पहले तेरी हर बात पर यकीन था मुझे, आंखें घर भूल, तेरे पीछे-पीछे चला करता था
खुद के राहों के अंधेरों की कब परवाह थी मुझे, बस तेरे वास्ते ही तो जला करता था’
सन्निपात मार गए बिहार के सियासी हालात और इतनी गुमसुम सी इन्हीं ठहरी हुई खामोशियों में से अपना गुजरा हुआ चमकता अतीत ढूंढने में इस बिहारी महारथी को शायद थोड़ा वक्त लगे, पर लगता नहीं है कि कल के सुशासन बाबू ने आज के भगवा आभामंडल के समक्ष पूरी तरह अपने घुटने टेक दिए हैं। उनकी वाचाल भाव भंगिमाओं और किंचित अस्थिर मनोदशा को आधार बना उन्हें बिहार से चलता करने की रणनीति बुनने वाले महारथीगण भी समझ गए हैं कि फिलवक्त सियासी रण में यह योद्धा भले ही कितना थका हुआ और बेदम दिख रहा हो, पर यह अभी हारा नहीं है, पलटवार के लिए उतनी ही मुस्तैदी से कमर कस रहा है। बुधवार को जैसे ही भाजपा के एक बड़े नेता ने अपने सबसे परम शिष्य सम्राट चौधरी से राजतिलक के लिए मुस्तैद रहने को कहा, नीतीश अपनी ओढ़ी हुई स्थितप्रज्ञता से बाहर आ गए। उनकी असहमतियों ने भी फौरन आकार लेने शुरू कर दिए। सूत्रों की मानें तो सम्राट के गद्दी की ओर प्रस्थान करने से कहीं पहले ही नीतीश ने अपने विरोध के स्वर मुखर कर दिए। सूत्र यह भी बताते हैं कि नीतीश ने सीधे एक अन्य भाजपा नेता से बात करने की ज़िद ठान ली, यह बात हुई भी और नीतीश ने उनके समक्ष खुलकर अपने मन के उद्गार व्यक्त कर दिए। नीतीश का जोर मूलतः तीन बातों पर था, एक-बिहार का अगला सीएम उनकी सहमति से बनना चाहिए, दो-नए सियासी हालात में नया विधानसभा अध्यक्ष उनकी पार्टी यानी जदयू से ही होगा। तीसरी और सबसे महत्वपूर्ण बात कि गृह मंत्रालय का महकमा भी जदयू के पास ही रहना चाहिए। सम्राट चौधरी के नाम की वकालत करने वाले भगवा रणनीतिकारों के अपने तर्क हैं। इनका कहना है कि ‘सम्राट जिस कोइरी जाति से आते हैं, यह जाति उत्तर प्रदेश और झारखंड में भी प्रभावी है, सो 27 के आने वाले यूपी चुनाव में भाजपा को इसका लाभ मिल सकता है।’ दूसरी बात जो सम्राट के समर्थन में कही जा रही है कि वे काम करने वाले दबंग छवि के नेता हैं, बिहार में तेजस्वी यादव को बस वही काऊंटर कर सकते हैं। वैसे तो सम्राट का नीतीश के बेटे निशांत कुमार से भी काफी याराना है, इन दिनों नीतीश के करीबी निशांत को नीतीश के असली वारिस के तौर पर तैयार करने की मशक्कत में जुटे हैं। कहते हैं स्वयं भाजपा के उक्त बड़े नेता भी नीतीश की इन बातों से इत्तफाक रखते हैं कि बिहार में नीतीश का चाहे जो भी उत्तराधिकारी चुना जाए वह साफ-सुथरी छवि का होना चाहिए, जिनमें नीतीश के वोट भाजपा को ट्रांसफर कराने की कूवत भी हो। फिलहाल बिहार में नीतीश के उत्तराधिकारी का मामला नए पेंचोखम में उलझ गया लगता है।
अकालियों का साथ क्यों छूटा?: एक वक्त तो इस बात के साफ संकेत मिल रहे थे कि इस दफे के आने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का चुनावी गठबंधन तय है, दोनों पार्टियां मिलकर यहां चुनाव लड़ेंगी।
पहले सुखबीर बादल फिर हरसिमरत कौर बादल की मुलाकात भी भाजपा के बड़े नेता से हो गई और गठबंधन के फार्मूले पर बातें भी होने लगी। इसके बाद भाजपा ने दिल्ली सरकार में अपने मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा के नेतृत्व में एक टीम बनाई और इस टीम को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे पंजाब की सभी 117 सीटों की जमीनी रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए गहन विश्लेशण की बानगी भाजपा आला कमान के समक्ष प्रस्तुत करें। इससे पहले भाजपा ने इन सभी 117 सीटों को लेकर आईबी से एक रिपोर्ट पहले ही तलब कर ली थी। दोनों रिपोर्ट्स के लब्बोलुआब बस एक जैसे थे, जिसमें कहा गया था कि अकाली दल बादल तो भाजपा के परंपरागत हिंदू वोट अपने पाले में ट्रांसफर करा लेते हैं, पर उनके कोर वोट बैंक (जट सिख) भाजपा को ट्रांसफर नहीं हो पाते। बल्कि जहां अकाली दल की जगह भाजपा का उम्मीदवार मैदान में होता है, ये सिख वोट या तो आप को या फिर कांग्रेस में चले जाते हैं। वैसे भी पंजाब भाजपा के ज्यादातर नेता भापा (यानी टेडर या खत्री जाति) के हैं, सिरसा स्वयं एक भापा यानी खत्री सिख हैं, पार्टी के पास अब भी कोई वैसा जनाधार वाला जट सिख नेता नहीं है जो ये वोट भाजपा के पाले में ला सके। सो, भाजपा रणनीतिकारों ने हरियाणा चुनाव का फार्मूला पंजाब में आजमाने का निर्णय लिया है। हरियाणा विधानसभा चुनाव के दौरान दक्षिण हरियाणा की ज्यादातर सीटों पर जहां भाजपा कमजोर दिख रही थी, वहां संघ व भाजपा कैडर ने पुरबिया वोटर (बिहार/यूपी) पर खूब जोर लगाया था। महज़ इन वोटरों के बदौलत ही वहां मैदान मार लिया गया।
पंजाब में भी 50 से ज्यादा ऐसी विधानसभा सीटें हैं (खास कर लुधियाना, जालंधर व चंडीगढ़) जहां 30-60 फीसदी तक पुरबिया वोटर्स हैं, सो इस बार भी भाजपा रणनीतिकार इन्हीं पुरबिया मतदाताओं पर दांव लगाना चाहते हैं। भाजपा की कोशिश है कि ‘अगर वह इस दफे के चुनाव में ठीक-ठाक सीटें जीत लेती है तो फिर वह अकालियों की सरकार बनाने के लिए उनके साथ ‘पोस्ट पोल’ गठबंधन कर सकती है और सरकार में रोटेशन के आधार पर अपना सीएम भी मांग सकती है।’
कब होगा प्रियंका के मन का : प्रियंका चतुर्वेदी अभी-अभी तो ऊपरी सदन से रिटायर हुई हैं, पर सदन में अपनी पुनर्वापसी के लिए फिर से उन्होंने कमर कस ली है। राज्यसभा से विदाई के बाद कम से कम उन्होंने पांच पार्टियां रखीं, एक पत्रकारों के लिए, तो दूसरी महिला पत्रकारों के लिए, एक पार्लियामेंट के अपने साथियों के लिए। इन तमाम पार्टियों का एजेंडा बस एक ही था कि प्रियंका के नाम का डंका बजते रहना चाहिए, रील बनती रहनी चाहिए, मुद्दों की जरूरी शिनाख्त में गैर जरूरी मुद्दों की भी चर्चा होती रहनी चाहिए। पर अब सवाल सबसे अहम है कि उन्हें वापिस राज्यसभा में लेकर आए कौन? बिचारे आदित्य ठाकरे करें भी तो क्या, शिवसेना उद्धव इस दफे तो जरूरी गिनती बल के करीब भी नहीं थी। कहते हैं प्रियंका ने देवेंद्र फड़णवीस के भी खूब चक्कर लगाए, पर बात वहां भी नहीं बनी। फिर उन्होंने एकनाथ शिंदे का रुख कर लिया, पर एकनाथ के पास भी इस बार उन्हें उपकृत करने के जरूरी उपक्रम नहीं थे, तो जया बच्चन के मार्फत सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव को पकड़ लिया। जया बच्चन स्वयं प्रियंका की पैरवी लेकर अखिलेश के पास जा पहुंचीं। कहते हैं अखिलेश ने छूटते ही जया से कह दिया ‘आपकी बात कुछ और है, हमारा परिवार आपकी बहुत इज्जत करता है, पर हमारे लिए इनकी (प्रियंका की) उपयोगिता क्या है। वैसे भी हम अपनी पार्टी से केवल बाहरियों को कब तक सदन में भेजते रहेंगे इससे हमारी पार्टी कैडर में भी गलत संदेश जाता है।’ भले ही प्रियंका चतुर्वेदी के लिए फिलवक्त सारे सियासी रास्ते बंद लग रहे हों, पर नया रास्ता ढूंढ निकालने में तो उन्हें महारथ हासिल है।
रंग नहीं लाई केसी की कोशिश: केसी त्यागी की शुरू से यही इच्छा थी कि अगर एक बार वे जदयू को अलविदा कहें तो फिर सीधे सपा की ठौर पकड़ लें। यही वज़ह है कि जदयू को आधिकारिक रूप से अलविदा कहने से पहले ही वे सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव से मिल रहे थे। पर शायद अखिलेश उन्हें पार्टी में लेने के लिए इतने उत्साही नहीं लग रहे थे, उन्हें नहीं लग रहा था कि केसी के पार्टी में आने से सपा को इसका कोई खास लाभ होने वाला है। दूसरा उन्हें यह भी लग रहा था कि केसी एक पके-पकाए राजनेता हैं, सपा में आने की एवज में वे उनसे जरूर कुछ बड़ा पाने की आस लगाएंगे। सो, अखिलेश ने यह कार्य प्रोफेसर रामगोपाल यादव के हवाले कर दिया कि ‘वे केसी त्यागी से बात कर उनका मन टटोलें कि आखिरकार वे चाहते क्या हैं?’ इसके बाद भी केसी त्यागी कोई दो दफे प्रोफेसर साहब से मिलने उनके घर गए, हर बार रामगोपाल का यही रटा-रटाया जुमला हाजिर होता था ’आइए आपका सपा में दिल से स्वागत है।’ पर उन्होंने कभी इस बात का खुलासा ही नहीं किया कि वे बदले में क्या ‘डील ऑफर’ कर रहे हैं। जब केसी को लगा कि प्रोफेसर बस टाल-मटोल कर रहे हैं, ऑफर करने के लिए उनके पास कुछ भी ठोस नहीं तो वे वहां से सीधे जयंत चौधरी के पास चले गए। जयंत चौधरी किंचित ज्यादा समझदार निकले, उन्होंने बातचीत की शुरूआत में ही केसी त्यागी से कह दिया कि ‘वे केसी के पुत्र को 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में रालोद के टिकट पर मुरादनगर से चुनावी मैदान में उतारेंगे। सो, एक पिता ने अपने पुत्र के उज्ज्वल भविष्य के लिए इस प्रस्ताव पर सहर्ष अपनी सहमति दे दी।
क्या सफल होगा ममता का दांव : बंगाल चुनाव में तृणमूल बनाम भाजपा की चुनावी जंग अब एक दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है, दोनों ही दल साम-दाम-दंड-भेद की नीति पर बराबर का दांव चल रहे हैं। एक ओर जहां भाजपा ने इस चुनाव में अपने पूरे संसाधन, ताकत, पैसा, तंत्र व कैडर झोंक दिया है, ममता भी उसी हिसाब से विरोधी दल पर पलटवार कर रही हैं। ममता इस पूरे चुनाव को ‘बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी’ बनाने पर तुली हैं। यही वज़ह है कि ममता नित्य प्रति अपने चुनावी बयानों को नई धार दे रही हैं। ताजा मामला उन्होंने नॉनवेज का उछाला है। ममता अपनी बंगाली जनता से कह रही हैं कि ’अगर उन्होंने राज्य में भाजपा को बिठाने की गलती की तो यह पार्टी राज्य में मांस-मछली के सेवन पर प्रतिबंध लगा सकती है।’ ममता एसआईआर के बहाने गरीब मतदाताओं को यह समझाने की कोशिश कर रही हैं कि ’भाजपा गरीब वोटर को उनके मताधिकार से वंचित रखना चाहती है।’ वहीं इस बार ममता नॉर्थ बंगाल में पूरा दम लगा रही हैं, 24 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने उत्तर बंगाल की 8 में से 5 लोकसभा सीटें जीत ली थीं, 2019 में तो भाजपा का आंकड़ा और बेहतर था। उस चुनाव में भाजपा ने नॉर्थ बंगाल की 8 में से 7 लोकसभा सीटें जीत ली थीं। अब ममता नॉर्थ बंगाल में इस दफे भाजपा के इसी तिलिस्म को ढहाना चाहती हैं।
…और अंत में
असम का चुनाव धीरे-धीरे भाजपा के लिए महत्वपूर्ण होता जा रहा है, क्योंकि पिछले दफे 2021 के विधानसभा चुनाव में अपर यानी पूर्वी असम की 34 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ 5 सीटें ही जीत पाई थी। यहां गोगोई यानी अहोम वोटरों का खूब बोलबाला है, इस बार इस क्षेत्र के तीनों बड़े गोगोई नेता एकजुट होकर कांग्रेस के पक्ष में कदमताल कर रहे हैं, सो उम्मीद जताई जा रही है कि इस बार अपर असम के चुनावी नतीजे एक बड़ा उलटफेर कर सकते हैं क्योंकि राजोर दल प्रमुख अखिल गोगोई, आसू के पुराने नेता लुरिन ज्योति गोगोई और असम प्रदेश कांग्रेस प्रमुख गौरव गोगोई तीनों मिल कर यहां चुनाव लड़ रहे हैं। क्योंकि कांग्रेस का यहां राजोर दल व असम जातीय परिषद से चुनावी गठजोड़ पहले ही हो गया था।
सम्राट के नाम पर नीतीश का रूप विराट
Summary :
पहले तेरी हर बात पर यकीन था मुझे, आंखें घर भूल, तेरे पीछे-पीछे चला करता था खुद के राहों के अंधेरों की कब परवाह थी मुझे, बस तेरे वास्ते ही तो जला करता था’ सन्निपात मार गए बिहार के सियासी हालात और इतनी गुमसुम सी इन्हीं ठहरी हुई खामोशियों में से अपना गुजरा हुआ चमकता अतीत ढूंढने में इस बिहारी महारथी को शायद थोड़ा वक्त लगे, पर लगता नहीं है कि कल के सुशासन बाबू ने आज के भगवा आभामंडल के समक्ष पूरी तरह अपने घुटने टेक दिए हैं। उनकी वाचाल भाव भंगिमाओं और किंचित अस्थिर मनोदशा को आधार बना…


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