ईरान को घुटनों के बल लाने के लिए अमेरिका कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहा है, बमों की बौछार हो रही है। ईरान भी पलटवार कर रहा है, मगर इन सबके बीच एक खास तरह के रूसी विमान ने तेहरान की सरजमीं पर उतर कर पूरी दुनिया में सनसनी फैला दी है। इस विमान को डूम्सडे विमान कहा जाता है। डूम्सडे का शाब्दिक अर्थ प्रलय या कयामत का दिन होता है। यह विमान खासतौर पर वैसे ही दिन के लिए तैयार किया गया है। सबसे पहले यह समझिए कि यह डूम्सडे विमान होता क्या है? दुनिया में घोषित तौर पर अमेरिका, रूस और चीन के पास इस तरह के विमान हैं।
मगर अघोषित रूप से भी कुछ और देशों के पास ऐसे विमान हो सकते हैं, यदि कहीं परमाणु हमला हो जाए तो यह विमान देश चलाने वाले नेताओं और अधिकारियों को लेकर न केवल सुरक्षित उड़ जाएगा बल्कि हवा में रहते हुए इसमें बैठे नेतृत्वकर्ता दुश्मन देश पर हमले के लिए कमांड भी दे सकते हैं। यह विमान परमाणु हमले को भी सुरक्षित तौर पर झेल सकता है। सामान्य तौर पर यह विमान सात हजार किलोमीटर दूर तक सफर कर सकता है लेकिन इसमें बीच रास्ते में हवा में ही ईंधन भरने की क्षमता भी है जिसके कारण यह और लंबी दूरी तय कर सकता है, तो हुआ यह कि विमानों की उड़ान पर नजर रखने वालों ने देखा कि रूस का डूम्सडे विमान 13 जुलाई को तेहरान के इमाम खुमैनी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरा और कुछ घंटों के बाद चीन की राजधानी बीजिंग के लिए रवाना हो गया।
अब सबके सामने यही गंभीर सवाल है कि उड़ता हुआ क्रेमलिन कहा जाने वाला यह विमान ईरान क्यों पहुंचा? क्या यह किसी खास सुरक्षा बैठक के लिए पहुंचा था? क्योंकि इस रूसी विमान में खास एन्क्रिप्टेड सैटेलाइट लिंक और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शील्डिंग लगी है और अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक जासूसी यहां काम नहीं कर सकती। तो क्या तेहरान में बैठे किसी खास व्यक्ति से पुतिन को बात करनी थी? क्या यह विमान तेहरान से किसी खास व्यक्ति को लेकर उड़ा या फिर किसी खास व्यक्ति को तेहरान छोड़ने आया था? यह सवाल इसलिए क्योंकि यह बात चर्चा में थी कि अमेरिकी हमले में घायल होने के बाद मोजतबा को सुरक्षा की दृष्टि से रूस में रखा गया था, मगर ये सब बस मन में उठने वाले सवाल हैं जिनका जवाब स्पष्ट रूप से कहीं मौजूद नहीं है लेकिन एक बात साफ है कि रूस ने डूम्सडे विमान तेहरान भेजकर साफ संकेत दे दिया है कि वह ईरान के साथ मजबूती से खड़ा है।
वैसे भी दोनों देशों ने पिछले साल 20 वर्षों की व्यापक रणनीतिक साझेदारी पर हस्ताक्षर किए थे, दोनों देश सैटेलाइट तस्वीरों और डाटा के साथ ही अन्य खुफिया जानकारियां साझा कर रहे हैं। एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम और अत्याधुनिक लड़ाकू विमान भी ईरान को मिलने वाले हैं। संभव है कि मिल भी गए हों, हालांकि समझौते में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि ईरान पर हमला होने की स्थिति में रूस सीधे तौर पर युद्ध में शामिल होने के लिए बाध्य हो लेकिन इस पर कोई रोक भी नहीं है। तो सवाल है कि क्या रूस ऐसा करेगा? मुझे नहीं लगता कि रूस को सीधे जंग में शामिल होने की कोई जरूरत है, हां, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की पर पुतिन की नजर जरूर है।
जेलेंस्की ने खाड़ी देशों की यात्राएं की हैं और सऊदी अरब तथा कतर के साथ महत्वपूर्ण रक्षा सहयोग समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए हैं, इसलिए रूस के लिए जरूरी हो गया है कि वह ईरान के माध्यम से न केवल अमेरिका बल्कि खाड़ी के देशों को झटका दे। चीन की चतुर चाल ने रचा है मायाजाल एक सवाल अधूरा रह गया कि प्रलय के दिन वाला विमान तेहरान से उड़कर सीधे मास्को न लौटने के बजाय बीजिंग क्यों गया? क्या किसी को तेहरान से बीजिंग पहुंचाने गया था? यदि हां, तो वह कौन था? यदि नहीं, तो फिर बीजिंग जाने की जरूरत क्या थी? तेहरान से मास्को की हवाई दूरी करीब 2500 किमी है जबकि डूम्सडे विमान ने तेहरान से बीजिंग होते हुए मास्को पहुंचने के लिए करीब 11500 किलोमीटर की उड़ान भरी।
यानी कहीं न कहीं कुछ मामला तो था, फिलहाल अमेरिका भी इस विमान को लेकर मौन है। तो क्या उसे विमान का रहस्य समझ में नहीं आया? क्योंकि कुछ समझ में आया होता तो ट्रम्प साहब कहां चुप रहने वाले थे। ट्रम्प साहब खुले हृदय के हैं, कुछ भी छिपा कर नहीं रखते। इधर पुतिन और शी जिनपिंग हैं कि कुछ बोलते ही नहीं। सोनम वांगचुक और राजनीति का सवाल पर्यावरण और शिक्षा के क्षेत्र में इनोवेशन के लिए सोनम वांगचुक की जितनी तारीफ की जाए, वो कम ही होगी।
उनके प्रयोगों ने लेह लद्दाख क्षेत्र के जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने का रास्ता दिखाया है, उनकी जिंदगी देश की धरोहर है, इसलिए उन्होंने जब आमरण अनशन शुरू किया तो मेरे मन में ये सवाल उठा कि क्या उन्हें अपने सम्मान का राजनीतिक उपयोग किसी को करने देना चाहिए? आपको याद होगा कि देश की वाजिब समस्याओं को लेकर अन्ना हजारे ने भी अनशन किया था लेकिन जैसे ही उन्हें एहसास हुआ कि उनका राजनीतिक उपयोग करने की कोशिश की जा रही है, उन्होंने खुद को अलग कर लिया था। मुझे लगता है कि सोनम वांगचुक की ज्यादा जरूरत पर्यावरण और शिक्षा को है, ईश्वर से प्रार्थना कर रहा हूं कि वे स्वस्थ और सक्रिय रहें। राजनीति के शिकार न बनें।



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