गांधी परिवार एक बार फिर सुर्खियों में है और इस बार चर्चा के केंद्र में न तो राहुल गांधी हैं और न ही उनकी बहन प्रियंका वाड्रा, बल्कि परिवार की वरिष्ठ सदस्य सोनिया गांधी और उनके नाती रिहान वाड्रा हैं। सोनिया गांधी अपनी आगामी आत्मकथा को लेकर चर्चा में हैं, जबकि रिहान वाड्रा की छाया चित्र प्रदर्शनी का आयोजन बीच में ही रुक जाने के कारण विवाद खड़ा हो गया है। सोनिया गांधी की पुस्तक को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन वाड्रा की छायाचित्र प्रदर्शनी का प्रकरण नया है।
जहां रिहान से जुड़ा विवाद हालिया है, वहीं उनकी नानी सोनिया गांधी की पुस्तक से जुड़ा विवाद दो चरणों में सामने आया है। घटनाक्रम कुछ इस प्रकार है। पहला विवाद सोनिया गांधी की आत्मकथा ‘बिलॉन्गिंग ए जर्नी आफ लव’ को लेकर उठा। इस पुस्तक में उन्होंने यूनान के एक रेस्तरां में राजीव गांधी से हुई अपनी पहली मुलाकात का वर्णन किया है, जिसके बाद दोनों ने विवाह किया। आत्मकथा में सोनिया गांधी ने अपने बचपन से लेकर विवाह तक के सफर, भारत को अपना घर बनाने के निर्णय और जीवन में आई उन त्रासदियों का उल्लेख किया है जिनमें उनकी सास इंदिरा गांधी और बाद में उनके पति राजीव गांधी का निधन भी शामिल है।
हालांकि पुस्तक से अधिक चर्चा उस विवाद ने बटोरी जो सोनिया गांधी द्वारा पुस्तक लिखे जाने की खबर सामने आते ही शुरू हो गया था। इसी वर्ष अक्तूबर में रिहान वाड्रा की छायाचित्र प्रदर्शनी नई दिल्ली स्थित बीकानेर हाउस में आयोजित होने वाली थी। प्रदर्शनी शुरू तो हुई लेकिन प्रबंधन द्वारा कुछ आपत्तिजनक माने गए चित्रों को हटाने के निर्देश के बाद इसे निर्धारित समय से पहले ही समाप्त करना पड़ा। प्रदर्शनी में प्रदर्शित लगभग 100 तस्वीरों में से 70 हटा दी गईं। इनमें वन्यजीवन, अमूर्त कला और हाल के युवा आंदोलनों से जुड़ी तस्वीरें शामिल थीं।
खबरों के अनुसार प्रबंधन ने भारतीय ध्वज की दो तस्वीरें हटाने के लिए भी कहा था लेकिन रिहान ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया। ‘नो आइडिया इज़ फाइनल’ शीर्षक वाली यह एकल छायाचित्र प्रदर्शनी थी: रिहान ने कहा कि छाया चित्रण, विशेषकर प्रकृति और वन्य जीवन पर केंद्रित छाया चित्रण उनका जुनून है। इसी जुनून के चलते उन्होंने अपने चित्रों को दुनिया के सामने प्रस्तुत करने का निर्णय लिया था। लेकिन प्रबंधन को यह स्वीकार्य नहीं था। इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट साझा करते हुए रिहान ने लिखा, ‘बीकानेर हाउस के प्रबंधन ने मुझे प्रदर्शित कलाकृतियों के बड़े हिस्से को हटाने के लिए बाध्य किया।
ये तस्वीरें दिल्ली में हुए युवा प्रदर्शनों से संबंधित थीं। कथित तौर पर ये तस्वीरें ‘आपत्तिजनक’ हैं। उन्होंने तिरंगे की दो तस्वीरें हटाने का निर्देश भी दिया। मैंने ऐसा करने से इन्कार कर दिया है। मैं भारतीय ध्वज की तस्वीर नहीं हटाऊंगा।
रिहान के अनुसार, प्रबंधन की आपत्तियों का कारण यह था कि विरोध-प्रदर्शनों से जुड़ी तस्वीरें राजनीतिक प्रकृति की थीं और इसलिए उन्हें हटाया जाना आवश्यक बताया गया। उन्हें स्पष्ट रूप से दो विकल्प दिए गए थे, या तो तस्वीरें हटा दें या फिर प्रदर्शनी रद्द होने के लिए तैयार रहें। प्रबंधन का मानना था कि देश में राजनीतिक माहौल अत्यधिक तनावपूर्ण होने के कारण इन तस्वीरों को प्रदर्शित करने का यह उचित समय नहीं है।
इसके विपरीत रिहान का कहना था कि उनकी तस्वीरें हाल के सप्ताहों में घटित घटनाओं का केवल दस्तावेजीकरण करती हैं। उन्होंने कहा, ‘एक भारतीय कलाकार के रूप में यह मेरा कर्त्तव्य था कि जो कुछ हो रहा है, उसे दर्ज करूं।’ वहीं बीकानेर हाउस प्रबंधन का पक्ष था कि इन तस्वीरों को स्थल की निर्धारित नीतियों के अनुरूप नहीं पाया गया।
रिहान के पिता रॉबर्ट वाड्रा ने मीडिया को बताया कि प्रदर्शनी के उद्घाटन से कुछ घंटे पहले ही प्रबंधन ने रिहान से अधिकांश तस्वीरें हटाने को कहा था।
रिहान ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन तस्वीरों के पीछे उनकी तीन वर्षों की मेहनत थी। जाहिर है अब इस मामले में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। सबसे पहले उनकी मां प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस निर्णय पर कड़ा प्रहार किया। इस कदम को ‘हास्यास्पद’ बताते हुए प्रियंका ने कहा कि यह युवाओं की आवाज़ दबाने का प्रयास है। उन्होंने यह भी कहा कि तस्वीरों में किसी के प्रति कोई अपमानजनक बात नहीं थी, बल्कि वे विरोध-प्रदर्शन का केवल दृश्यात्मक दस्तावेजीकर थीं।
हालांकि बीकानेर हाउस का प्रबंधन इस तर्क से सहमत नहीं था। दूसरी ओर भाजपा ने इस पूरे मामले में अलग ही रुख अपनाया और बीकानेर हाउस प्रबंधन की कार्रवाई का बचाव करने के लिए भी आगे आ गई। भाजपा की ओर से यह दावा किया गया कि राजनीतिक तस्वीरें बाद में प्रदर्शनी में शामिल की गई थीं, जबकि रिहान बीकानेर हाउस के दिशा-निर्देशों से भली-भांति परिचित थे।
इसी कारण, प्रबंधन को भेजे गए प्रारंभिक प्रस्ताव में राजनीतिक विषयवस्तु शामिल नहीं थी। राजनीतिक स्तर पर भाजपा ने राहुल गांधी और उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के बीच मतभेद होने का दावा किया। पार्टी का तर्क था कि राहुल गांधी ने अपने भांजे के समर्थन में खुलकर कुछ नहीं कहा। भाजपा प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने यहां तक आरोप लगाया कि प्रियंका अपने बेटे को राजनीति में धीरे-धीरे स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। यहां यह दर्ज करना आवश्यक है कि समाचारपत्र के प्रकाशन के लिए सामग्री भेजे जाने तक राहुल गांधी ने इस विवाद पर कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की थी।
भंडारी ने सोशल मीडिया पर लिखा, राहुल गांधी वियतनाम से हर मुद्दे पर ट्वीट कर रहे हैं लेकिन अब तक उन्होंने रिहान वाड्रा के समर्थन में एक भी खुला ट्वीट नहीं किया है। कांग्रेस में यह प्रियंका बनाम राहुल की लड़ाई है। हालांकि भंडारी का यह दावा महज उनकी अपनी कल्पना पर आधारित प्रतीत होता है। भाई-बहन के बीच संबंधों की गहराई से परिचित कोई भी व्यक्ति उनके बीच दरार होने की इस धारणा को सहजता से स्वीकार नहीं करेगा।
प्रियंका गांधी वाड्रा ने हमेशा अपने भाई से एक कदम पीछे रहकर उन्हें प्राथमिकता दी है और स्वयं सुर्खियों में आने के बजाय राहुल गांधी पर ध्यान केंद्रित रहने दिया है। उनके पारिवारिक संबंधों की मजबूती का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है कि कांग्रेस के एक बड़े वर्ग की ओर से बार-बार राजनीति में आने की मांग किए जाने के बावजूद प्रियंका ने सक्रिय राजनीति में कदम तभी रखा, जब राहुल गांधी उसमें अपनी मजबूत जगह बना चुके थे। सक्रिय राजनीति में प्रवेश करने के बाद भी उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि वह अपने भाई से एक कदम पीछे ही रहें।
इसके अतिरिक्त भाजपा को उन मामलों में तत्काल कूदकर बचाव करने की अपनी प्रवृत्ति पर भी नियंत्रण रखना चाहिए जो तकनीकी रूप से उसके अधिकार क्षेत्र या कार्य क्षेत्र में नहीं आते। उम्मीद की जानी चाहिए कि बीकानेर हाउस का प्रबंधन अपनी लड़ाई स्वयं लड़ने में सक्षम है। ऐसे में भाजपा द्वारा किया जा रहा पुरजोर बचाव इस आशंका को और बल देता है कि इस प्रकरण में जो दिखाई दे रहा है, कहानी उससे कहीं अधिक गहरी है। कुल मिलाकर रिहान वाड्रा का यह प्रकरण केवल नीतिगत निर्णय का मामला कम और गंदी राजनीति से प्रेरित घटनाक्रम अधिक प्रतीत होता है।


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