हालांकि आजकल शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफ़े पर विपक्ष का जोर है, ‘नीट’ पेपर लीक में धांधली को लेकर भी सरकार पर काफी दबाव है, मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत का शिक्षा संचालन आज भी विश्व विख्यात और सटीक व सस्ता है। जब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति ‘एनईपी 2020’ प्रस्तुत की तब इसे उचित रूप से भारत की शिक्षा व्यवस्था में 34 वर्षों बाद किया गया पहला व्यापक सुधार बताया गया। छह वर्ष बाद यह नीति केवल एक दृष्टि या घोषणा भर नहीं रह गई है, बल्कि कार्यान्वयन के अधिक चुनौतीपूर्ण और प्रभावशाली चरण में प्रवेश कर चुकी है।
दृढ़ विश्वास है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 स्वतंत्र भारत के शिक्षा इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है, क्योंकि यह एक नई सदी के लिए निर्मित शिक्षा नीति है। भारत की पिछली शिक्षा नीति वर्ष 1986 में बनाई गई थी और 1992 में उसमें संशोधन किया गया था। उस समय न इंटरनेट था, न कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और न ही वे जनसांख्यिकीय तथा आर्थिक चुनौतियां थीं जो आज भारत के सामने हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का उद्देश्य इसी विसंगति को दूर करना था। इसने कठोर और सीमित शैक्षणिक संरचनाओं के स्थान पर बहुविषयक, लचीली और परिणामोन्मुख शिक्षा की अवधारणा प्रस्तुत की।
यह दृष्टिकोण उच्च शिक्षा को केवल विशेषज्ञ तैयार करने वाली प्रणाली नहीं मानता बल्कि जीवन भर सीखने वाले, बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल सकने वाले नागरिकों के निर्माण का आधार मानती है। चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम जिसमें अनेक प्रवेश एवं निकास विकल्प हैं, विषयगत सीमाओं को समाप्त करना तथा व्यावसायिक शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ना जैसे प्रावधान केवल सतही परिवर्तन नहीं हैं। ये इस बात की मूलभूत पुनर्कल्पना हैं कि डिग्री का अर्थ क्या है और विद्यार्थी की बौद्धिक यात्रा किस प्रकार संगठित होनी चाहिए।
इन प्रावधानों के कार्यान्वयन ने देशभर के विश्वविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रमों, मूल्यांकन प्रणालियों और शिक्षक प्रशिक्षण प्रक्रियाओं को पुनर्गठित करने के लिए प्रेरित किया है। बहुविषयक शिक्षा के अधार पर विश्वविद्यालय प्रणाली के भीतर सबसे स्पष्ट परिवर्तन एकल विषयक ढांचे से बाहर निकलना रहा है। जो संस्थान पहले विद्यार्थियों को केवल एक ही विषयधारा तक सीमित रखते थे, अब उन्हें विभिन्न विषयों में क्रेडिट आधारित वैकल्पिक पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने पड़ रहे हैं। इससे विज्ञान का विद्यार्थी लोक नीति का अध्ययन कर सकता है और मानविकी का विद्यार्थी डेटा विश्लेषण की समझ विकसित कर सकता है।
यह केवल समय, सारिणी का प्रश्न नहीं है, बल्कि संस्थागत सोचए शिक्षक भर्ती और मूल्यांकन प्रणालियों में व्यापक परिवर्तन की मांग करता है। नई शिक्षा नीति की सबसे महत्वाकांक्षी प्रतिबद्धताओं में से एक मातृभाषा और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा को प्रोत्साहन देना है, विशेषकर प्रारंभिक स्तर पर तथा धीरे-धीरे उच्च शिक्षा में भी। यह केवल भाषाई विरासत का सम्मान नहीं है, बल्कि शिक्षा तक समान पहुंच सुनिश्चित करने का व्यावहारिक उपाय है। भारत के अनेक विद्यार्थी अपनी क्षमता के कारण नहींए बल्कि भाषा संबंधी बाधाओं के कारण पीछे रह जाते हैं। इसलिए मातृभाषा आधारित शिक्षा ज्ञान तक पहुंच को अधिक लोकतांत्रिक बनाती है।
दीक्षा और स्वयं जैसे डिजिटल मंचों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इन प्लेटफॉर्मों के माध्यम से दूरस्थ क्षेत्रों के विद्यार्थी भी गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक सामग्री तक पहुंच प्राप्त कर सकते हैं, जो पहले केवल चुनिंदा प्रतिष्ठित संस्थानों में उपलब्ध थी। राष्ट्रीय शिक्षक नीति 2020 का एक अत्यंत महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत कम चर्चित पहलू यह है कि यह व्यावसायिक और कौशल आधारित शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा का अभिन्न भाग मानती है। नीति यह स्वीकार करती है कि यदि उच्च शिक्षा केवल डिग्रीधारी युवाओं का निर्माण करती रहे और उन्हें रोजगारपरक कौशल न प्रदान करे तो भारत की जनसांख्यिकीय क्षमता का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा।
इतने व्यापक स्तर के किसी भी सुधार के साथ चुनौतियां स्वाभाविक रूप से जुड़ी होती हैं। राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी द्वारा आयोजित परीक्षाओं, विशेषकर नीट, यूजी को लेकर हाल के वर्षों में कई प्रश्न उठे हैं। इन परिस्थितियों ने पारदर्शिता, जवाबदेही और परीक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता को रेखांकित किया है। हालांकि इन चुनौतियों को मानकीकृत मूल्यांकन व्यवस्था को समाप्त करने के आधार के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि सुधार की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए।
भारत के विश्वविद्यालय अनेक नियामक संस्थाओं जैसे विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी), राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई), फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (पीसीआई) और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के अधीन कार्य करते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने इन विविध नियामकीय ढांचों को अधिक समन्वित और सुव्यवस्थित बनाने की परिकल्पना की है। जब तक यह पूर्णतः साकार नहीं होता, विश्वविद्यालयों को विभिन्न नियामकों की अपेक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय उच्च शिक्षा को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति, विदेशी डिग्रियों की मान्यता को सरल बनाना तथा अंतर्राष्ट्रीय विद्यार्थियों को आकर्षित करने की पहल इस नीति के प्रमुख आयाम हैं। इसका उद्देश्य भारत को केवल प्रतिभा निर्यातक देश के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित करना है।
अनेक निजी विश्वविद्यालयों में भी पाठ्यक्रम पुनर्गठन, शिक्षकों पुनर्प्रशिक्षण और नई सूचना प्रौद्योगिकी प्रणालियों के विकास में पर्याप्त संसाधन जुटाए हैं। वैसे विशेष रूप से छोटे और क्षेत्रीय संस्थानों के लिए यह प्रक्रिया आसान नहीं रही है। यदि इन लक्ष्यों को उसी दृढ़ता के साथ आगे बढ़ाया गया जिसके साथ इस नीति की कल्पना और प्रारंभिक क्रियान्वयन किया गया तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को केवल एक शिक्षा सुधार दस्तावेज़ के रूप में नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक मोड़ के रूप में याद किया जाएगा जहां से भारतीय उच्च शिक्षा वास्तव में भविष्य के लिए तैयार हुई।


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