कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा

राजा की बात सुनकर ब्राह्मणों ने कहा, “हे महाराज! आप चिंता न करें, हम इस समस्या का कोई न कोई उपाय जरूर ढूंढेंगे।” इसके बाद, राजा की इच्छा पूरी करने के लिए प्रजा के लोग और ब्राह्मण मिलकर जंगल की तरफ निकल गए। जंगल में उन्हें एक महान ऋषि मिले, जिनका नाम लोमश ऋषि था और वे तपस्या कर रहे थे। सबने उनके पास जाकर कहा, “हे मुनिवर! हमारे राजा का नाम महीजित है। उनकी कोई संतान नहीं है। आप कृपा करके कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे हमारे राजा को संतान का सुख मिल सके।” लोगों की बात सुनकर लोमश ऋषि ने राजा के लिए आषाढ़ के महीने में आने वाले ‘कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी’ के व्रत के बारे में बताया।
ऋषि ने आगे कहा कि राजा को भगवान गणेश जी की पूजा करनी चाहिए। अगर राजा यह व्रत रखेंगे, पूजा करेंगे, ब्राह्मणों को खाना खिलाएंगे और दान-पुण्य करेंगे, तो उन्हें संतान जरूर मिलेगी। इसके बाद सभी लोग वापस अपने शहर आ गए और ऋषि का बताया हुआ उपाय राजा को सुनाया। उपाय सुनकर राजा बहुत खुश हुए। उन्होंने नियम से कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा। इस व्रत के असर से कुछ समय बाद राजा की पत्नी, रानी सुदक्षिणा ने एक बहुत ही सुंदर और संस्कारी बेटे को जन्म दिया।
कृष्णपिंगल संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व (Krishnapingala Sankashti Chaturthi 2026)

इस खास दिन भगवान गणेश के ‘कृष्णपिंगल’ रूप की पूजा की जाती है, जिनका रंग भूरा और काला माना गया है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान गणेश खुद अपने भक्तों के सारे दुख और मुश्किलें दूर करने के लिए धरती पर आते हैं। जो कोई भी इस दिन पूरी श्रद्धा और सही तरीके से व्रत रखता है, उसके मन का डर, उलझन और तनाव दूर हो जाते हैं और जीवन में खुशहाली आती है।
इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथियों, कहानियों या मान्यताओं पर आधारित है। पंजाब केसरी इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।


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