कराची के मोहता-पैलेस पर जिन्नाह का कब्जा

Summary :

पाकिस्तान के कायदे आज़म जिन्नाह की नज़र पहले दिन से कराची की एक हवेली पर टिकी हुई थी। इस हवेली का नाम था ‘मोहता-पैलेस’ और मालिक थे बीकानेरी मूल के एक मारवाड़ी सेठ शिव रतन मोहता। हिन्दू जिमखाना कराची में स्थित इस ऐतिहासिक इमारत के निर्माण में गोवर्धन दास के बड़े बेटे सेठ रामगोपाल गोवर्धनदास मोहता का सबसे बड़ा योगदान था। इसीलिए अधिकारिक तौर पर इसे ‘सेठ रामगोपाल गोवर्धन दास मोहता हिंदू जिमखाना’ नाम दिया गया था। अगस्त 1947 में भारत के विभाजन के समय कराची में हालात बिगड़ने लगे। हालांकि सेठ शिवरतन मोहता कराची नहीं छोड़ना चाहते थे, लेकिन…

पाकिस्तान के कायदे आज़म जिन्नाह की नज़र पहले दिन से कराची की एक हवेली पर टिकी हुई थी। इस हवेली का नाम था ‘मोहता-पैलेस’ और मालिक थे बीकानेरी मूल के एक मारवाड़ी सेठ शिव रतन मोहता। हिन्दू जिमखाना कराची में स्थित इस ऐतिहासिक इमारत के निर्माण में गोवर्धन दास के बड़े बेटे सेठ रामगोपाल गोवर्धनदास मोहता का सबसे बड़ा योगदान था। इसीलिए अधिकारिक तौर पर इसे ‘सेठ रामगोपाल गोवर्धन दास मोहता हिंदू जिमखाना’ नाम दिया गया था।
अगस्त 1947 में भारत के विभाजन के समय कराची में हालात बिगड़ने लगे।

हालांकि सेठ शिवरतन मोहता कराची नहीं छोड़ना चाहते थे, लेकिन सुरक्षा कारणों और बढ़ते घरेलू दबाव के कारण उन्हें रातों-रात अपना आलीशान महल छोड़कर मुंबई (तब बॉम्बे), भारत आना पड़ा। मोहता परिवार के जाने के बाद पाकिस्तान सरकार ने इस पैलेस को अपने कब्जे में ले लिया और शुरुआत में यहां पाकिस्तान का विदेश मंत्रालय बनाया गया। बाद में 1964 में यह मोहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना का अधिकारिक निवास बना। आज यह महल सिंध सरकार के अधीन एक प्रसिद्ध संग्रहालय और सांस्कृतिक केंद्र है।

वर्तमान में मोहता परिवार के वंशज मुबई और अन्य देशों में रहते हैं। हाल ही में फरवरी 2024 में शिवरतन मोहता के परपोते सात्विक मोहता ने कराची जाकर अपने परदादा द्वारा बनवाए गए इस ऐतिहासिक मोहता पैलेस का भी दौरा किया। इसका नाम अब ‘कस्र-ए-फातिमा’ है। अब यहां एक संग्रहालय, मगर भव्य महल का नाम ‘मोहता-पैलेस’ के स्थान पर कस्र-ओ-फातिमा है। यह महल 1927 में क्लिफ्टन के समृद्ध तटीय इलाके में बनाया गया था। इसे शिवरतन मोहता ने अपने ग्रीष्मकालीन आवास (समर होम) के रूप में बनवाया था।

इस महल का निर्माण राजस्थान के पत्थर के महलों की परंपरा के अनुरूप किया गया था, जिसमें जोधपुर के गुलाबी पत्थरों के साथ-साथ पास के गिजरी इलाके के पीले पत्थरों का इस्तेमाल किया गया था। शिवरतन के पूर्वजों में मोतीलाल मोहता का नाम आता है, जो 1842 में बीकानेर से हैदराबाद (तेलंगाना, भारत) चले गए थ। उनके चार बच्चे कलकत्ता चले गए। इन्हीं में से एक, गोवर्धन मोहता, 1883 में कराची चले गए। उनके बड़े बेटे, रामगोपाल, एक विद्वान और लेखक बने। शिवरतन कराची बाद में एक उद्योगपति बने और उन्होंने ‘पाम-ऑलिव’ साबुन के निर्माण से काफी संपत्ति अर्जित की।

यह महल 18500 वर्ग फुट (1720 वर्ग मीटर) के क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके बाहरी हिस्से को खिड़कियों, पत्थर के ब्रैकेट, मेहराबों, गुंबदों, फूलों के डिज़ाइन वाली रेलिंग और सुंदर कटघरों से सजाया गया है। इसमें कुल नौ गुंबद हैं, जिनमें से एक बीच में स्थित है। महल के सामने के हिस्से में बगीचे की ओर खुलने वाली खिड़कियां नीले रंग की हैं, जबकि पिछले हिस्से में रंगीन कांच (स्टेन्ड ग्लास) वाली मेहराबदार खिड़कियां बनी हुई हैं। महल की निचली मंजिल पर मनोरंजन के लिए बड़े और भव्य कमरे हैं, जबकि पहली मंजिल पर अधिक निजी जगहें हैं। यहां एक छत (टेरेस) भी है, जहां तेज धूप से बचने के लिए छाया की व्यवस्था है।

यह पूरा महल सागौन की लकड़ी से बना है, जिसमें पॉलिश की गई सीढिय़ां, लंबे गलियारे और दरवाज़ों के भीतर दरवाज़े लगे हैं। मोहता पैलेस की ‘बरसाती’ (छत) पर एक सुंदर पारिवारिक मंदिर था, जो भगवान शिव को समर्पित था। इंडो-सारासेनिक वास्तुकला शैली में बना यह महल, समुद्र के पास एक शानदार इलाके में स्थित है और अपनी अनूठी बनावट के कारण अलग ही पहचान रखता था।

अलग-अलग स्तरों पर बने इस भव्य महल का इस्तेमाल मोहता परिवार दो दशकों तक गर्मियों के घर के रूप में करता रहा, जब तक कि वे 1947 में भारत नहीं चले गए। इसमें तीन स्तर थे -बेसमेंट, निचली मंजिल और पहली मंजिल, जिसके ऊपर छत थीं इमारत के उत्तरी हिस्से में बना बेसमेंट काफी छोटा है। यहां से नीचे जाने वाली सीढि़यां एक ऐसे कक्ष की ओर ले जाती थीं, जिसमें गर्म पानी का ‘पूल’ और उससे जुड़ा एक चेंजिंग रूम हैं। कहा जाता है कि यहां गर्म और ठंडे पानी की व्यवस्था थी, जिससे पूल में पानी आता था। ‘पूल’ वाले क्षेत्र में छोटे वेंटिलेटर हैं -दोनों तरफ दो-दो जिनका इस्तेमाल शायद धूप अंदर लाने और भाप बाहर निकालने के लिए किया जाता रहा होगा।

इमारत में प्रवेश करने पर एक गलियारा मिलता है, जो निचली मंजिल के कमरों तक जाता है। यहां पांच बड़े कमरे हैं, जो संभवत: औपचारिक या सामाजिक कार्यों के लिए बनाए गए थे : दो कमरे प्रवेश द्वार के उत्तर में हैं, दो दक्षिण में, और एक पीछे की तरफ है। मुख्य प्रवेश द्वार एक बड़े गलियारे में खुलता है, जो एक विशाल केंद्रीय हॉल को घेरे हुए है। इस हॉल की छत पर सुंदर नक्काशी है और इसके दक्षिणी हिस्से में सीढिय़ां बनी हैं। बाहर से देखने पर, भूतल (ग्राउंड फ्लोर) पर प्रवेश द्वार के दोनों तरफ दो बेहद नक्काशीदार खिड़कियां हैं, जिनमें से प्रत्येक में तीन शटर लगे हैं।

ऐसी ही खिड़कियां उत्तर और दक्षिण दिशा में भी हैं -उन सीढि़यों के दोनों तरफ, जो कमरों से बाहर मैदान की ओर जाती हैं। अष्टकोणीय (आठ कोनों वाले) बुर्जों में से प्रत्येक में पांच-पांच खिड़कियां हैं। इसी तरह, भूतल के चारों ओर एक छज्जा बना हुआ है, जो छाया देने का काम करता है। इसके ग्राउंड फ्लोर की खिड़कियों के ठीक ऊपर भी खिड़कियां हैं, जहां से नीचे के बड़े मैदान का नज़ारा दिखता है। इसके अलावा, पहली मंजिल पर एक बड़ी छत (टेरेस) थी, जहां से अरब सागर दिखाई देता है।

छत के ऊपर से आस-पास के इलाके और नीचे की गई लैंडस्केपिंग का नज़ारा ऊपर से देखा जा सकता था। मोहता पैलेस को बहुत बारीकी से सजाया गया है, जिसमें पूरी इमारत पर बेहतरीन नक्काशी देखने को मिलती है। इन सुंदर डिज़ाइनों में बड़ी खिड़कियों के पास, मेहराबों के ऊपरी कोनों पर पक्षियों के पंखों जैसी आकृतियां बनी हैं।
वर्ष 1947 में पाकिस्तान सरकार ने इस इमारत को अपने कब्जे में ले लिया और वर्ष 1964 में, मुहम्मद अली जिन्ना की बहन फातिमा जिन्ना यहां रहने आ गईं।

वर्ष 1960 के दशक में मोहता पैलेस को ‘क़स्र-ए-फ़ातिमा’ कहा जाने लगा और राष्ट्रपति अयूब खान के खिलाफ उनके राष्ट्रपति चुनाव अभियान का मुख्य केंद्र बन गया। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद, उनकी बहन शिरीन जिन्ना यहां रहने आईं और कई वर्षों तक भूतल (ग्राउंड फ्लोर) पर रहीं। 1980 में उनके निधन के बाद, इस महल को सील कर दिया गया। 1995 में, सिंध सरकार ने इसे खरीद लिया ताकि इसे पाकिस्तान की कलाओं को समर्पित एक संग्रहालय में बदला जा सके।

सिंध सरकार ने इस संपत्ति का स्वामित्व अपने पास ले लिया और महल के बेहतर उपयोग और उसे संग्रहालय के रूप में ढालने के लिए सुझाव देने हेतु, गवर्नर की अध्यक्षता में ट्रस्टियों का एक स्वतंत्र बोर्ड गठित किया। संपत्ति के प्रबंधन के लिए एक ट्रस्ट बनाया गया, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसे बेचा न जाए, और न ही इसका उपयोग व्यावसायिक या किसी ऐसे उद्देश्य के लिए किया जाए जो ट्रस्ट डीड (दस्तावेज़) में तय किए गए उद्देश्यों से अलग हो। इसके आकर्षक रूप को देखते हुए जिन्नाह ने सही वक्त आने पर इस पर कब्जा करने का मन बना लिया था।

Dr. Chander Trikha