परिवार और समाज में सबसे अहम अगर कोई चीज है तो वह रिश्ते हैं, जिन्हें हम निभाते हैं। आपसी रिश्ते चाहे भाई-बहन, माता-पिता या पति-पत्नी के हों, उनकी पवित्रता से इन रिश्तों को मजबूती मिलती है और आगे चलकर यही रिश्ते उदाहरण बनते हैं, सच तो यही है कि इनके दम पर ही हम संस्कारों व संस्कृति की स्थापना करते हैं। इस कड़ी में पिछले दिनों दो ऐसी खबरें उभर कर सामने आईं जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं। उन्हें पढ़कर सचमुच रूह भी कांप उठती है। मेरठ की एक विवाहित महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति सौरभ की हत्या करवा दी और शव के टुकड़े-टुकड़े करके उसे सीमेंट से भरे एक नीले ड्रम में छिपा दिया ताकि लाश का पता ही न चले। इस महिला और उसके प्रेमी को अदालत ने दुर्लभ श्रेणी का मर्डर केस मानकर मृत्यु दंड की सजा सुनाई। इसी मेरठ से एक और चौंकाने वाली खबर है कि एक महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर अपने पति का गला घोट दिया। इसके बाद वहां एक सांप छोड़ दिया और प्रचार किया कि सांप ने उसके पति को डंस लिया है। यह हत्या सांप कांड के नाम से चर्चित हुई और माननीय अदालत ने पत्नी और उसके प्रेमी को हत्या का दुर्लभतम केस मानते हुए दोनों को फांसी की सजा सुनाई।
जिस देश में रिश्तों की पवित्रता के उदाहरण दिए जाते हों वहां ये घटनाएं होना बड़ा दुखदायी है लेकिन सकून है कि अदालत ने दोषियों को फांसी दिए जाने का ऐलान भी किया। इसी कड़ी में पुणे में एक युवती ने अपने मंगेतर की हत्या इसी साल करवाई जबकि इन्दौर के केस में सोनम रघुवंशी ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या कर दी। इन दोनों केसों पर अभी कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इनके अलावा ऐसी सैकड़ों घटनाएं पिछले सिर्फ तीन साल में हुई जिन पर अदालतों में सुनवाई चल रही है। यह रिश्तों का कत्ल नहीं तो और क्या है? समाज नारी का यह कौन सा रूप देख रहा है जिसमें पत्नियां अपने प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्याएं कर रही हैं। हत्याएं भी इतने वीभत्स तरीके से हो रही हैं कि आत्मा तक कांप रही है।
आखिरकार समाज जा कहां रहा है? ऐसी विवाहित महिलाओं पर ऐसा कौन सा दबाव है, ऐसा कौन सा तनाव है, ऐसा कौन सा अविश्वास है कि जिस पति के साथ फेरे लिए उसकी हत्या करवा रही हैं। दूसरे व्यक्ति को अपना बनाने के लिए अपने पति को मार डालना यह बहुत बड़ा पाप और विश्वासघात है। जिस पति को परमेश्वर कहा गया उसकी इतनी निर्दयता के साथ हत्या कर देना यह समाज के लिए और आधुनिक परिवारों के िलए बहुत ही दु:खद बात है। जिस माता-पिता ने अपना बेटा खोया वहीं उस महिला ने क्या प्राप्त कर लिया जिसने प्रेमी को पाने के लिए हत्या करवाई। इसका जवाब कौन देगा? विवाह के बाद लड़ाई-झगड़े और रिश्तों के टकराव या संपत्ति के विवाद ऐसे आरोप एक-दूसरे पर लगते हमने खूब देखे और पढ़े हैं लेकिन पिछले दिनों हुई ये चर्चित हत्याओं की घटनाएं सचमुच रिश्तों की पवित्रता पर सवाल खड़ा कर रही हैं। अकेला प्रेम संबंध ही अगर इसकी वजह बताया जा रहा है तो किसी भी स्थिति में परिवारों में हिंसा का यह मार्ग स्वीकार नहीं किया जा सकता। इसकी जितनी निन्दा की जाए वह कम है।
मुझे तो यही कहना है कि आज परिवारों के सिर पर बड़े-बुजुर्गों का होना बहुत जरूरी है। बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया के बीच हमारी नई पीढ़ी अपनी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अंतर्गत ज्यादा से ज्यादा सुख उठाने में संयुक्त परिवारों से दूर हो रही है। सच बात तो यह है कि संयुक्त परिवार अब खत्म हो रहे हैं। भगवान श्रीराम जैसे आदर्श परिवार और संस्कार जीवन में कहां रह गए हैं? पति-पत्नी के बीच रिश्ते में इस कद्र अविश्वास पैदा हो रहा है कि बात हत्या तक आ जाए तो इसे क्या कहेंगे। व्यक्तिगत रूप से मुझे यही कहना है कि माननीय अदालतों ने दोषियों को जो मृत्युदंड दिया है यह इसलिए स्वागत योग्य है क्योंकि यह दोनों घटनाएं 2025 में हुई और उनका फैसला एक वर्ष में ही आ गया। किसी अपराध का जल्दी फैसला होने का मतलब है पीडि़त पक्ष को इंसाफ मिल जाना।
अब लंबी-चौड़ी कोर्ट-कचहरी और तारीखों की परंपरा खत्म करनी होगी तथा उन संस्कारों को फिर से जागृत करना होगा जो हमारे परिवारों की पहचान रहे हैं। संस्कार जगाने के लिए कुछ भी करना पड़े वह करना चाहिए लेकिन हत्याएं बंद होनी चाहिए। परिवारों में संवाद बढ़ना चाहिए। पति-पत्नी के बीच कोई झगड़ा होता है तो पहले माता-पिता और बड़े-बुजुर्ग उन्हें संभाल लेते थे लेकिन अब इन रिश्तों को बचाना होगा जिसका मतलब इंसानियत को बचाना होगा। अगर कोई जीवनसाथी चुनने में सहमति नहीं बन रही तो किसी भी दबाव के तहत शादी करना और फिर हत्या करना यह तो हमारी परंपरा नहीं है। हमारी नई पीढ़ी और परिवारों को बचाना है तो संयुक्त परिवार और संस्कार फिर से पैदा करने होंगे तभी रिश्तों का कत्ल होने से रोका जा सकता है और ऐसा करना समय की मांग भी है। जिन कन्याओं को हम बेिटयां व बहू मानते हैं, उनकी यह कैसी सोच है कि अपनी पसंद को सही ठहराने के िलए हत्याओं जैसी साजिश को अंजाम देना पड़े। इस मानसिकता को कंट्रोल करने का समय आ गया है। इसमें देरी नहीं होनी चाहिए और जो ऐसा करते हैं उन्हें सजा भी तुरन्त मिलनी चाहिए। यही परम्परा शुरू करनी होगी।
रिश्तों का कत्ल
Summary :
परिवार और समाज में सबसे अहम अगर कोई चीज है तो वह रिश्ते हैं, जिन्हें हम निभाते हैं। आपसी रिश्ते चाहे भाई-बहन, माता-पिता या पति-पत्नी के हों, उनकी पवित्रता से इन रिश्तों को मजबूती मिलती है और आगे चलकर यही रिश्ते उदाहरण बनते हैं, सच तो यही है कि इनके दम पर ही हम संस्कारों व संस्कृति की स्थापना करते हैं। इस कड़ी में पिछले दिनों दो ऐसी खबरें उभर कर सामने आईं जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं। उन्हें पढ़कर सचमुच रूह भी कांप उठती है। मेरठ की एक विवाहित महिला ने अपने प्रेमी के साथ मिलकर…


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