बीजेपी के सबसे वरिष्ठ ब्राह्मण नेता मुरली मनोहर जोशी की राजनीतिक परिदृश्य में वापसी, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटों को लेकर पार्टी की बढ़ती चिंता को दर्शाती है। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यभार संभालने के तुरंत बाद जोशी को ‘मार्गदर्शक मंडल’ (पार्टी के बुजुर्ग नेताओं के लिए एक तरह का रिटायरमेंट स्लॉट) में भेजकर राजनीतिक रूप से हाशिए पर डाल दिया गया था। अब, यूपी विधानसभा चुनाव के करीब आते ही उन्हें रिटायरमेंट से बाहर निकालकर यूपी बीजेपी की नई राज्य कार्यसमिति में ‘स्थायी आमंत्रित सदस्य’ (परमानेंट इनवाइटी) नियुक्त किया गया है। यह समिति अगले साल होने वाले अहम चुनावों की देखरेख करेगी। उनकी यह नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब यूपी के ब्राह्मणों के बीच असंतोष की खबरें आ रही हैं।
1980 के दशक के आखिर में राम मंदिर आंदोलन शुरू होने के बाद से ही ब्राह्मण समुदाय बीजेपी का एक वफादार वोट बैंक रहा है। आंतरिक रिपोर्टों से पता चलता है कि राम मंदिर के लिए दिए गए चंदे में चोरी की घटनाओं से ब्राह्मण नाराज हैं। इसके अलावा, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (जो खुद ठाकुर समुदाय से आते हैं) के कार्यकाल में ठाकुरों का प्रभाव बढ़ने के कारण ब्राह्मण समुदाय खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। एक समय था जब राज्य के ब्राह्मण नेताओं के बीच जोशी का काफी प्रभाव हुआ करता था। हालांकि, पिछले 12 वर्षों से लगभग निष्क्रिय रहने के बाद यह देखना दिलचस्प होगा कि 92 साल की उम्र में वे कितने प्रभावी साबित होते हैं। जोशी की वापसी यह भी संकेत देती है कि यूपी के लिए बीजेपी की रणनीति तय करने में आरएसएस एक महत्वपूर्ण और सक्रिय भूमिका निभा रहा है। जोशी हमेशा से आरएसएस के करीबी रहे हैं और आज भी हैं।
गौर करने वाली बात यह है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जिन्हें उत्तर भारत में बीजेपी की मजबूत चुनावी मशीनरी तैयार करने के लिए पार्टी का ‘चाणक्य’ माना जाता है, इस समिति का हिस्सा नहीं हैं। इस समिति में प्रधानमंत्री मोदी और केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे नेता शामिल हैं। दरअसल, 2014 से ही यूपी में बीजेपी की जीत की रणनीति अमित शाह ही तैयार करते रहे हैं लेकिन इस बार अमित शाह को इस समिति से बाहर रख कर भाजपा यह संकेत दे रही है कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के हाथ में ही कमान है और इससे स्थानीय मतदाताओं में विश्वास जगाने की कोशिश है कि उनके लोकप्रिय नेता ही आगे नेतृत्व करेंगे।
भारत की तरह इजराइल में ‘वोट चोरी’ के आरोप
यह दिलचस्प है कि मजबूत नेताओं के शासन वाले लोकतंत्रों में ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाना एक आम बात हो गई है। हाल ही में इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी यही आरोप लगाया है। उनके देश में हाल ही में हुए आम चुनावों में उन्हें बहुमत नहीं मिल सका। उन्होंने अरब पार्टियों पर जिन्होंने उम्मीद से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया है, अपने वोट ‘चुराने’ का आरोप लगाया है। इजराइल में खंडित जनादेश के बाद सरकार बनाने की प्रक्रिया काफी मुश्किल हो सकती है, खासकर तब, जब नेतन्याहू के समर्थक भी ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को उसी तरह उछालने लगें, जैसे यहां भारत में होता है। एक और देश जो ‘वोट चोरी’ को लेकर विवाद के लिए तैयार हो रहा है, वह है अमेरिका। अगले हफ्ते वहां हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट के लिए मध्यावधि चुनाव (मिड-टर्म इलेक्शन) होने वाले हैं। ओपिनियन पोल बताते हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी, डेमोक्रेट्स से पीछे चल रही है। इससे पहले जब ट्रंप 2000 में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन से आम चुनाव हार गए थे, तब भी उन्होंने डेमोक्रेट्स पर ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया था। क्या अगले हफ्ते नतीजे आने पर अगर ओपिनियन पोल सही साबित होते हैं तो क्या वह फिर से ‘वोट चोरी’ का शोर मचाएंगे?
फ्रांस में दंगे की घटना से चीनी कंपनी को फायदा
सोशल मीडिया की वजह से आज दुनिया इतनी आपस में जुड़ी हुई है कि फ्रांस के दंगों का एक वायरल वीडियो चीन की एक कांच बनाने वाली कंपनी के लिए अपने उत्पाद के प्रचार का जरिया बन गया। फ्रांस में प्रदर्शनकारियों ने एक महंगे डिजाइनर स्टोर की कांच की खिड़की (शो विंडो) पर बार-बार वार किया। उन्होंने उस पर धातु का खंभा, ईंटें और कुर्सी जैसी कई चीजें फेंकीं, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि वह खिड़की नहीं टूटी। कई बार तोड़ने की कोशिश के बाद भी उसमें बस कुछ दरारें ही आईं।
जब इस ‘न टूटने वाले’ कांच का वीडियो वायरल हुआ तो चीन की एक कांच निर्माता कंपनी ने पहचान लिया कि वह खिड़की उन्हीं का उत्पाद है। कंपनी ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया और अपने उत्पाद की मजबूती और टिकाऊपन को दिखाने के लिए इसे बड़े पैमाने पर शेयर किया जो उनके लिए एक मुफ्त विज्ञापन की तरह काम कर गया। यह कंपनी मुख्य रूप से धमाका-रोधी (एक्सप्लोजन-रेसिस्टेंट), तोड़फोड़-रोधी (स्मैश-रेसिस्टेंट) और बुलेट-प्रूफ कांच बनाने में माहिर है। यह एक अजीब विडंबना है कि यूरोप के एक देश में हुई एक दुखद घटना, दुनिया के दूसरी तरफ स्थित एशिया के एक देश के लिए एक बड़ा फायदा साबित हुई।
यूपी में ब्राहम्णों को मनाने के लिये भाजपा को ‘मुरली’ का सहारा
Summary :
बीजेपी के सबसे वरिष्ठ ब्राह्मण नेता मुरली मनोहर जोशी की राजनीतिक परिदृश्य में वापसी, उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटों को लेकर पार्टी की बढ़ती चिंता को दर्शाती है। 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यभार संभालने के तुरंत बाद जोशी को ‘मार्गदर्शक मंडल’ (पार्टी के बुजुर्ग नेताओं के लिए एक तरह का रिटायरमेंट स्लॉट) में भेजकर राजनीतिक रूप से हाशिए पर डाल दिया गया था। अब, यूपी विधानसभा चुनाव के करीब आते ही उन्हें रिटायरमेंट से बाहर निकालकर यूपी बीजेपी की नई राज्य कार्यसमिति में ‘स्थायी आमंत्रित सदस्य’ (परमानेंट इनवाइटी) नियुक्त किया गया है। यह समिति अगले साल होने वाले…


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