कोलकाता, 7 अगस्त (आईएएनएस)। कलकत्ता हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने शुक्रवार को तृणमूल कांग्रेस के विधायक कुणाल घोष की याचिका खारिज कर दी। पत्रकार से राजनेता बने घोष ने आरोप लगाया था कि विधायक के तौर पर पश्चिम बंगाल विधानसभा में बोलने के उनके अधिकारों को दबाया जा रहा है।
याचिका को खारिज करते हुए, जस्टिस कृष्ण राव की सिंगल बेंच ने कहा कि चूंकि कोर्ट विधानसभा की कार्यवाही के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं दे सकती, इसलिए घोष की याचिका सुनवाई के लायक नहीं है।
इसके बजाय, जस्टिस राव ने विधायक कुणाल घोष को सलाह दी कि वे इस मामले में अपनी शिकायतें लेकर विधानसभा स्पीकर रथिंद्र बोस के पास जाएं।
कुणाल घोष तृणमूल कांग्रेस के ‘असली लेकिन अल्पसंख्यक’ गुट का एक जाना-माना चेहरा हैं, जो पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार बना हुआ है।
तृणमूल कांग्रेस के ज्यादातर विधायक पार्टी से निकाले गए विधायक रिताब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले ‘बागी लेकिन बहुमत वाले’ गुट में शामिल हो गए हैं; रिताब्रत बनर्जी अभी पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के आधिकारिक नेता हैं।
हाल ही में, घोष ने फिर से आरोप लगाया था कि विधानसभा सत्र के दौरान उन्हें सदन में बोलने नहीं दिया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सदन के पिछले बढ़े हुए बजट सत्र में वक्ताओं की सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया था।
उन्होंने इस मामले के लिए तृणमूल कांग्रेस में रिताब्रत के नेतृत्व वाले गुट को साजिशकर्ता बताया था। सदन के पिछले बढ़े हुए बजट सत्र में, घोष की रिताब्रत के नेतृत्व वाले तृणमूल कांग्रेस गुट के चीफ व्हिप अखरुज्जमां के साथ तीखी बहस भी हुई थी।
विधानसभा में हंगामा हुआ, जिसके बाद घोष को मार्शल की मदद से सदन से बाहर निकाल दिया गया। उन्हें उस दिन के लिए राज्य विधानसभा से सस्पेंड भी कर दिया गया था। इसके बावजूद, उन्होंने बार-बार अपनी आवाज दबाने की साजिश का आरोप लगाया है। बाद में, उन्होंने कलकत्ता हाई कोर्ट में केस दायर किया।
जब शुक्रवार दोपहर जस्टिस राव की बेंच में मामले की सुनवाई हुई, तो घोष के वकील ने मामले में ‘न्यायिक समीक्षा’ की मांग की।
दूसरी ओर, राज्य विधानसभा की ओर से पेश वकील ने कहा कि घोष की याचिका सुनवाई के लायक नहीं है और कहा कि घोष को जून में सदन में बोलने का मौका मिला था।
विधानसभा के वकील ने अपनी जवाबी दलील में पूछा, “294 विधायक हैं। सभी को बोलने का मौका दिया जाना चाहिए। कोर्ट यह कैसे तय कर सकती है कि कौन से विधायक बोल सकते हैं और कौन से नहीं?” आखिरकार, जस्टिस राव ने ‘न्यायिक समीक्षा’ की याचिका को खारिज कर दिया और कहा कि इस मामले में अदालत की कोई भूमिका नहीं है।
–आईएएनएस
एससीएच/पीएम
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