युद्ध विनाश का दूसरा नाम है जो बर्बरता और तबाही के अलावा कुछ नहीं लाता। युद्ध मानव द्वारा किए गए सृजन का विध्वंस करता है, विकास को रोकता है और मानवता को पीछे धकेलता है। युद्ध में हमेशा आम जनता और निर्दोषों का नुक्सान होता है। युद्ध में मृत खून से लथपथ लोगों की आत्माएं दर्द से कहराती हैं। धरती चीत्कार कर पुकारती है। हमें न युद्ध चाहिए और न हथियार, अहिंसा का मार्ग चाहिए, जिओ और जीने दो, मानव को मानव से शांति मार्ग चाहिए। अमेरिका, इजराइल और ईरान युद्ध 35वें दिन खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। युद्ध अब केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा बल्कि अब यह पुलों, नागरिक ठिकानों, जल संशोधन केन्द्रों, रिफाइनरियों और गैस प्लांटों तक पहुंच गया है। अब यह जंग लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर को तबाह करने की तरफ मुड़ चुका है। अमेरिका और इजराइल ने ईरान में तेहरान और करज जैसे दो बड़े शहरों को जोड़ने वाला राजनीतिक बी-1 पुल को ध्वस्त कर िदया है। 400 मिलियन डॉलर की लागत से बना यह पुल केवल यातायात का जरिया नहीं था बल्कि ईरान की इंजीनियरिंग आैर उसकी मजबूती का प्रतीक था। इस पुल पर हमला करने का मकसद ईरान के लॉजिस्टिक को काटना है ताकि युद्ध की स्थिति में उसकी सेना को मूवमैंट करने में भारी परेशानी हो।
ईरान ने भी अपना पुल ध्वस्त होने पर बदला लेने की कसम खाई है आैर ईरान ने खाड़ी और मध्यपूर्व के 8 पुलों की िहटलिस्ट जारी की है, जो उसके िनशाने पर हैं। इनमें कुवैत का शेख जाबेर अल अहमद ब्रिज, संयुक्त अरब अमीरात का शेख जायद ब्रिज, अलमक्ता ब्रिज और शेख खलीफा ब्रिज शामिल हैं। बहुमंजिला इमारतें और पुल बनाने में वर्षों लग जाते हैं। अगर युद्ध में बुनियादी ढांचा ही तबाह हो गया तो फिर हाहाकार मचेगा और जनता त्राहि-त्रािह कर उठेगी। अब तक तनाव कम करने की सभी कोशिशें नाकाम हो चुकी हैं। ईरान द्वारा एक के बाद एक अमेरिकी लड़ाकू विमान और दो हैलीकाप्टरों को मार गिराए जाने के बाद पश्चिम एशिया में संकट और गहरा गया है। यद्यपि अमेरिका ने एक पायलट को बचा लेने का दावा किया है जबकि दूसरा पायलट लापता है। यदि लापता पायलट ईरान के हाथ लग जाता है तो अमेरिका की चिंताएं बढ़ जाएंगी। अमेरिका के करोड़ों रुपए के विमान तबाह होने से डोनाॅल्ड ट्रम्प के उन दावों की पोल खुल गई है जिसमें उन्होंने कहा था कि ईरान के आसमान पर अमेरिका का कब्जा हो चुका है। ईरान ने िजस तरह से इजराइल के तेल अबीव, यरूशलम, डिमोना आैर हाइफा जैसे शहरों को अपने रॉकेटों से निशाना बनाया है उससे इजराइल का सुरक्षा कवच माने गए आयरन डोम और लेजर बीम तकनीक भी नकारा साबित हुई।
अमेरिकी खुफिया सूत्रों ने भी ट्रम्प को बता दिया है कि ईरान की मिसाइल क्षमता अभी भी 55 प्रतिशत बरकरार है। यही कारण है कि ईरान अमेरिका के आगे झुकने से साफ इंकार कर रहा है। इजराइल के एयर डिफैंस को भेदने वाले ईरान के सस्ते और सटीक ड्रोन काफी कारगर साबित हुए हैं। इन ड्रोनों ने आधुनिक युद्ध और उससे आर्थिक समीकरणों ने युद्ध का एक नया आयाम जोड़ दिया है। ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों के साथ, अपने शाहेद ड्रोन का इस्तेमाल पूरे पश्चिम एशिया में सेंसरों, राडारों, सैन्य ठिकानों, तेल-गैस के बुनियादी ढांचों, बंदरगाहों, हवाई अड्डों और रिहायशी इलाकों को आक्रामक तरीके से निशाना बनाने के लिए किया है। पिछले एक महीने में खाड़ी क्षेत्र में फैली अराजकता ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्धक्षेत्र में ड्रोन और वायु शक्ति की भूमिका कितनी अहम हो चुकी है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से यह सैन्य सिद्धांत, हर जगह अपनाया जा रहा है। शाहेद ड्रोन से हुआ भारी नुक्सान इस बात को उजागर करता है कि कम लागत वाले कामिकाज़े ड्रोन को बड़े पैमाने पर सैन्य हथियारों के जखीरे में शामिल करने का रणनीतिक फायदा कितना बड़ा हो सकता है। रक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दे दी है कि अब युद्ध के मैदान में ईरान का पलड़ा भारी है और ट्रम्प बुरी तरह से उलझ गए हैं। उन्हें युद्ध से बाहर निकलने के लिए कोई पतली गली नहीं मिल रही। ट्रम्प ने राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में देशवासियों को समझाने की बहुत कोशिश की कि युद्ध अंततः उनके फायदे के लिए है लेकिन अमेरिकी जनता ने उनसे असहमति जता दी है। जंग के बीच ट्रम्प ने आर्मी चीफ समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों को हटा दिया। जंग के बीच घोड़ों का बदलना इस बात का प्रमाण है कि उन्हें युद्ध में वांछित परिणाम नहीं मिल रहे। ट्रम्प के मित्र रहे देश भी उनका साथ छोड़ चुके हैं।
अमेरिका नाटो की सुरक्षा छतरी के तले पश्चिमी यूरोपीय राष्ट्रों के साथ 77 साल पुरानी साझेदारी तोड़ने को तैयार नजर आ रहा है। खासकर, अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के इस बयान के बाद कि वह इस गठबंधन से (जो उनकी नजर में एक “कागजी शेर”है) निकलने पर ‘बिल्कुल’ विचार कर रहे हैं। ट्रम्प की यह और ऐसी ही अन्य टिप्पणियां व्हाइट हाउस की उस साफ जाहिर निराशा के बाद आयी हैं कि यूरोपीय और अन्य सहयोगियों ने ईरान के खिलाफ युद्ध अभियान में अमेरिका और इजराइल के सहयोग के लिए सैन्य संसाधनों को मौके पर नहीं भेजा। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य, जो अभी तेहरान के नियंत्रण में हैं, से तेल टैंकरों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए। ट्रम्प ने बार-बार शिकायत की है कि वाशिंगटन को नाटो से उतना लाभ नहीं मिल रहा, जितना वह उसमें लगा रहा है। हाल ही में उन्होंने मीडिया से कहा, “यह एक तरफ जाने वाली सड़क है।” उन्होंने अपनी एक हालिया टिप्पणी से यह भी संकेत दिया है कि नाटो शायद निष्प्रभावी वैश्विक ताकत बन गया है। उनकी टिप्पणी थी कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी जानते हैं कि नाटो में अपने सदस्यों की रक्षा करने का दम नहीं है। यूक्रेन के खिलाफ मॉस्को की सैन्य आक्रामकता और संभवतः आगे चलकर बाल्टिक राष्ट्र क्षेत्र में उसके सैन्य दुस्साहस के संदर्भ में यह टिप्पणी अतिरिक्त महत्व की हो जाती है।
दुनिया में तेल और ऊर्जा का संकट पहले ही खड़ा हो चुका है। ट्रम्प अपना लक्ष्य पूरा करने में नाकाम रहे हैं। अगर युद्ध लम्बा खिंचता है तो तेल और गैस की आपूर्ति सामान्य नहीं होगी। लोगों पर मंदी और महंगाई की दोहरी मार पड़ेगी। युद्ध रुकने के बावजूद ईरान आैर खाड़ी देशों को दोबारा से बुनियादी ढांचे के िनर्माण और आर्थिक संकट से उभरने में वर्षों लग जाएंगे। युद्ध विरोधी ताकतों को एकजुट होकर ईरान से संवाद का रास्ता कायम कर युद्ध रोकने के गम्भीर प्रयास करने होंगे, अन्यथा एक सिरफिरे की सनक का खामियाजा पूरी दुनिया भुगतेगी।























