नई दिल्ली, 1 अप्रैल (आईएएनएस)। बिहार के वैशाली जिले के रामपुर बघेल गांव के ब्राह्मण परिवार में 2 अप्रैल 1943 को जन्मे बिंदेश्वर पाठक ने भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के स्वच्छता और सामाजिक न्याय के इतिहास को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया। देश में सार्वजनिक शौचालय के प्रवर्तक के रूप में उन्हें ‘भारत के टॉयलेट मैन’ के नाम से जाना जाता है।
पढ़ाई पूरी करने के बाद जब वे 1968 में पटना की ‘गांधी शताब्दी समारोह समिति’ के ‘भंगी-मुक्ति’ प्रकोष्ठ से जुड़े, तो उन्होंने भारत के उस काले सच को बहुत करीब से देखा, जिसे सभ्य समाज अक्सर नजरअंदाज कर देता था।
उन्होंने देखा कि कैसे लाखों महिलाएं और पुरुष (मुख्यतः वाल्मीकि और भंगी समुदाय) सिर पर मानव मल की टोकरियां ढोने को मजबूर थे। इन लोगों को सुबह सूरज निकलने से पहले यह काम करना पड़ता था, ताकि समाज के ‘उच्च’ वर्ग के लोग उन्हें देखकर अपवित्र न हो जाएं।
डॉ. बिंदेश्वर पाठक का मानना था कि जब तक घरों में ‘शुष्क शौचालय’ (जिनमें मल टोकरी या बाल्टी में गिरता है) रहेंगे, तब तक किसी न किसी को उसे हाथों से साफ करना ही पड़ेगा। इसी सोच ने 1968 में एक क्रांतिकारी आविष्कार को जन्म दिया, ‘टू-पिट पोर-फ्लश टॉयलेट’, जिसे आज पूरी दुनिया ‘सुलभ शौचालय’ के नाम से जानती है।
यह कोई साधारण शौचालय नहीं था। जहां पश्चिमी देशों के फ्लश टॉयलेट में मल बहाने के लिए 10-12 लीटर पानी लगता है, वहीं सुलभ की ‘वाटर-सील’ तकनीक में सिर्फ 1.5 से 2 लीटर पानी की जरूरत थी। इसमें दो गड्ढे होते थे। जब पहला गड्ढा भर जाता, तो मल दूसरे में जाने लगता। बंद गड्ढे का मल कुछ ही महीनों में जैविक खाद में बदल जाता था। इस एक छोटी सी तकनीक ने हमेशा के लिए इंसान द्वारा इंसान का मल उठाने की अमानवीय प्रथा को जड़ से खत्म करने का रास्ता खोल दिया।
किसी भी नए और क्रांतिकारी विचार को समाज आसानी से नहीं अपनाता। सुलभ इंटरनेशनल (जिसकी स्थापना 1970 में हुई) के शुरुआती दिन भयानक संघर्ष के थे। इस सपने को जिंदा रखने के लिए डॉ. बिंदेश्वर पाठक ने अपने गांव की जमीन बेच दी, यहां तक कि अपनी पत्नी के गहने तक गिरवी रख दिए। कई रातें उन्होंने रेलवे प्लेटफॉर्म पर सोकर गुजारीं।
1973 में उनकी किस्मत पलटी। बिहार के आरा शहर की नगर पालिका ने उन्हें दो डेमो टॉयलेट बनाने के लिए 500 रुपए दिए। यह मॉडल इतना सफल हुआ कि 1974 में डॉ. पाठक ने पटना में भारत का पहला ‘पे-एंड-यूज’ सार्वजनिक शौचालय खोल दिया। उस समय 10 पैसे का मामूली शुल्क रखा गया था। लोगों ने इसे हाथों-हाथ लिया और पहले ही दिन 500 लोगों ने इसका इस्तेमाल किया। आज सुलभ देशभर में 10,000 से अधिक सार्वजनिक शौचालय परिसरों का रखरखाव कर रहा है, जिनका इस्तेमाल रोजाना 2 करोड़ से ज्यादा लोग करते हैं।
उन्होंने ‘नई दिशा’ नाम से एक ऐसा जादुई कौशल विकास केंद्र शुरू किया, जिसने मैला ढोने वाली महिलाओं की जिंदगी बदल दी। जो हाथ मल उठाते थे, वे सिलाई करने लगे, पापड़-अचार बनाने लगे और ब्यूटी पार्लर चलाने लगे। इन्हीं में से एक हैं उषा चौमर, जो डॉ. पाठक के मार्गदर्शन में 2020 में भारत के राष्ट्रपति के हाथों ‘पद्म श्री’ से सम्मानित हुईं।
जातिवाद की जड़ें काटने के लिए डॉ. पाठक ने दिल्ली में ‘सुलभ पब्लिक स्कूल’ खोला। इस स्कूल का नियम बेहद अनोखा है। यहां 60 प्रतिशत बच्चे सफाई कर्मचारियों के होते हैं और 40 प्रतिशत सामान्य या उच्च वर्ग के।
उनकी करुणा केवल सफाई कर्मचारियों तक सीमित नहीं थी। 2013 में डॉ. पाठक ने सदियों पुरानी उस कठोर वर्जना को तोड़ दिया, जिसमें विधवाओं को रंग-त्योहारों से दूर रखा जाता था। उन्होंने हजारों विधवा माताओं के साथ होली खेली और रक्षाबंधन मनाया।
15 अगस्त 2023 को डॉ. बिंदेश्वर पाठक इस दुनिया को अलविदा कह गए लेकिन आज सुलभ का मॉडल अफ्रीका और एशिया के 50 से अधिक देशों में अपनाया जा रहा है।
–आईएएनएस
वीकेयू/पीएम
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