स्पेन ने 16 वर्ष बाद फीफा फुटबाल वर्ल्ड कप का खिताब जीत लिया है। स्पेन ने फाइनल में 2022 की चैम्पियन अर्जेन्टीना को एकमात्र गोल से हराकर बादशाहत हासिल की है। स्पेन के लिए अतिरिक्त समय में फेरन टोरेस द्वारा किए गए गोल की बदौलत स्पेन ने 16 वर्ष बाद दूसरी बार ट्राफी अपने नाम की। यह फाइनल एक तरह से दो पीढ़ियों का मुकाबला भी था। एक तरफ 39 साल के लियोनेल मेस्सी थे, दूसरी ओर 19 साल के लामिन यमाल। मेस्सी की मौजूदगी में अर्जेन्टीना की हार एक बहुत बड़ा झटका है।
2007 के एक फोटो शूट के दौरान लियोनेल मेस्सी ने 6 महीने के लामिन यमाल को गोद में उठाया था। यह तस्वीर पूरी दनिया में वायरल हो चुकी है। अब उसी यमाल ने मेस्सी को हरा दिया। फुटबाल का बुखार न केवल विदेशों में दिखाई दिया बल्कि भारत में भी दिखाई दिया। स्पेन की ऐतिहासिक जीत पर स्पेन ने तो जश्न मनाया ही बल्कि दुनियाभर के फुटबाल प्रेमियों ने स्पेन टीम की जमकर तारीफ की। मुम्बई, पश्चिम बंगाल के कई शहरों और तिरुवंतपुरम में भी जश्न का माहौल देखा गया।
फाइनल मैच का अगर विश्लेषण किया जाए तो यह स्पष्ट है कि स्पेन ने पूरे मुकाबले में अर्जेन्टीना के मुकाबले अधिक और बेहतर मौके हासिल किए जबकि अर्जेन्टीना टीम रक्षात्मक होकर खेलती रही। स्पेन की मिडफील्ड और डिफैंस ने मेस्सी को खुलकर खेलने का मौका ही नहीं दिया जबकि यमाल लगातार अर्जेन्टीना की डिफैंस पर आक्रमण करते रहे। स्पेन ने 65 प्रतिशत समय फुटबाल को अपने पास रखा और अर्जेन्टीना को काउंटर अटैक का मौका ही नहीं दिया।
मेस्सी ने टूर्नामेंट में 8 गोल किए थे लेकिन इस मैच में वह गोल ही नहीं कर पाए। वह केवल एक शॉट ही लगा सके और वह भी गोल के निशाने पर नहीं लगा। यह कहा जा सकता है कि अर्जेंटीना की सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि उसने स्पेन के लगातार हमलों का सामना करते हुए मैच को अतिरिक्त समय तक खींच लिया। खासकर 93वें मिनट में एंज़ो फर्नांडेज को दूसरा पीला कार्ड मिलने के बाद 10 खिलाड़ियों के साथ खेलते हुए निर्धारित समय तक बराबरी बनाए रखना आसान नहीं था।
मैच के अंतिम क्षणों में अर्जेंटीना के पास जीत छीनने का भी मौका था। जूलियानो सिमोने की अगुवाई में दो खतरनाक हमले हुए, लेकिन यदि फुटबॉल में भी किस्मत होती है तो वह इस दिन स्पेन के साथ थी। एक मौका कॉर्नर में बदल गया, जबकि दूसरा शॉट गोलपोस्ट के ऊपर से निकल गया।
स्पेन की पहचान टिकी-टका शैली से है। इसमें छोटे-छोटे पास, फुटबाल पर लम्बे समय तक कब्जा और अटैक करना शामिल है। इसी शैली की बदौलत स्पेन ने 2008 यूरो, 2010 फीफा वर्ल्ड कप और 2012 में यूरो कप जीता था। स्पेन टीम की ताकत है बेहतर तालमेल और एकजुट होकर खेलना। एकजुटता की ताकत का प्रदर्शन ही स्पेन की जीत का कारण रहा। स्पेन की सफलता का श्रेय उसके मुख्य कोच लूइस दे ला फुयंते को जाता है जिन्होंने टीम को सजाया-संवारा। कोच टीम का सबसे महत्वपूर्ण खिलाड़ी होता है।
स्पेनिश फुटबाल को बदलने के लगभग तीन दशक बाद 2026 वर्ल्ड कप इस सोच की पुष्टि करता है। स्पेन की टीम के सामने अर्जेन्टीना के कोच स्कालोनी खड़े थे। जिन्होंने स्पेनिश कोचिंग सिस्टम से लाइसैंस हासिल किया था। स्पेन के कोच फुयंते स्कालोनी के इंस्ट्रक्टरों में से एक थे। इस तरह यह मुकाबला शिक्षक बनाम छात्र भी था। स्पेन का फुटबाल मॉडल ही उसकी जीत की फैक्टरी बना हुआ है। स्पेन में 6-7 साल की उम्र से बच्चों को क्लब अकादमियों में ट्रेनिंग मिलनी शुरू हो जाती है।
देशभर में हजारों कोच एक तय तकनीकी मॉडल पर खिलाड़ियों को तैयार करते हैं। हर उम्र वर्ग की राष्ट्रीय टीम एक जैसी खेलने की शैली अपनाती है, इसलिए सीनियर टीम में पहुंचने पर खिलाड़ियों को अलग ढंग से ढलना नहीं पड़ता। बार्सिलोना की ला मासिया और रियल मैड्रिड की ला फाब्रिका दुनिया की सबसे सफल फुटबॉल अकादमियों में गिनी जाती हैं। इन्हीं अकादमियों से जावी, इनिएस्ता, बुस्केट्स, कार्लेस पुयोल, इकर कैसियास, राउल जैसे दिग्गज निकले। यही मॉडल स्पेन की राष्ट्रीय टीम की रीढ़ माना जाता है। ला लीगा दुनिया की सबसे लोकप्रिय फुटबॉल लीग में गिनी जाती है।
रियल मैड्रिड और बार्सिलोना जैसे क्लबों ने मिलकर दर्जनों यूरोपीय खिताब जीते हैं। लियोनेल मेस्सी ने अपने क्लब करियर का अधिकांश हिस्सा बार्सिलोना के साथ इसी लीग में खेला और 474 गोल कर लीग के सर्वकालिक शीर्ष स्कोरर बने। भारत में भी प्रतिभाओं की कमी नहीं है। अगर हमने फुटबाल में पुराना गौरव हासिल करना है तो हमें भी स्पेन, अर्जेन्टीना जैसा मॉडल अपनाना होगा ताकि बचपन से ही जीत की शुरूआत की जा सके। अगर बच्चों की ग्रूमिंग सही ढंग से हो तो देश की अकादमियां उन्हें सुपर स्टार बना देंगी।


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