2000 के दशक की शुरुआत में, गुजरात में बिजली की समस्या थी, जो वास्तव में एक वित्तीय समस्या भी थी। आपूर्ति की गई बिजली का एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा पारेषण और वितरण में बर्बाद हो जाता था। बिजली-बिल की वसूली कमजोर थी और ग्रामीण इलाकों में बिजली आपूर्ति भरोसेमंद नहीं थी। राज्य बिजली दर में तेज वृद्धि कर सकता था, आपूर्ति में कमी ला सकता था या नुकसान खुद झेल सकता था।
गुजरात ने एक मुश्किल रास्ता चुना। बकाया बिजली बिलों की सख्ती से वसूली करने के उदाहरण बहुत कम थे, और पैसा न चुकाने वालों के ख़िलाफ़ कार्रवाई को राजनीतिक आत्महत्या माना जाता था। फिर भी, मुख्यमंत्री ने यह कदम उठाया। बिल-प्रणाली को सख्त किया गया, बिजली चोरी रोकने के लिए कार्रवाई की गई और भुगतान के तरीके बढ़ाए गए। ‘ज्योतिग्राम’ योजना के तहत खेती के लिए बिजली आपूर्ति करने वाले फ़ीडर्स को अन्य ग्रामीण आपूर्ति से अलग कर दिया गया, जिससे खेती के लिए बिजली आपूर्ति की अवधि तय हो गयी और बाकी लोगों के लिए भी आपूर्ति सेवा बेहतर हुई।
आंकड़ों में तेज़ी से बदलाव आया। नकद-संग्रह 2003-04 के रु. 9,176 करोड़ से बढ़कर 2006-07 में रु.13,101 करोड़ हो गया। पारेषण और वितरण से होने वाला नुकसान 2002-03 के 35.9% से घटकर 2006-07 में 21.5% रह गया। उस समय मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। सरकार के प्रमुख के तौर पर उनके लगातार 25 साल पूरे होने के मौके पर, वह घटना उनके आर्थिक कामकाज, खासकर वित्तीय अनुशासन को समझने का एक अच्छा नज़रिया प्रदान करती है। वित्तीय अनुशासन क्यों ज़रूरी है? क्योंकि पैसा कहीं न कहीं से तो आना ही चाहिए।
सड़कों, रेलवे, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और कल्याणकारी योजनाओं के लिए कोष की ज़रूरत होती है। पर्याप्त राजस्व के बिना, खर्च करने का मतलब है ज़्यादा वित्तीय घाटा, ज़्यादा उधार और शायद ज़्यादा महंगाई भी, जिससे अंततः उन फ़ायदों का मूल्य कम हो जाता है, जिन्हें लोगों तक पहुंचाना था। वित्तीय अनुशासन राज्य की निवेश करने, परिवारों की मदद करने और ज़रूरत पड़ने पर हालात के हिसाब से कदम उठाने की क्षमता को बनाए रखता है। लेकिन हिसाब-किताब को संतुलित करने का एक और तरीका है: खर्च में कटौती।
सरकार अगले साल बनने वाले पुल को रद्द करके इस साल के घाटे को हमेशा कम दिखा सकती है। सड़क और रेलवे परियोजनाओं में देरी की जा सकती है, सिंचाई योजनाओं को टाला जा सकता है। बचत खातों में तुरंत दिख जाती है, लेकिन उत्पादक क्षमता और भविष्य के विकास का जो नुकसान होता है, वह नहीं दिखता। असली वित्तीय अनुशासन का मतलब है लंबी अवधि की वित्तीय स्थिरता से समझौता किए बिना ज़रूरी खर्चों के लिए गुंजाइश बनाना। इसका अर्थ है यह जानना कि कब खर्च करना है, कहां खर्च करना है और इसका भुगतान कैसे करना है।
हमारी हाल की रिपोर्ट, ‘वित्तीय अनुशासन, गुजरात से केंद्र तक: शेष राशि, कर्ज और परिव्यय पर साक्ष्य, 2001–2026’, दोनों सरकारों के सन्दर्भ में इस नज़रिए की पड़ताल करती है। इससे जो बात सामने आती है, वह है राज्य की काम करने की क्षमता को बनाए रखने की सोच। बेहतर तरीके से टैक्स संग्रह, लीकेज कम करना, ब्याज की लागत को प्रबंधित करना और उस अर्थव्यवस्था का विस्तार करना, जिससे भविष्य में राजस्व की प्राप्ति होगी।
केंद्र सरकार ने भी यही तरीका अपनाया। एक बड़े आधार के ज़रिए संग्रह बेहतर हुआ। जीएसटी ने ई-वे बिल, इनपुट-क्रेडिट तुलना और ई-इनवॉइस के ज़रिए लेन-देन को प्रणाली में शामिल किया। शुरुआती साल मुश्किल भरे थे। फिर भी, सकल संग्रह पहले पूरे साल 2018-19 के रु.11.8 लाख करोड़ से बढ़कर 2023-24 में रु.20 लाख करोड़ से ज़्यादा हो गया। कल्याण संरचना के जरिये लीकेज कम हुआ। प्रत्यक्ष अंतरण से फायदे सीधे बैंक खातों में पहुँचने लगे, जबकि आधार से जुड़े भुगतान ने नकली और फर्जी लाभार्थियों को प्रणाली से बाहर कर दिया।
साथ ही, आवास, शौचालय, खाना पकाने की गैसऔर बिजली जैसी सुविधाओं के ज़रिए कल्याण कार्यों का दायरा भी बढ़ा। फिर कोविड महामारी आयी। भारत का प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन बड़ी विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी सीमित था। आईएमएफ की अप्रैल 2021 की तुलना के अनुसार, घोषित अतिरिक्त खर्च और राजस्व के नुकसान की कुल रकम अमेरिका में जीडीपी की 25.5% थी, जबकि भारत में यह 3.3% थी। भारत ने ऋण गारंटी और ऐसे दूसरे उपायों पर ज़्यादा भरोसा किया, जिनसे तुरंत डिमांड नहीं बढ़ी। सहायता मुख्य रूप से भोजन, रोज़गार, स्वास्थ्य और लक्षित अंतरण पर केंद्रित थी।
मुफ्त अनाज एक अहम ज़रिया बन गया, जिसे बाद में पीएमजीकेएवाई के तहत लगभग 81 करोड़ लोगों के लिए जारी रखा गया। इसका असर महंगाई दर में दिखा। जून 2022 में अमेरिका में उपभोक्ता महंगाई दर 9.1% तक पहुंच गई, जो 40 साल में सबसे ज़्यादा थी। भारत में सीपीआई महंगाई दर अप्रैल 2022 में 7.8% के उच्चतम बिंदु पर पहुंच गयी और नवंबर तक आरबीआई के 2-6% के दायरे में वापस आ गई। घाटे से वित्तपोषित मांग को सीमित करके, भारत ने महंगाई दर पर दबाव के एक स्रोत को नियंत्रित किया। वित्तीय संयम से कल्याण सुविधाओं के वास्तविक मूल्य को बनाए रखने में मदद मिली।
महामारी के बाद वित्तीय मजबूती की प्रक्रिया तेज़ी से फिर से शुरू हुई। घाटा 2021-22 में जीडीपी के 6.7%, 2022-23 में 6.4%, 2023-24 में 5.6% और 2024-25 में 4.8% तक कम हो गया। इस दौरान, 2020-21 और 2024-25 के बीच केंद्र का पूंजीगत व्यय दोगुने से भी ज़्यादा बढ़कर रु.4.3 लाख करोड़ से रु.10.5 लाख करोड़ हो गया। उधार लेने की लागत ने इस चक्र को पूरा किया। वैश्विक बॉन्ड बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद भारतीय सॉवरेन बॉन्ड काफी हद तक स्थिर रहे, जबकि यूएस ट्रेजरी के साथ प्राप्ति अंतर कम हो गया।
सरकारी कर्ज भविष्य के राजकोषीय संसाधनों पर एक दावा है, और बॉन्ड बाजार इसकी स्थिरता का मूल्य तय करते हैं। सूचकांक में शामिल होने से मांग बढ़ने से पहले ही, कम होते घाटे ने उस रास्ते को और अधिक विश्वसनीय बना दिया था। राजकोषीय अनुशासन का मतलब घाटे से परहेज करना नहीं है। इसका मतलब है उन पर बाज जैसी पैनी नज़र रखना। जब विकास को समर्थन की ज़रूरत हो या कोई असाधारण उथल-पुथल हो, तो खर्च बढ़ाया जा सकता है,
लेकिन अनुशासन को उस लागत को उठाने के लिए राजकोषीय गुंजाइशऔर बाद में उसे ठीक
करने के लिए एक विश्वसनीय रास्ते की ज़रूरत होती है। 25 वर्षों और सरकार के दो स्तरों के
दौरान, यही वह बात है जिसके कारण नरेन्द्र
मोदी को वित्तीय अनुशासन का पक्का समर्थक कहा जाता है।


Download Android App
Download iOS App




