भारत में लोकतन्त्र की गहरी जड़ें

Summary :

वैसे तो भारत में लोकतन्त्र और न्याय की जड़ें बहुत गहरी हैं और इसके प्राचीन इतिहास से जुड़ती हैं परन्तु वर्तमान में इसका जीता-जागता स्वरूप भारतीय संविधान में विद्यमान है जिसका निर्माण भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की प्रक्रिया के स्वरूप हुआ और जिसे भारतीय जनमानस के मनीषियों ने लिखा। भारत का संविधान भारतीयों द्वारा लिखने के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे, जिन्होंने इसे भारतीय समाज के सबसे पिछड़े दलित वर्ग से आने वाले महाविद्वान बाबा साहेब अम्बेडकर से लिखवाया। बाबा साहेब अपने समय के सभी नेताओं में से सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे और डबल पी.एच.डी. थे। गांधी…

वैसे तो भारत में लोकतन्त्र और न्याय की जड़ें बहुत गहरी हैं और इसके प्राचीन इतिहास से जुड़ती हैं परन्तु वर्तमान में इसका जीता-जागता स्वरूप भारतीय संविधान में विद्यमान है जिसका निर्माण भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन की प्रक्रिया के स्वरूप हुआ और जिसे भारतीय जनमानस के मनीषियों ने लिखा। भारत का संविधान भारतीयों द्वारा लिखने के पीछे सबसे बड़ी प्रेरणा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी थे, जिन्होंने इसे भारतीय समाज के सबसे पिछड़े दलित वर्ग से आने वाले महाविद्वान बाबा साहेब अम्बेडकर से लिखवाया। बाबा साहेब अपने समय के सभी नेताओं में से सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे थे और डबल पी.एच.डी. थे। गांधी जानते थे कि भारत से सदियों की गुलामी मिटाने के लिए एेसे संविधान की आवश्यकता है जिसमें आम भारतीय व्यक्ति की गरिमा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाये क्योंकि इसी के माध्यम से भारतीयों में जड़ जमाये बैठा दासता का भाव जा सकता था। इसके लिए जरूरी था कि आम लोगों को ‘प्रजा’ से नागरिक का दर्जा दिया जाये।
गांधी जी ने इसकी शुरूआत 1928 में ही कर दी थी और अंग्रेजी साम्राज्य को चुनौती दी थी कि भारतीयों में अपने देश का संविधान लिखने की पूरी लियाकत है क्योंकि अंग्रेज मानते थे कि भारतीयों में संविधान लिखने की समझ नहीं है और इसीलिए लन्दन की ब्रिटिश संसद ‘भारत सरकार’ का कानून बनाती है। तब तक महात्मा गांधी कांग्रेस पार्टी में आम आदमी की सदस्यता चवन्नी वार्षिक फीस के साथ खोल चुके थे और कांग्रेस जन आन्दोलन की पार्टी बन चुकी थी। उनकी इसी नीति से घबरा कर 8 वर्ष पहले मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना कांग्रेस छोड़ चुके थे, क्योंकि वह इसे एक संभ्रान्त वर्ग की अंग्रेज सरकार के समक्ष याचिकाएं देने वाली पार्टी (पार्टी आफ पेटीशंस) बनाये रखना चाहते थे जिसका उद्देश्य स्वराज्य (सेल्फ रूल) था।
गांधी जी ने 1928 में भारत का संविधान लिखने का दायित्व प्रख्यात वकील प. मोती लाल नेहरू को दिया। यह वही मोती लाल नेहरू थे जिन्होंने 1924 में गांधी जी की कुछ नीतियों से असहमति जताते हुए देश बन्धु चितरंजनदास के साथ कांग्रेस छोड़ दी थी और अलग स्वराज पार्टी बनाई थी। असहमति इस बात पर थी कि गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ चलाया हुआ असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया था। इसकी वजह यह थी कि आन्दोलनकारियों ने उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा कस्बे का पुलिस थाना फूंक दिया था जिसमें कई पुलिसकर्मी मारे गये थे। गांधी जी का अहद था कि उनका आन्दोलन पूरी तरह अहिंसक और शान्तिपूर्ण होगा। इसमें हिंसा उत्पन्न होने से महात्मा गांधी की प्रतिज्ञा टूट गई और उन्होंने आन्दोलन वापस लेने की घोषणा कर दी। मगर उस समय आन्दोलन पूरे शबाब पर था जिसकी वजह से कई कांग्रेस नेताओं को बहुत बुरा लगा खास कर देशबन्धु चितरंजनदास जैसे नेताओं को।
उन्होंने तब कांग्रेस के समानान्तर अलग स्वराज्य पार्टी बना ली और मोतीलाल नेहरू भी इसमें शामिल हो गये परन्तु मोती लाल नेहरू के सुपुत्र प. जवाहर लाल नेहरू भी तब कांग्रेस में सक्रिय हो चुके थे लेकिन उन्होंने कांग्रेस छोड़ने से साफ इन्कार कर दिया और गांधी जी की नीतियों का समर्थन किया। तब जवाहर लाल बहुत युवा थे और उनकी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस से गहरी दोस्ती थी। नेताजी ने भी इस मुद्दे पर कांग्रेस से अलग होना स्वीकार नहीं किया। इस प्रकार गांधी जी के साथ कांग्रेस का युवा खून डट कर खड़ा रहा। मगर बाद में मोती लाल कांग्रेस में वापस आ गये।
अतः 1928 में गांधी जी ने कहा कि भारत के संविधान का प्रारूप मोती लाल नेहरू लिखेंगे। उनकी अध्यक्षता में तब एक संविधान प्रारूप समिति बनाई गई जिसमें भारत के सभी प्रमुख राजनैतिक दलों से शामिल होने की अपील की गई परन्तु मुस्लिम लीग ने इसमें शामिल होने से इन्कार कर दिया अलबत्ता इसमें इसके कुछ सदस्यों ने व्यक्तिगत हैसियत से शिरकत की जिसमें कसूरी साहब भी शामिल थे। समिति मौलाना आजाद से लेकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस व जवाहर लाल नेहरू को लिया गया। समिति ने देश के व्यापारी संगठनों तक से सलाह-मशविरा किया और तब जाकर भारत के संविधान का प्रारूप प्रस्तुत किया। मोती लाल समिति के नाम से प्रसिद्ध इसकी सबसे बड़ी राय यह थी कि भारत एक संघीय राज्य है। समिति ने राज्यों व केन्द्र सरकार के अधिकारों से लेकर भारत की भाषा तक के बारे में अपनी राय रखी और कहा कि भारत की राष्ट्रभाषा ​हिन्दोस्तानी होगी जिसकी दो लिपियां देवनागरी व अरबी होगी। हिन्दू- मुसलमानों में भाषाई एकता कायम रखने की गरज से यह बहुत महत्वपूर्ण सिफारिश थी मगर मुस्लिम लीग ने इसे खारिज कर दिया और कहा कि उर्दू तो मुसलमानों की भाषा है जिस पर किसी प्रकार का समझौता नहीं हो सकता।
हिन्दोस्तानी आम बोल-चाल की हिन्दी भाषा थी जिसमें हिन्दू व उर्दू दोनों के ही शब्द आते थे। समिति ने भारत को एक संघीय राज्य इसलिए कहा कि क्योंकि अंग्रेजों ने 1919 में जो भारत सरकार कानून बनाया था उसमें भारत को विभिन्न नस्लों, जातियों, वर्गों व समूहों का एेसा जमघट कहा था कि जिनकी भाषाओं से लेकर संस्कृति अलग-अलग है। यही वजह रही कि 1946 में जब अंग्रेजों ने भारत से धर्म के आधार पर अलग से पाकिस्तान बनाने का निर्णय किया तो तत्कालीन अंग्रेज वायसराय लार्ड बावेल ने कहा कि भारत में 1945 के प्रान्तीय एसेम्बलियों व सेंट्रल एसेम्बली के चुनाव 1935 के भारत सरकार कानून के तहत नहीं बल्कि 1919 के कानून के तहत हुए थे। मगर इससे पहले मोतीलाल समिति की रिपोर्ट के बाद 1935 में ब्रिटिश संसद एक नया भारत सरकार कानून लाई जिसमें भारत को एक संघ राज्य माना गया।
1919 में अंग्रेज भारत सरकार कानून तब लाये थे जब उन्होंने श्रीलंका को भारत से काट कर अलग देश घोषित किया था और 1935 में तब लाये जब उन्होंने बर्मा (म्यामांर) को भारत से काट कर अलग किया। लेकिन मोती लाल समिति ने सिफारिश की थी कि भारत के स्वतन्त्र होने पर यह संसदीय प्रणाली का लोकतन्त्र अपनायेगा जिसमें भारत के प्रत्येक व्यक्ति के नागरिक मूल अधिकार होंगे और हर पांच वर्ष बाद चुनाव होंगे जिनमें भाग लेने का अधिकार प्रत्येक वयस्क नागिरक को होगा और भारत का नागरिक प्रत्येक वह व्यक्ति होगा जो इसके किसी भी भू-भाग पर रहता होगा चाहे उसका धर्म, जाति, लिंग या वर्ग कोई भी हो। बाद में भारत के स्वतन्त्र होने पर भारत के संविधान में यही सब कुछ लिखा गया। भारत की धर्मनिरपेक्षता भी इसकी एेतिहासिक पृष्ठभूमि से ही जन्मी है क्योंकि हिन्दू धर्म स्वयं में पंथ निरपेक्ष है। इसके मानने वाले शेव, वैष्णव, साकार व निराकार सभी हैं। भारत के इतिहास में पंच परमेश्वर की ग्राम स्तर पर परिकल्पना इसके न्याय प्रिय होने की गवाही देता है और राज स्तर पर राजतन्त्र में भी सम्राट विक्रमादित्य की न्याय आसन की स्थापना आम लोगों के साथ न्याय करने की परिपाटी को बल देती है। वहीं बादशाह जहांगीर का इंसाफ भी लोगों में आज तक लकोक्ति बना हुआ है।

Team Desk