को पिछड़ा बना डाला ।
ममता दीदी अपने 15 साल के शासन में इस क्रम को बदल नहीं सकी है मगर वह बंगाली अस्मिता के भरोसे अपनी राजनीतिक गाड़ी खींच रही हैं और राज्य के स्वभावतः राजनीतिक लड़ाकू तेवरों को अपना जेवर बनाये हुए हैं। अतः मुकाबला बहुत कड़ा होने जा रहा है। जहां तक केरल का सवाल है तो भाजपा ने इस राज्य के कुछ हिस्सों में अपना प्रभाव जमाने में कामयाबी हांसिल की है जिसकी वजह से 2024 के लोकसभा चुनावों में उसकी एक सीट भी आ गई थी और स्थानीय निकायों के चुनावों में राजधानी तिरुवनन्तपुरम् के महापौर पद पर उसका प्रत्याशी जीता था। इससे भाजपा में जोश पैदा होना स्वाभाविक है जिसे प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी ने केरल का दौरा करके बढ़ाने की कोशिश की है। वैसे भाजपा यहां जनसंघ के जमाने से हिन्दू मुन्नानी संगठन के माध्यम से सक्रिय रही है। मगर तमिलनाडु में भाजपा ने क्षेत्रीय विपक्षी पार्टी अन्नाद्रमुक के साथ मिल कर एनडीए गठबन्धन तैयार किया है जिसमें कई आंचलिक द्रविड़ पार्टियां भी शामिल हैं। तीसरी ओर फिल्मी सितारे विजय भी अपनी पार्टी बना कर चुनावी मैदान में हैं, राज्य में फिल्मी हस्तियों जैसे एम.जी. रामचन्द्र व जयललिता के सफल राजनीतिज्ञ बनने का इतिहास मौजूद है जिसे देखते हुए कहा जा रहा है कि कुछ इलाकों में चुनावी लड़ाई त्रिस्तरीय हो सकती है और त्रिशंकु विधानसभा बन सकती है। परन्तु असम में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट मानी जा रही है, क्याेंकि यहां के भाजपाई मुख्यमन्त्री हेमन्त ​िबस्वा सरमा ने चुनाव को हर दृष्टि से संघीकृत कर दिया है जिसका लाभ भाजपा को मिलता नजर आ रहा है। यहां भाजपा का असली मुकाबला कांग्रेस पार्टी से हैं जिसने कई अन्य छोटे-छोटे समूहगत दलों के साथ गठबन्धन उसी तर्ज पर किया है जिस तर्ज पर भाजपा उत्तर भारत के राज्यों में करती है, लेकिन परिणाम जो भी निकले उनका असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ना लाजिमी है।

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