अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत ने एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल करते हुए अपना पहला पूर्ण रूप से निजी ऑर्बिटल रॉकेट ‘विक्रम-1’ सफलतापूर्वक अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित कर दिया है। हैदराबाद स्थित अंतरिक्ष तकनीक स्टार्टअप, स्काई रूट एयरोस्पेस द्वारा विकसित इस रॉकेट ने श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरकर भारत को अमेरिका और चीन के बाद दुनिया का तीसरा ऐसा देश बना दिया है, जिसकी निजी कंपनियां स्वदेशी रॉकेट से उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचाने में सक्षम हैं।
विशेष बात यह है कि विक्रम-1 पूर्णतः स्वदेशी तकनीक का रॉकेट था, जिसे पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचा कर इस कंपनी के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने इतिहास रचा है, अंतरिक्ष को एक बार फिर खंगाला है तथा अनुसंधान को वाकई एक नया आसमान दिया है। मई 2020 में भारत सरकार ने घोषणा की थी कि सरकारी एकाधिकार वाले अंतरिक्ष क्षेत्र निजी भागीदारी के लिए खोला जाएगा। मात्र छह वर्षों में स्काई रूट एयरोस्पेस ने वह उपलब्धि हासिल कर ली। अंतरिक्ष से जुड़ी अर्थव्यवस्था को निजी क्षेत्र के लिए खोलने के बाद भारत ने इस दिशा में खूब प्रगति की है। 8.4 अरब डॉलर से ज्यादा की अर्थव्यवस्था बन चुके इस फील्ड में 400 से ज्यादा स्टार्टअप काम कर रहे हैं।
कई सरकारी और निजी फर्में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के साथ मिलकर काम कर रही हैं। इस काम के दायरे में रक्षा भी शामिल है जिससे अंतरिक्ष और सुरक्षा एक-दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश कर रहे हैं। स्वतंत्र भारत के इतिहास में अंतरिक्ष क्षेत्र पूरी तरह सरकार के अधिकार क्षेत्र में रहा। इसरो ही प्रक्षेपण यानों का निर्माण करता था, उपग्रह बनाता था और प्रक्षेपण स्थलों का संचालन करता था। निजी कंपनियां अधिक से अधिक पुर्जे बनाकर इसरो से ठेका मिलने की उम्मीद कर सकती थीं। यह व्यवस्था केवल अंतरिक्ष क्षेत्र तक सीमित नहीं थी।
दूरसंचार, कोयला, विमानन और बैंकिंग जैसे अनेक क्षेत्रों में भी दशकों तक यही सोच हावी रही कि कुछ क्षेत्र इतने रणनीतिक या पूंजी प्रधान हैं कि उन्हें निजी हाथों में नहीं सौंपा जा सकता। इसरो ने अंतरिक्ष में कई कीर्तिमान स्थापित किए हैं लेकिन निजी क्षेत्र को अनुमति देना और फिर एक निजी कंपनी द्वारा रॉकेट भेजने के संकल्प को साकार करना वाकई अद्भुत, अप्रतिम, अनिर्वचनीय है। इसरो पिछले कई दशकों से दुनियाभर में अपनी अपूर्व सफलताओं, किफायती मिशनों और तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए जाना जाता रहा है। अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़े रहे विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरिक्ष में उपग्रह भेजने या अन्य लक्ष्य प्राप्त करने का बाजार 60,000 से 90,000 करोड़ रुपए का है।
जाहिर है कि अवसरों के आसमान खुले हैं और इस क्षेत्र में भी रोजगार की संभावनाएं भरपूर हैं। निजी क्षेत्र की यह अंतरिक्ष सफलता अमेरिका और चीन के बाद भारत ने ही हासिल की है। कितना गर्व और गौरव महसूस होना चाहिए? प्रधानमंत्री मोदी ने ऑडियो संदेश के जरिए ‘मिशन आगमन’ की टीम को बधाई दी है, राष्ट्र निर्माण और आत्मनिर्भरता में उनकी भूमिका को सराहा है और प्रधानमंत्री आवास पर भेंट का आमंत्रण दिया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह अत्यधिक अहम शुरुआत है। भारत में भी अंतरिक्ष से जुड़ा एक बाजार खुलेगा और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हम अपनी सेवाएं दे सकेंगे। इस मिशन के तहत अंतरिक्ष में कुछ पेलोड भेजे गए हैं।
मसलन इन ऑर्बिट रोबोटिक आर्म, भविष्य के मिशनों के लिए उपग्रह प्रणालियों का टेस्ट करेगा क्यूबसैट, नई अंतरिक्ष तकनीकों के सत्यापन के लिए टेस्ट सैटेलाइट, पिन पुलर एवं रिलीज नट सैटेलाइट छोड़ने के मैकेनिज्म के प्रभाव जांचेगा और 32 हीरों से बना कमल। एक और कंपनी है ‘पिक्सेल’ जो कृषि से लेकर पर्यावरण पर नजर रखने के एप्लिकेशन के लिए निगरानी उपग्रह बना रही है। इसी तरह ‘बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस’ सेटेलाइट प्रोपल्शन सिस्टम का विकास कर रही है और ‘अग्नीकुल कॉसमॉस’ छोटे सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल बना रही है जिन्हें 3डी प्रिंटेड रॉकेट इंजनों से ताकत मिलती है। अंतरिक्ष के क्षेत्र में निजी कंपनियों के प्रवेश का एक असर यह भी हुआ है कि इसरो अब अपने कर्मचारियों के स्वैच्छिक अवकाश लेने से रोक रही है।
ऐसी खबरें आ रही थीं कि बहुत से वैज्ञानिक इसरो को छोड़ कर निजी कंपनियों में जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की विदाई या अलगाव बेहद चिंताजनक माना गया, क्योंकि ये तकनीकी चेहरे भारत के ‘चद्रयान-4’ और ‘गगनयान’ जैसे बड़े अंतरिक्ष कार्यक्रमों से जुड़े थे। वे सभी कार्यक्रम अपने अंतिम और निर्णायक चरण में हैं। त्यागपत्र देने वाले कई इसरो वैज्ञानिक और इंजीनियर अंतरिक्ष संबंधी स्टार्टअप्स से जुड़ गए। विक्रम-1, भेजने वाली ‘स्काईरूट एयरोस्पेस’ कंपनी की स्थापना भी 2018 में पवन कुमार चंदना और नागा भरत डाका ने की थी, जिन्होंने इसरो की नौकरी छोड़ी थी और यह स्टार्टअप शुरू किया था।
ऐसे में अहम सवाल यह है कि वैज्ञानिकों को जबरन इसरो में रोककर काम का बेहतर माहौल बनाया जा सकेगा? इसमें कोई शक नहीं कि अंतरिक्ष क्षेत्र का बाजार अब काफी बढ़ा है और इसमें भारत की छलांग सिर्फ सरकारी धन के भरोसे नहीं लगाई जा सकती। सरकार को ऐसी नीति बनानी होगी कि इस क्षेत्र में निजी निवेश लाने वाली संस्थाओं को ‘शॉर्ट कट’ अपनाने से रोका जा सके। निजी संस्थाएं इसरो के वैज्ञानिकों को अपनी ओर खींचने की बजाय स्वयं के बूते ऐसा माहौल बनाएं जहां काम करके नए-नए वैज्ञानिक उस तरह की ऊंचाई हासिल कर सकें जैसे इसरो ने लंबी अवधि में किया है।
2014 में भारत मंगल ग्रह की कक्षा में अंतरिक्ष यान भेजने वाला पहला एशियाई देश बना। इसरो ने चांद पर अपने खोजी कार्यक्रम चंद्रयान से भी बहुत सुर्खियां बटोरी। इस कार्यक्रम के तहत 2008 में चांद की कक्षा में एक ऑर्बिटर भेजा गया। इसके बाद 2019 में चांद पर उतरने की नाकाम कोशिश और फिर 2023 में चांद पर रोवर उतारने में सफलता शामिल है। रोवर मिशन से भारत चांद पर मानव रहित यान उतारने वाला चौथा देश बन गया। इससे पहले अमेरिका, रूस और चीन ने यह कारनामा किया था। भारत का चौथा चंद्रयान मिशन 2027 में चांद पर उतरने की उम्मीद कर रहा है। यह चांद की सतह से चट्टान लेकर धरती पर आएगा।
इसके साथ ही शुक्र ग्रह की कक्षा के लिए भी एक मिशन 2028 में भेजा जाना है। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी ‘आदित्य’ नाम के एक सौर मिशन पर भी काम कर रही है। यह सूरज की बाहरी परतों और अंतरिक्ष के मौसम पर नजर रख रहा है। इसरो ने अब तक 430 से ज्यादा विदेशी उपग्रह अंतरिक्ष में भेजे हैं। इससे उसे 60 करोड़ डॉलर से ज्यादा की कमाई हुई है। भारत ने अपने लिए भी 114 से ज्यादा उपग्रह अंतरिक्ष में पहुंचाए हैं। इसरो अंतरिक्ष के लिए अपना मानव मिशन भी लॉन्च करने की तैयारी में हैै टेस्ट रन के लिए जो पहला मिशन बिना मानव के भेजा जाएगा वह 2026 के आखिर में जाना है।
गगनयान नाम से इसरो के मिशन में तीन भारतीय अंतरिक्ष यात्री 400 किलोमीटर की कक्षा में तीन दिन के लिए जाएंगे। इसकी तैयारी के लिए 2025 में भारतीय वायु सेना के पायलट शुभ्रांशु शुक्ला स्पेसएक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक गए थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कहना है कि 2035 तक भारत के पास अपना अंतरिक्ष स्टेशन होगा और 2040 तक चांद पर पहला भारतीय अंतरिक्ष यात्री भेजा जाएगा। उम्मीद है कि एक दिन भारत अंतरिक्ष महाशक्ति भी बन सकता है।


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