पाकिस्तान जिस तरह से 1960 में हुई भारत के साथ ‘सिन्धु जल सन्धि’ के बारे में अन्तर्राष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल करके भारतीय रुख के विरुद्ध जनमत बनाने का असफल प्रयास कर रहा है उससे यही सिद्ध होता है कि वह इस सन्धि की विभिन्न शर्तों की बदले पर्यावरणीय व मौसम मिजाज के अनुकूल सामयिक समीक्षा करने को तैयार नहीं है और यह मान कर चल रहा है कि 66 साल पहले जैसा मौसम का मिजाज हुआ करता था आज भी वैसा ही है।
इसके साथ ही पाकिस्तान जिस तरह आतंकवाद को अपनी विदेश नीति का अंग बनाये हुए है, विशेषकर भारत के विरुद्ध वह अपनी सीमा से दहशतगर्दों को भेज कर जिस तरह के कत्लोगारत के कारोबार में संलिप्त है उससे दोनों देशों के आपसी सम्बन्ध बेअसर रहेंगे? यही वजह है कि जब पिछले वर्ष अप्रैल महीने के शुरू में कश्मीर के पहलगाम में पाकिस्तान से आये आतंकवादियों ने 20 भारतीय पर्यटकों की निर्मम हत्या की तो भारत सरकार ने जल सन्धि को स्थगित रखने की घोषणा की और कहा कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार का आतंकवाद नहीं छोड़ेगा तब तक उसके साथ किसी प्रकार की बातचीत नहीं होगी।
साथ ही भारत की मोदी सरकार ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि अब वक्त आ गया है कि सिन्धु जल सन्धि की शर्तों का पुनर्निर्धारण किया जाये। पहलगाम में जिस तरह भारतीय पर्यटकों का मजहब पूछ-पूछ कर उनका बेरहमी से कत्ल किया गया था उससे मानवता भी चीत्कार कर उठी थी। इस हत्याकांड का समवेत स्वर से पुरजोर विरोध जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम बहुल जनता ने भी किया था और इसके खिलाफ स्वतः स्फूर्त रूप से कई दिनों के लिए कश्मीर को बन्द रखा था।
वास्तव में 1960 में तत्कालीन प्रधानमन्त्री स्व. पं. जवाहर लाल नेहरू ने बड़ा दिल दिखाते हुए विश्व बैंक की मध्यस्थता में सितम्बर 1960 में इस सन्धि पर कराची में हस्ताक्षर किये थे जबकि पाकिस्तान की तरफ इसके तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब ने दस्तखत किये थे। इस सन्धि का मुख्य आधार आपसी विश्वास व सौहार्द था जिससे जल स्रोतों के अभाव वाले देश पाकिस्तान के लोगों को खेती व पीने का पानी उपलब्ध हो सके। उस समय तक भारत व पाकिस्तान के बीच कश्मीर संघर्ष के अलावा कोई बड़ा युद्ध भी नहीं हुआ था अतः परिस्थितियां पूर्णतः भिन्न थीं।
मगर इसके बाद 1965 व 1971 में दोनों देशों के बीच भीषण युद्ध हुए जिनमें पाकिस्तान ने मुंह की खाई मगर इसके बावजूद हमने सिन्धु जल समझौता जारी रखा। इसके बाद 1989 से पाकिस्तान ने भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ाया और हजार जख्म देने की नीति पर चलना शुरू किया और 1999 में कारगिल जैसा कांड भी किया। मगर पाकिस्तान यहीं नहीं रुका इसने 2002 में भारतीय संसद पर हमले से लेकर 2008 में मुम्बई में नृशंस आतंकवादी हमला भी किया जिसमें 167 के करीब देशी-विदेशी नागरिक मारे गये।
पाकिस्तान यही नहीं रुका, बल्कि वह लगातार भारत में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देता रहा और बेगुनाह नागरिकों की हत्या करता रहा। इसी क्रम में उसने पिछले साल पहलगाम में 20 भारतीय पर्यटकों की हत्या की जिससे मोदी सरकार के सब्र का बांध टूट गया और उसने जल सन्धि को मुल्तवी करने का फैसला कर लिया। अब पाकिस्तान इसके खिलाफ ही शोर मचाता घूम रहा है। इस सन्धि की शर्तों के अनुसार सिन्धु नदी जल ग्राह्य क्षेत्र की छह प्रमुख नदियों को दो श्रेणियों पूर्व व पश्चिम में बांटा गया। इनमें से पूर्व की तीन नदियों ब्यास, रावी व सतलुज के पानी पर भारत को अधिकार दिया गया जबकि पश्चिम की तीन नदियों सिन्धु, चेनाब व झेलम के पानी पर पाकिस्तान को अधिकार दिया गया।
इस प्रकार भारत के अधिकार में सभी छह नदियों की कुल जल क्षमता का केवल 20 प्रतिशत पानी ही आया जबकि पाकिस्तान के हक में 80 प्रतिशत गया। सन्धि की शर्तों के अनुसार पाकिस्तान के हक में गई तीन पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग भारत अपने सिंचाई साधनों के लिए सीमित रूप से ही करेगा परन्तु गैर सिंचाई गत उपयोग के लिए इस पर कोई सीमा लागू नहीं होगी जैसे बिजली उत्पादन व मछली उत्पादन तथा जल मार्ग (नेवीगेशन)। इसका सीधा मतलब यह होता है कि भारत पश्चिम की तीन नदियों के जल का असीमित उपयोग ऐसी गतिविधियों के लिए कर सकता है जिनमें पानी की जमीन में खपत न होती हो यथा पनबिजली परियोजनाएं। भारत सरकार इसी शर्त के अनुरूप चेनाब नदी के विभिन्न जल क्षेत्रों में पांच हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की परियोजनाएं चला रही है जिन्हें लेकर पाकिस्तान हाय-तौबा करता रहता है।
अतः भारत सरकार कह रही है कि सन्धि की कायदे से समीक्षा की जाये और शर्तों का पुनर्निर्धारण किया जाये।
सरकार का मानना है कि सन्धि को बदलते वक्त के अनुसार अधिक सन्तुलित बनाये जाने की सख्त जरूरत है जिससे किसी प्रकार का मतिभ्रम न रहे। सरकार मानती है कि सन्धि अपने पुराने प्रारूप में अब नहीं रह सकती क्योंकि जैसे मौसमी बदलाव आये हैं उनका संज्ञान लिये जाने की आवश्यकता है। भविष्य के सन्धि प्रारूप को तैयार करने के लिए नये सिरे से बातचीत किये जाने की जरूरत है जिससे नई चुनौतियों का मुकाबला किया जा सके। मगर इसके लिए पहली शर्त यह है कि पाकिस्तान सीमा पार का आतंकवाद बन्द करे।
भारत चेनाब नदी पर सावलकोट में 1856 मेगावाट की पनबिजली परियोजना लागू कर रहा है जबकि पकलदुल में 1000 मेगावट , 850 मेगावाट की रतले में और 624 मेगावाट की किरू में तथा 540 मेगावाट की क्वार में। इनमें से कीरू व पकल परियोजनाएं इसी साल के अन्त तक पूरी हो जायेगी जबकि शेष के पूरा होने में दो से तीन वर्ष और लगेंगे। ये सभी परियोजनाएं भारत की बिजली आवश्यकताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं जिनका सम्बन्ध जम्मू- कश्मीर की अर्थव्यवस्था से भी जाकर जुड़ता है। मगर पाकिस्तान जब भारत के इसी वाजिब अधिकार पर शोर मचा रहा है तो सन्धि की समीक्षा करने में तो उसके होश ही फाख्ता हो जायेंगे।



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