क्या नजरबंद हैं नीतीश?

Summary :

‘मैंने भी दरवाज़े पर खरीददार रखा हुआ है जब से तूने गिरवी मेरा किरदार रखा हुआ है यह हौले से झांकता है हर आहट पर बिलावज़ह नहीं तूने किसी को इस हाल में पहली बार रखा हुआ है’ जनतंत्र की इस नई देहरी पर जब आज़ाद सांसें जोर से उच्छवासें भरती हैं और किसी रेलगाड़ी की मानिंद धड़कनें धौंकनी चलने लगती हैं तो इस नए सियासी अंतःपुर का भरोसा डगमगाने लगता है। सुशासन बाबू नीतीश कुमार इन दिनों कहां हैं? क्या कर रहे हैं? क्या किसी को इस बात की खबर है? जबकि दिल्ली व पटना की सत्ता उनके भरोसे…

‘मैंने भी दरवाज़े पर खरीददार रखा हुआ है
जब से तूने गिरवी मेरा किरदार रखा हुआ है
यह हौले से झांकता है हर आहट
पर बिलावज़ह
नहीं तूने किसी को इस हाल में
पहली बार रखा हुआ है’

जनतंत्र की इस नई देहरी पर जब आज़ाद सांसें जोर से उच्छवासें भरती हैं और किसी रेलगाड़ी की मानिंद धड़कनें धौंकनी चलने लगती हैं तो इस नए सियासी अंतःपुर का भरोसा डगमगाने लगता है। सुशासन बाबू नीतीश कुमार इन दिनों कहां हैं? क्या कर रहे हैं? क्या किसी को इस बात की खबर है? जबकि दिल्ली व पटना की सत्ता उनके भरोसे के सहारे सरपट भाग रही है। विश्वस्त सूत्रों के हवाले से खबर मिली है कि नीतीश कुमार इन दिनों दिल्ली में अज्ञातवास पर हैं, उनके स्वास्थ्य की भरपूर निगरानी रखी जा रही है, उनकी सुख-सुविधाओं का भी पूरा ध्यान रखा जा रहा है, पर फिलहाल उनका बाहरी लोगों से मिलना-जुलना एक तरह से बंद ही है।
अपनी जिस राजनैतिक पार्टी जनता दल यू को उन्होंने अपने खून-पसीने से सींच कर इतना बड़ा कर दिया है, उसके अस्तित्व को ही अब प्रतिद्वंद्वी दीमकों ने चाटना शुरू कर दिया है। और तो और उनकी पार्टी के अंदर ही गुटबाजी का ऐसा आलम है कि पार्टी पर विघटन का खतरा मंडराने लगा है। उनकी ही पार्टी के दो सूरमा अनंत सिंह और नीरज कुमार एक-दूसरे पर ऐसे पिले पड़े थे कि जदयू की चूलें हिलने लगी थीं। इधर केन्द्रीय मंत्री ललन सिंह भी केन्द्र बिन्दु हैं तो ऐसे में कयास लग रहे हैं कि 5 नवंबर को आहूत होने वाली जदयू की बैठक में कोई बड़ा हंगामा होने वाला है।
इधर इन बातों से व्यथित नीतीश कुमार पिछले कोई चार बार से पीएम मोदी से मिलने का समय मांग रहे हैं, पर अब तक उन्हें यह सौभाग्य प्राप्त नहीं हो पाया है। सूत्रों की मानें तो इसके बाद नीतीश ने दिल्ली के अपने एक मुंहलगे वरिष्ठ पत्रकार को एक ‘वॉयस नोट’ भेजा, जिसका लब्बोलुआब था कि ‘क्या उन्हें एक बंधक की जिंदगी जीने को मजबूर किया जा रहा है?’ पत्रकार महोदय यह ‘वॉयस नोट’ मिलते ही फौरन हरकत में आ गए, वे भागे-भागे ललन सिंह के पास पहुंचे और उन्हें इस बात की जानकारी दी। कहते हैं इस ‘वॉयस नोट’ में इस बात का जिक्र था कि ‘नीतीश से सीएम पद वापिस लेते हुए उनसे यह वायदा किया गया था कि उन्हें केंद्र में एक अहम मंत्रालय से नवाजा जाएगा, पर वह आज तक नहीं हुआ।’
कहते हैं अपनी व्यथा बताते नीतीश ने बहुत कुछ साफ कर दिया ‘वे अपने पुत्र निशांत को राजनीति में लाने और उन्हें बिहार सरकार में मंत्री बनवाने को कभी उत्सुक नहीं थे। भाजपा व सम्राट ने अपनी इच्छा से यह किया है।’ कहते हैं इस ‘वॉयस नोट’ को सुनने के बाद ललन सिंह ने फौरन भाजपा के बड़े नेताओं से संपर्क साधा, जहां उनसे कहा गया है कि ‘दीपावली से पहले नीतीश जी से मिल लिया जाएगा और केंद्रीय मंत्रिमंडल का जब भी अगला फेरबदल होगा नीतीश के मनोभावों को उसमें जगह मिलेगी।’
क्या दिल्ली आएंगे फड़णवीस?
केंद्र सरकार ने जितनी भी दफे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस को दिल्ली आने का और केंद्रनीत सरकार में मंत्री बनने का ऑफर दिया है, कहते हैं, हर बार ही चतुर सुजान फड़णवीस ने विनम्र शब्दों में दिल्ली आने से मना कर दिया है और कहा है कि ‘वे मुंबई में ही ठीक हैं।’ पर कुछ तो वज़ह रही होगी कि इस दफे दिल्ली का रूख किंचित कड़ा दिखता है और एकबारगी पुनः फड़णवीस से कहा गया है कि ‘वे दिल्ली आने की तैयारियां शुरू कर दें।’ सूत्रों की मानें तो फड़णवीस से कहा गया है कि ‘एक बार जब वे दिल्ली आ जाते हैं तो उन्हें उनका मनमाफिक मंत्रालय दिया जा सकता है।’
वैसे भी फड़णवीस की कुर्सी पर लंबे समय से ​िशवसेना नेता एकनाथ ​िशंदे की निगाहें जमी हैं, पर भाजपा के इरादे कुछ और बताए जाते हैं, फड़णवीस की जगह वह अपने पिटारे से एक चौंकाने वाला नाम निकाल कर सबको भौचक्का कर सकती है, यह नाम है महाराष्ट्र भाजपा के मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष रवीन्द्र चव्हाण का। यह डोम्बिवली से भाजपा विधायक हैं और दिल्ली के साथ-साथ संघ के भी उतने ही दुलारे हैं।
संघ ने अमेरिका में किस नाम से पंजीकरण कराया है?
सूत्रों की मानें तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अमेरिका में ‘आरएसएस फ्रेंडस’ के नाम से अपना पंजीकरण कराया है। यह पंजीकरण ‘फॉरेन एजेंट्स रजिस्ट्रेषन एक्ट’ (फारा) के तहत यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस (अमेरिकी न्याय विभाग) में हुआ है। यह पंजीकरण अमेरिका में रह रहे कुछ संघ शुभचिंतकों ने 27 अगस्त 2026 को कराया है, क्या यह महज़ इत्तफाक है कि यह पंजीकरण संघ प्रमुख मोहन भागवत के न्यूयॉर्क स्थित मेडिसन स्क्वायर गार्डन प्रोग्राम के ठीक दो दिन पहले हुआ था।
जब संघ प्रमुख वहां ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन’ में हिस्सा लेने न्यूयॉर्क पहुंचे थे। सनद रहे कि ‘फारा’ के 84 सालों के इतिहास में पहली बार संघ को विदेशी प्रधान के रूप में नामित किया गया है, क्योंकि अमेरिकी न्याय विभाग में जमा दस्तावेजों में इस संगठन का स्थानीय पता जार्जिया के पीएच ट्री कॉनर्स का है, जबकि नई दिल्ली के झंडेवालान स्थित संघ मुख्यालय ‘केशव कुंज’ को फॉरेन प्रिंसिपल (विदेश प्रधान) के तौर पर दर्ज किया गया है। हालांकि इस समूह ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि ‘उनके व संघ के बीच इस संस्था को लेकर कोई परामर्श, लॉबिंग या एजेंसी समझौता नहीं है।’ पर जानकार इसे संघ की अपनी वैश्विक पहुंच बढ़ाना और पश्चिमी मीडिया में अपनी छवि सुधारने की कवायद के तौर पर देख रहे हैं।
मोदी की आंखों के तारे ये दो मंत्री हमारे
मौजूदा केंद्रीय कैबिनेट में दो मंत्रियों की तूती बोल रही है। इसमें से एक हैं गुजरात से आने वाले सीआर पाटिल जो केंद्रीय जल शक्ति मंत्री हैं। साथ ही यह गुजरात प्रदेश भाजपा के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं। ये चार बार के लोकसभा सांसद हैं, इनका लोकसभा क्षेत्र नवसारी है। कहते हैं इन दिनों प्रधानमंत्री अपने कई अहम राजनैतिक निर्णयों में पाटिल की राय को महत्व दे रहे हैं। इसके अलावा उन्हें दो चुनावी राज्यों पंजाब व उत्तराखंड में भी एक अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है।
दूसरे मंत्री हैं केंद्रीय सूचना प्रसारण व रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव भी बहुत मजबूत है और जब-जब बात अहम प्रशासनिक निर्णयों की होती है तो वैष्णव की इसमें तूती बोलती है। केंद्र सरकार की हर अहम पॉलिसी उनसे होकर गुजरती है, वे इस पर मंथन करते हैं और सीधे पीएम मोदी को अपनी भावनाओं से अवगत कराते हैं। अब भगवा सियासत में इस बात पर कयास जारी है कि ‘आखिरकार सीआर पाटिल को किस नेता के विकल्प के तौर पर उभारा जा रहा है,’ वहीं अश्विनी वैष्णव के केंद्र में मंत्री बनने से पहले सरकार की नीतिगत फैसलों पर मंथन और उन्हें खंगालने का काम पीयूष गोयल का हुआ करता था।
दो नावों की सवारी और शरद पवार
शरद पवार परिवार को लगता है अब दो नावों की सवारी रास नहीं आ रही है, सो अब वह एनडीए व इंडिया गठबंधन को लेकर अपना स्टैंड साफ करना चाहते हैं। पिछले दिनों जब राकांपा प्रमुख शरद पवार की सांसद पुत्री सुप्रिया सूले की महाराष्ट्र के मराठी साहित्यकारों से एक अहम मीटिंग आहूत थी तो सियासी पक्षपातों से अलहदा वहां मौजूद साहित्यकारों ने सुप्रिया से कई चुभते सवाल पूछ डाले। पर सुप्रिया ने मजबूती से अपना व अपने पिता का पक्ष उनके समक्ष रखा।
इस बैठक में एक बजुर्ग व नामधन्य मराठी साहित्यकार ने सुप्रिया से दो टूक पूछ लिया कि ‘हम पिछले 50 सालों से शरद जी के साथ हैं, सो, यह जानने में हमारी दिलचस्पी है कि ‘परिसीमन बिल’ व ’वोट चोरी’ पर पार्टी का आधिकारिक स्टैंड क्या है? क्योंकि आप दोनों पीएम मोदी से मिल कर उन्हें परिसीमन बिल पर समर्थन देने की बात पहले ही कह चुके हैं, अब आप रामलीला मैदान पर आयोजित होने वाली विपक्षी रैली में शामिल होने का इरादा रखते हैं।’ तो सुप्रिया ने सफाई देते हुए कहा-जब हम पीएम से मिले थे तो हमारी पार्टी पर टूट का खतरा मंडरा रहा था, आज स्थितियां बदल गई हैं, विपक्ष के तेवर भी बदल गए हैं और इसके इरादे भी, सो हम फिलहाल तो विपक्ष के हाथ मजबूत करना चाहते हैं।
…और अंत में
बात सिर्फ विपक्षी दलों के सीएम तक सीमित नहीं है, भाजपा शीर्ष अब अपने मुख्यमंत्रियों से भी उतनी ही सख्ती से पेश आ रहा है। पिछले दिनों भाजपा शीर्ष ने कम से कम अपने दो मुख्यमंत्रियों के विदेशी दौरों को ‘ना’ कह दिया। जबकि ये दोनों ही दिल्ली के अत्यंत दुलारे मुख्यमंत्री हैं।
इनमें से एक हैं असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा जो ‘प्रवासी असमिया दिवस’ के लिए शायद अमेरिका की ठौर पकड़ना चाहते थे, दूसरे सीएम हैं ओडिशा के मोहन मांझी, जिनका ‘प्रवासी ओडिशा दिवस’ के लिए सिंगापुर जाने का प्लॉन था, वह भी अपने पूरे दल-बल के साथ। केंद्र ने इन दोनों मुख्यमंत्रियों को न सिर्फ विदेश जाने की परमिशन देने से मना कर दिया, बल्कि उन्हें कड़ी डांट भी लगाई गई कि ‘विदेश की जगह अपने प्रदेश पर ध्यान लगाइए। विदेश का मामला केंद्र देख लेगा।’

त्रिदीब रमण