ब्यूरोक्रेसी का सिंहम् तुकाराम

Summary :

भारत जैसे विशाल देश में लोकतांत्रिक प्रणाली इसलिए भी अपनाई गई थी कि इसकी प्रशासनिक व्यवस्था इसकी भौगोलिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सुचारू ढंग से इस प्रकार चल सके कि हर क्षेत्र व प्रदेश के लोगों की स्थानीय आकांक्षाओं की आपूर्ति कारगर तरीके से हो सके जिससे उनका जीवन अपनी-अपनी विशिष्ट परिस्थितियों में आसान हो सके। इस क्रम में केन्द्र व राज्य सरकारों के अधिकारों की सूचियां बनाई गईं और प्रशासनिक दक्षता लाने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर अधिकारियों के चयन की चयन प्रणाली जैसे आई.ए. एस. व आई.पी.एस. शुरू की गई। आजाद भारत में राष्ट्रीय…

भारत जैसे विशाल देश में लोकतांत्रिक प्रणाली इसलिए भी अपनाई गई थी कि इसकी प्रशासनिक व्यवस्था इसकी भौगोलिक, सामाजिक व सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सुचारू ढंग से इस प्रकार चल सके कि हर क्षेत्र व प्रदेश के लोगों की स्थानीय आकांक्षाओं की आपूर्ति कारगर तरीके से हो सके जिससे उनका जीवन अपनी-अपनी विशिष्ट परिस्थितियों में आसान हो सके। इस क्रम में केन्द्र व राज्य सरकारों के अधिकारों की सूचियां बनाई गईं और प्रशासनिक दक्षता लाने के लिए अखिल भारतीय स्तर पर अधिकारियों के चयन की चयन प्रणाली जैसे आई.ए. एस. व आई.पी.एस. शुरू की गई। आजाद भारत में राष्ट्रीय एकता बनाये रखने के लिए इन आई.ए.एस. व आई.पी.एस. अधिकारियों को राज्य सरकारों की सेवा में प्रतिनियुक्त किया गया जिससे वे राज्य विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशासनिक प्रणाली को चुस्त–दुरुस्त बना सकें परन्तु भारत के नागरिकों की कुछ समस्याएं एेसी हैं जो अखिल भारतीय स्तर तक एक जैसी हैं।
वैसे आजकल संसद से लेकर सड़क तक पेपर लीक व शिक्षा प्रणाली पर जो कोहराम मचा हुआ है उससे हर नागरिक भलीभांति परिचित है परन्तु कुछ समस्याएं एेसी भी हैं जिनसे देश का हर नागरिक रोजाना दो-चार तो होता है मगर इनके खिलाफ पुरजोर आवाज नहीं उठा पाता और इसे आत्मसात करने को ही अपना भाग्य समझ बैठता है। एेसी ही एक विकट समस्या खाद्य पदार्थों में मिलावट की है जिससे लाखों लोग रोजाना अपने स्वास्थ्य का क्षरण होते देखते रहते हैं और कुछ न कर पाने की हालत में चुपचाप खून के आंसू रोते रहते हैं। खाद्य पदार्थों में अपमिश्रण की समस्या इतनी विकराल है कि मेडिकल आंकड़ों के अनुसार इसकी वजह से देश में कैंसर मरीजों तक की संख्या में भारी इजाफा हो रहा है। इसके अलावा लाखों की संख्या में लोग खाद्य अपमिश्रण के कारण पेट व अन्य गंभीर रोगों के मरीज बन रहे हैं। मगर मिलावट की हालत यह है कि भारत में नकली दवाइयां भी बिकती हुई पाई जाती हैं जिससे इस बुराई को दूर करने के लिए जब किसी राज्य का वरिष्ठ अधिकारी कानूनों का सख्ती से पालन करते हुए बिना राजनैतिक दबाव में आये। देखा जाता है तो वह आम जनता का हीरो बन जाता है और लोग उसे नौकरशाही ( ब्यूरोक्रेसी) का सिंहम् कहने लगते हैं। एेसे ही आई.ए.एस. अधिकारी हैं महाराष्ट्र के श्री तुकाराम मुंडे जिन्होंने महाराष्ट्र के खाद्य व औषध प्रशासन के आयुक्त का पद कुछ समय पहले ही संभाला है और उन्होंने इस पद पर बैठते ही मिलावटी खाद्य पदार्थों व औषधि निर्माताओं के खिलाफ तेज अभियान छेड़ दिया है। राज्य के रेस्टोरेंटों से लेकर होटलों तक में छापेमारी करके उन्होंने मिलावटी व हानिकारक पदार्थों की खपत को रोकने के लिए व्यापक अभियान चलाया हुआ है जिससे राज्य के लोग तो प्रसन्न हैं मगर राजनीतिज्ञों में कसमसाहट है। इसका कारण यह है कि वह जब किसी को कानून का उल्लंघन करते हुए पकड़ते हैं तो किसी की नहीं सुनते। हम अक्सर विभिन्न राज्यों से सुनते रहते हैं कि वहां नकली दूध या पनीर अथवा देशी घी बनाने के ठिकानों पर छापे मारे गये और अपमिश्रित माल जब्त किया गया। परन्तु महाराष्ट्र राज्य में इस बुराई के खिलाफ सतत् अभियान इसलिए प्रशंसनीय है कि इससे अन्य राज्यों की सरकारें भी सबक लेंगी और यथानुरूप कदम उठायेंगी। भारत में शासन की प्रणाली आधारभूत रूप से त्रिस्तरीय ( स्थानीय निकाय राज्य व केन्द्र स्तर) है। बेशक हम अपने वोट की ताकत से इनसे सम्बन्धित उच्च सदनों में अपने प्रतिनि​िध भेजते हैं मगर वे प्रतिनि​िध नीतियां व नियम बना कर उन्हें नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) की मार्फत लागू करते हैं। एक अर्थ में हम कह सकते हैं कि प्रशासन ब्यूरोक्रेसी ही चलाती है और वह भी संविधान की शपथ से बंधी होती है। अतः श्री मुंडे जब अपने कार्य को अंजाम देते हैं तो उनके सामने केवल संविधान ही रहता है। मगर उन जैसे अधिकारी पर राजनीतिज्ञों की गाज न गिरे एेसा कैसे हो सकता है? अतः पिछले 21 साल में उनके 25 तबादले हो चुके हैं। मगर उन्होंने इसकी कभी परवाह नहीं की और हर दायित्व पूरी निर्भीकता व निष्पक्षता के साथ निभाया। 2015 में जब वह शोलापुर के कलेक्टर थे तो उन्होंने ‘आषाढ़ी वारी धार्मिक यात्रा’ को सुचारू रखने के लिए यातायात नियम बहुत कठोर बना दिये थे। उस समय राज्य के राजस्व मन्त्री एकनाथ खडसे का काफिला इस यात्रा मार्ग पर आया था मगर उन्होंने इसे नियम तोड़ने की इजाजत नहीं दी थी जिसकी वजह से राज्य के राजनीतिज्ञों में रोष पैदा हो गया था और विधानसभा में राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता स्व. अजित पंवार ने उनकी कटु आलोचना करते हुए कहा था कि उन्हें चुने हुए जन प्रतिनिधियों का समुचित सम्मान करना चाहिए। मगर श्री मुंडे तो एेसे अधिकारी हैं जिन्होंने हाल ही में उच्च न्यायालय की एक कैंटीन पर छापा मारकर अपमिश्रित खाद्य पकड़ा और उसका लाइसेंस मुल्तवी कर दिया।
दरअसल भारत को आज एेसे अधिकारियों की बहुत जरूरत है जो सख्ती के साथ नियमों का पालन करें और अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से करवायें जिससे भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी लेकिन विधानसभा में आलोचना होने के बाद 2016 में श्री मुंडे का तबादला नवी मुम्बई के नगर निगम आयुक्त पद पर कर दिया गया। इस पद पर पहुंचते ही उन्होंने अवैध निर्माण, अवैध विज्ञापन पटों के खिलाफ व त्वरित सम्पत्ति कर वसूली के लिए अभियान छेड़ा।
महानगर की जनता ने इसे बहुत पसन्द किया। वह रोज सवेरे अवैध गतिविधियों का जायजा लेने के लिए पैदल निकल पड़ते थे और जनता भी उनके साथ होती थी जिससे नगर निगम के सदस्य उनसे नाराज हो गये और उनके खिलाफ सदन में अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दिया जिससे उन्हें पद मुक्त किया जा सके मगर तब मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फडणवीज ने इसे यह कह कर रोका कि वह गलत चीजों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर रहे हैं। कुछ दिन पहले ही पुणे की बाल गंघर्व रंग मन्दिर में एक सार्वजनिक कार्यक्रम था। उसमें भाग लेने जब तुकाराम मुंडे आये तो वहां मौजूद सभी लोग उनके सम्मान में उठ कर तालियां बजाने लगे। किसी सरकारी अधिकारी को एेसा सम्मान मुश्किल से ही नसीब होता है। वह राज्य के बीड जिले के एक गांव के एक गरीब किसान के यहां जन्में हैं। देश को उन जैसे कर्त्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की आज बहुत जरूरत है।

Aditya Chopra

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