Gangaur Vrat 2026 Katha in Hindi: गणगौर व्रत की पौराणिक कथा

Gangaur Vrat 2026 की पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार की बात है जब भगवान शिव, माता पार्वती और नारद मुनि के साथ भ्रमण पर निकले। चलते-चलते वे चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन एक गांव में पहुंचे। वहां की गरीब महिलाओं ने श्रद्धा के साथ हल्दी और अक्षत से माता पार्वती की पूजा की। उनकी भक्ति देख माता पार्वती प्रसन्न हुईं और उन महिलाओं को अटल सौभाग्य का आशीर्वाद दिया।
इसके बाद गांव की अमीर महिलाएं सोने-चांदी की थालियों में पकवान लेकर आईं। तब भगवान शिव ने पार्वती जी से पूछा कि अब आपने गरीब महिलाओं को तो सुहाग दे दिया, इनके लिए क्या बचा है? पार्वती जी ने मुस्कुराकर कहा कि उन्हें मैंने ऊपरी चीजों से बनी खुशियां दी हैं, लेकिन इन महिलाओं को मैं अपनी उंगली से अपना रक्त दूंगी, जिससे ये मेरे समान ही सौभाग्यवती बनेंगी। पूजा के बाद पार्वती जी ने अपनी उंगली से रक्त की कुछ बूंदें उन महिलाओं पर छिड़क दीं।
इसके बाद पार्वती जी नदी में स्नान करने चली गईं। वहां उन्होंने बालू मिट्टी से शिव जी की मूर्ति बनाकर पूजा की और भोग लगाया। उसी समय शिव जी वहां प्रकट हुए और पार्वती जी को वरदान दिया कि जो स्त्री इस दिन तुम्हारी तरह मेरा पूजन और व्रत करेगी, उसके पति की आयु लंबी होगी।
पूजा करते हुए माता पार्वती को आने में देरी हो गई। जब वे शिव जी के पास लौटीं, तो उन्होंने देरी का कारण पूछा। पार्वती जी ने कहा कि उन्हें वहां अपने भाई-भाभी मिल गए थे, जिन्होंने उन्हें दूध-भात खाने के लिए कहा, इसलिए उन्हें समय लग गया। यह सुनकर शिव जी को भी वहां जाने की इच्छा हुई। पार्वती जी ने मन ही मन भगवान शिव से प्रार्थना की कि उनकी लाज बच जाए। जब वे नदी तट पर पहुंचे, तो वहां एक मायावी महल दिखाई दिया। वहां शिव-पार्वती का खूब आदर-सत्कार हुआ।
वे वहां दो दिन रुके। तीसरे दिन जब लौटने की बारी आई, तो शिव जी का मन नहीं मान रहा था। तब पार्वती जी वहां से चल पड़ीं, तो शिव जी को भी पीछे आना पड़ा। रास्ते में शिव जी को याद आया कि वे अपनी माला वहीं भूल आए हैं। माला लाने के लिए उन्होंने नारद जी को भेजा, लेकिन वहां जाकर देखा तो कोई महल नहीं था, बस एक पेड़ पर माला लटकी थी। यह देखकर नारद जी हैरान रह गए।
शिव जी समझ गए कि यह सब पार्वती जी की ही माया थी। नारद जी ने कहा, “हे माता! आपकी भक्ति और पतिव्रत के प्रभाव से ही यह सब हुआ है। जो स्त्रियां आपकी गुप्त रूप से पूजा करेंगी, उन्हें अखंड सौभाग्य मिलेगा।” बस तभी से गणगौर व्रत की परंपरा शुरू हुई।
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