पुत्रदा एकादशी की कथा

पौराणिक कथाओं के अनुसार, बहुत समय पहले द्वापर युग की शुरुआत में ‘महिरूपति’ नाम का एक शहर हुआ करता था। वहां ‘महीजित’ नाम का राजा राज करता था। राजा का कोई बेटा नहीं था, जिसकी वजह से वह कभी खुश नहीं रहता था। बेटा पाने के लिए राजा ने बहुत सारे उपाय किए, लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली।
एक दिन राजा ने अपने राज्य के सभी ऋषि-मुनियों, साधुओं और विद्वानों को बुलाया। राजा ने उन सभी से बेटा पाने का उपाय पूछा। राजा की बात सुनकर सबने बताया कि राजा ने अपने पिछले जन्म में सावन महीने की एकादशी के दिन एक प्यासी गाय को पानी पीने से रोक दिया था।
उसी गाय ने राजा को बिना संतान रहने का श्राप दिया था। इसी वजह से राजा को बेटा नहीं हो रहा था। विद्वानों ने राजा को सलाह दी कि अगर वह सावन की एकादशी का सही तरीके से व्रत रखेगा, तो उसे इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी। राजा ने उनकी बात मान ली।
राजा ने पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से पुत्रदा एकादशी का व्रत रखा, पूजा की और भगवान विष्णु से बेटा देने की प्रार्थना की। इसके कुछ समय बाद राजा की पत्नी गर्भवती हुई और उन्होंने एक सुंदर बेटे को जन्म दिया। माना जाता है कि तभी से संतान की इच्छा रखने वाले लोग पुत्रदा एकादशी का व्रत रखने लगे।
पुत्रदा एकादशी पूजा विधि (Putrada Ekadashi 2026)

- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें।
- घर के पूजा घर को अच्छे से साफ करें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर स्थापित करें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा के समय दीपक और धूप जलाएं। भगवान शिव को फूल, माला, बेलपत्र और आक के फूल चढ़ाएं।
- रोली, कुमकुम और प्रसाद के साथ भगवान विष्णु की पूजा करें।
- भगवान विष्णु को तुलसी के पत्ते अर्पित करें।
- पुत्रदा एकादशी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें, और आखिर में भगवान की आरती गाएं।



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