महिला आरक्षण जल्दी होगा

महिलाओं को राजनीतिक रूप से सशक्त करने के मामले में भारत विश्व का अग्रणी राष्ट्र रहा है। इस सन्दर्भ में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि भारत के स्वतन्त्रता आन्दोलन के कर्णधार राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जब 1928 में यह घोषणा की कि स्वतन्त्र भारत में बिना किसी लैंगिक भेदभाव के प्रत्येक स्त्री-पुरुष को एक समान मताधिकार देकर संसदीय प्रणाली का रास्ता अपनाया जायेगा तो पश्चिम के आधुनिकतम कहे जाने वाले देशों ने इस पर घनघोर आश्चर्य व्यक्त किया था और कहा था कि भारत के अनपढ़ व गरीब और रूढि़वाद से ग्रसित लोग किस प्रकार इस तरह की संसदीय प्रणाली के लोकतन्त्र को थामे रह सकते हैं। गांधी का यह सपना कोरी कल्पना है और अंधे कुएं में छलांग लगाने की तरह है। इसका असली कारण यह था कि खुद ब्रिटेन जैसे लोकतन्त्र के आधार स्तम्भ माने जाने वाले देश में भी महिलाओं को यह हक प्रथम विश्व युद्ध के बाद मिला था और अमेरिका में भी एेसा कानून बहुत बाद में आया था जबकि गांधी घोषणा कर रहे थे कि भारत अपनी आजादी के साथ ही यह अधिकार महिलाओं को दे देगा। अतः यह बेवजह नहीं है कि भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में महिलाओं को भी बराबर की भागीदारी देने के बापू प्रबल समर्थक थे।
1928 में ही स्वतन्त्रता संग्राम का नेतृत्व कर रही कांग्रेस पार्टी ने पं. मोती लाल नेहरू की सदारत में भारत का संविधान लिखने के लिए एक प्रारूप समिति का गठन किया जिसमें पं. जवाहर लाल नेहरू से लेकर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस व मौलाना आजाद तक शामिल थे। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में सभी सम्प्रदायों, वर्गों व समुदायों के हरेक स्त्री-पुरुष को एक वोट का अधिकार देने की बात कही और चुनावों के जरिये सरकारों के गठन का प्रस्ताव रखा। अतः बाद में जब भारत का संविधान डाॅ. अम्बेडकर की अध्यक्षता में तैयार हुआ तो वयस्क मताधिकार का सिद्धान्त स्वीकार करते हुए संसदीय लोकतान्त्रिक प्रणाली को अंगीकार किया गया। परन्तु स्वतन्त्र भारत में यह मांग भी उठनी शुरू हो गई थी कि महिलाओं को चुने हुए सदनों में उनकी संख्या के अनुरूप आरक्षण दिया जाना चाहिए जिससे देश की आधी आबादी का सही प्रतिनिधित्व हो सके और राष्ट्र निर्माण के कार्य में उनकी भी निर्णायक भूमिका हो सके। बेशक इस मांग को 1990 में पिछड़े वर्गों के लिए पृथक आरक्षण किये जाने के बाद ही पंख लगे मगर महिलाओं को देश के पहले पिछड़े आयोग की रिपोर्ट में ही शामिल कर लिया गया था। यह आयोग स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद पं. नेहरू की सरकार ने प्रख्यात समाजशास्त्री काका साहेब कालेलकर की अध्यक्षता में गठित किया था। इसके बाद समाजवादी नेता डाॅ. राम मनोहर लोहिया यदा-कदा यह कहते रहते थे कि महिलाओं का राजनीति में भी समुचित प्र​ितनिधित्व होना चाहिए मगर उनका ज्यादा जोर पिछड़ी जातियों पर ही रहता था।
1990 के बाद इस मामले में देश की राजनीति में निर्णायक मोड़ आया और श्री एच.डी. देवेगौड़ा की संयुक्त मोर्चा सरकार महिलाओं के आरक्षण के लिए एक विधेयक संसद में लाई मगर इसे आवश्यक समर्थन नहीं मिल सका क्योंकि तब सत्तारूढ़ गठबन्धन से लेकर विपक्षी दलों तक में इस बारे में मतैक्य की भारी कमी थी। बीच में केन्द्र में स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की एनडीए सरकार के दौरान विपक्षी पार्टी कांग्रेस महिला आरक्षण की मांग उठाती रहती थी। खासकर इसकी नेता श्रीमती सोनिया गांधी इसे सिद्धान्त रूप में आगे बढ़ाना चाहती थीं मगर उनका यह प्रयास सफल नहीं हो सका और वाजपेयी सरकार ने कहा कि संविधान संशोधन करने वाले एेसे विधेयक के लिए दो-तिहाई बहुमत जुटाना जरूरी होगा जो राजनीतिक मतैक्य स्थापित होने पर ही संभव है क्योंकि किसी भी राजनीतिक दल के पास संसद के दोनों में से किसी भी सदन में अपने बूते पर बहुमत नहीं है और गठबन्धन की सरकार चल रही है। परन्तु 2004 से 2014 तक जब केन्द्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए गठबन्धन की सरकार आयी तो कांग्रेस पार्टी पर महिला आरक्षण विधेयक लाने का दायित्व स्वतः ही बढ़ गया परन्तु इस पार्टी के गठबन्धन के पास भी लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत नहीं था। इस दौरान प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा ने अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि वह महिला आरक्षण के समर्थन में खड़ी हुई है। इसके बाद 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की 200 से ऊपर सीटें आयीं और भाजपा की 100 से ऊपर परन्तु राज्यसभा में यदि यूपीए गठबन्धन को भाजपा का समर्थन मिल जाता तो दो-तिहाई का आंकड़ा छुआ जा सकता था। अतः 2010 में भाजपा ने घोषणा की कि यदि मनमोहन सरकार महिला आरक्षण विधेयक लाती है तो वह सरकार के पक्ष में वोट करेगी।
हालांकि यूपीए में ही शामिल श्री लालू प्रसाद यादव की पार्टी के साथ ही स्व. मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी भी इसका विरोध कर रही थी परन्तु सभी वामपंथी दल विधेयक के समर्थन में थे। अतः 2010 में मनमोहन सरकार महिला आरक्षण विधेयक को राज्यसभा में लाई जिसका समर्थन कम्युनिस्ट पार्टियों व भाजपा ने साथ मिलकर किया । 1967 के बाद देश की राजनीति में यह पहला मौका था जब भाजपा (जनसंघ) व कम्युनिस्ट एक साथ आये थे। अतः राज्यसभा में यह विधेयक पारित हो गया मगर लोकसभा में एेसा नहीं हो सका। अतः जब 2014 में केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की सरकार आयी तो महिला आरक्षण की मांग फिर से उठने लगी। श्री मोदी ने 2019 में भी भारी विजय प्राप्त की और अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान 2023 में इस विधेयक को संसद के दोनों सदनों में पारित कराने में सफलता प्राप्त कर ली। परन्तु विधेयक को लागू करने की शर्त यह रही कि इस संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन के बाद ही लागू किया जायेगा। इस महिला आरक्षण विधेयक को नारी शक्ति वन्दन अधिनियम कहा गया जिसमें स्त्रियों के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है। परन्तु मोदी सरकार अब चाहती है कि इससे यह शर्त हटाई जाये जिससे महिलाओं को आरक्षण जल्दी से जल्दी दिया जा सके।
इस बाबत वह संसद के चालू अधिवेशन में ही आवश्यक संशोधन करना चाहती है अतः उसने चालू सत्र को फिलहाल पूर्व कार्यक्रम के अनुसार अनिश्चितकाल के लिए स्थगित नहीं किया है और सत्र की 16, 17 व 18 मार्च को तीन दिवसीय विशेष बैठक बुलाई है। सरकार लोकसभा की वर्तमान चुने हुए सदस्यों की संख्या 543 से बढ़ाकर 816 करना चाहती है जिसमें से 270 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इससे दक्षिण भारत के राज्यों की लोकसभा सीटें पूर्ववत अनुपात की भांति ही बढ़ जायेंगी। परिसीमन जनगणना के बाद ही हो पायेगा और जनगणना 2027 में पूरी होगी। अतः सरकार ने इसे परिसीमन से अलग करने का फैसला किया है जो कि महिलाओं के हित में समझा जा रहा है।

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