चार राज्यों उत्तर प्रदेश, बिहार, कर्नाटक व महाराष्ट्र की विधान परिषद की 28 सीटों पर हुए चुनावों से मिले नतीजों से यह सन्देश जा रहा है कि जिस राज्य में जिस भी पार्टी या गठबन्धन की सरकार है, लोगों में उसके प्रति अनमनापन है, विशेषकर पढे़-लिखे समाज में। इन चुनाव में केवल स्नातक शिक्षा पास करने वाले सामान्य मतदाता व शिक्षक ही मतदान करते हैं तो उनके रुख से यह नतीजा आसानी से निकाला जा सकता है कि लोग अपने-अपने राज्यों में किये जा रहे विविध विकास कार्यों से सन्तुष्ट नहीं हैं।
इसके साथ राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर भी उत्तेजना का भाव देखा जा सकता है। चारों राज्यों में से सर्वाधिक 11 सीटों पर उत्तर प्रदेश में चुनाव हुए थे। इस राज्य में भाजपा की योगी आदित्यनाथ सरकार पिछले दस साल से सत्ता पर काबिज है अतः चुनाव परिणाम चौंकाने वाले बिल्कुल नहीं कहे जा सकते क्योंकि छह सीटें भाजपा ने जीती हैं और पांच सीटों पर श्री अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने विजय प्राप्त की है। यदि राजनीतिक स्तर पर सत्तारूढ़ एनडीए व विपक्षी इंडिया गठबन्धन के स्तर पर देखा जाये तो 15 सीटें एनडीए के खाते में और 13 सीटें इंडिया गठबन्धन के खाते में गई हैं।
राज्यवार हिसाब किया जाये तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को छह व समाजवादी पार्टी को पांच सीटें मिली हैं। महाराष्ट्र की पांच सीटों में से स्तारूढ़ महायुती (एनडीए) को दो व विपक्षी महाविकास अघाड़ी (इंडिया) को तीन सीटें मिली हैं। कर्नाटक में चारों सीटें एनडीए ने जीत ली हैं मगर बिहार की आठ सीटों में एनडीए को चार व चार ही निर्दलीयों समेत विपक्षी दलों को गई हैं लेकिन कर्नाटक एक मात्र ऐसा राज्य है जहां कि चार में से चार सीटें विपक्षी गठबन्धन एनडीए के खाते में गई हैं। इस राज्य में कांग्रेस की डी.के. शिवकुमार सरकार है।
हालांकि कांग्रेस के चारों सीटें हार जाने से उसकी सरकार के स्थायित्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा मगर राज्य विधान परिषद में उसकी स्थिति जरूर कमजोर होगी क्योंकि 75 सदस्यीय विधान परिषद में कांग्रेस के कुल 38 सदस्य हैं जो कि बहुमत का मुहाना है। किसी भी सरकार की नैतिक विजय के लिए राज्य के दोनों सदनों में अच्छा बहुमत बहुत मायने रखता है। अतः कर्नाटक में भाजपा ने चार में से तीन सीटें जीतकर व एक उसके सहयोगी जनता दल (एस) ने अपने पास रखकर साफ सन्देश दे दिया है कि डी.के. शिवकुमार की राह आसान नहीं है।
इसके साथ ही इन चुनावों में कुछ चौंकाने वाले नतीजे भी आये हैं। जैसे कि बिहार में चुनाव प्रबन्धक से राजनीतिज्ञ बने प्रशान्त किशोर की पार्टी जन सुराज ने इन चुनावों में भी अपना खाता खोलने में सफलता प्राप्त कर ली। सभी जानते हैं कि जब भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर बिहार के मन्त्री श्री नितिन नवीन को चुना गया था और उन्हें राज्यसभा में लाया गया था तो उन्होंने बांकीपुर की अपनी विधायक सीट से इस्तीफा दे दिया था। बांकीपुर में जब उपचुनाव हुआ तो यह सीट भी जन सुराज के प्रत्याशी ने भारी अन्तर से जीत ली थी।
मगर परिषद चुनावों में जन सुराज पार्टी ने विपक्ष के खाते में ही सेंध डालते हुए दरभंगा की शिक्षक सीट पर कांग्रेस के निवर्तमान विधायक को मात्र 374 मतों से पराजित कर दिया। इसी प्रकार महाराष्ट्र की नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस के निवर्तमान विधायक ने अपना कब्जा बरकरार रखा और भाजपा के प्रत्याशी को करारी शिकस्त दी। नागपुर महाराष्ट्र के मुख्यमन्त्री देवेन्द्र फडणवीस की विधानसभा की गृह सीट है। उत्तर प्रदेश में भी वाराणसी में कुछ ऐसा ही हुआ जो कि प्रधानमन्त्री की लोकसभा सीट है। इस क्षेत्र की स्नातक व शिक्षक दोनों सीटों पर समाजवादी पार्टी के प्रत्याशिय़ों ने भारी बहुमत से जीत दर्ज की।
वहीं राज्य के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ अपने गृह नगर गोरखपुर से सीटें बचाने में बामुश्किल सफल रहे मगर आगरा-मथुरा व इलाहाबाद-झांसी की स्नातक सीटों को नहीं बचा पाये। यही स्थिति लखनऊ की स्नातक सीट पर भी रही। भाजपा को मेरठ व मुरादाबाद-बरेली सीटों पर शानदार सफलता मिली। इसका अर्थ यह निकाला जा रहा है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत रहेगी। राज्य में अगले वर्ष के शुरू में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं।
दूसरी तरफ लखनऊ की स्नातक सीट समाजवादी पार्टी ने जीती मगर शिक्षक सीट भाजपा के श्री उमेश द्विवेदी के खाते में बड़े मतान्तर से गई। इसी तरह महाराष्ट्र में श्री शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने पुणे व संभाजी नगर की स्नातक सीटों को जीत लिया जबकि पुणे की शिक्षक सीट भाजपा ने जीती और इसके सहयोगी दल शिवसेना (शिन्दे) ने अमरावती की शिक्षक सीट पर अपना कब्जा जमाया।
चुनावों से यह नतीजा भी निकलता है कि अधिसंख्य शिक्षक सीटों पर भाजपा की विजय रही जबकि विपक्षी दलों का जोर स्नातक सीटों पर ज्यादा रहा। इसके अपने राजनीतिक अर्थ भी हो सकते हैं जिनका विश्लेषण राजनीतिक पंडित करते रहेंगे मगर इतना निश्चित है कि इन चुनाव परिणामों से किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता क्योंकि हर चुनाव के मुद्दे अलग-अलग होते हैं।


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