बेंगलुरु, 11 सितंबर (आईएएनएस)। कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने शुक्रवार को केंद्र सरकार पर अपनी प्रस्तावित कार्यप्रणाली (मेथडोलॉजी) के जरिए जाति जनगणना को कमजोर करने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
जी. परमेश्वर ने कहा कि इस कवायद से सटीक और काम के लायक डाटा मिलना चाहिए, न कि सिर्फ जनगणना प्रश्नावली में जाति से जुड़ा एक सवाल जोड़ दिया जाए।
बता दें कि जी. परमेश्वर राज्य में दलित समुदाय के प्रमुख नेताओं में से एक हैं।
परमेश्वर ने एक बयान में दावा किया कि केंद्र में एनडीए सरकार को सालों तक विरोध करने के बाद जाति की गिनती को स्वीकार करने के लिए मजबूर होना पड़ा। उन्होंने चेतावनी दी कि अब इसे किसी अपर्याप्त तरीके से बेमतलब नहीं बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, “सालों तक भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने जाति जनगणना का विरोध किया। 2021 में केंद्र सरकार ने संसद को बताया कि उसने जाति-वार आबादी की गिनती न करने का नीतिगत फैसला किया है।”
परमेश्वर ने कहा कि कांग्रेस ने लगातार अपडेटेड जाति जनगणना की मांग की है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय, प्रतिनिधित्व और अवसरों के समान वितरण को मुख्य मुद्दा बनाया है।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने आखिरकार जनगणना के हिस्से के तौर पर जाति की गिनती की घोषणा की और इस फैसले का स्वागत किया। हालांकि, उन्होंने सवाल उठाया कि क्या सरकार ऐसी वास्तविक जनगणना करेगी जिससे देश की सामाजिक संरचना पर भरोसेमंद डाटा मिल सके।
परमेश्वर ने प्रस्तावित तरीके पर चिंता जताते हुए कहा कि बिना किसी स्टैंडर्ड और वेरिफाइड जाति ढांचे के ओबीसी और अन्य समुदायों के लिए ओपन-एंडेड सिस्टम से एक ही समुदाय को अलग-अलग स्पेलिंग, उप-जाति के नामों, क्षेत्रीय पहचानों और स्थानीय नामों के तहत दर्ज किया जा सकता है।
उन्होंने कहा, “इससे एक ही समुदाय के हजारों अलग-अलग एंट्रीज हो सकती हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि इस तरह के बंटवारे से अलग-अलग समुदायों की वास्तविक आबादी का पता लगाना मुश्किल हो जाएगा।
परमेश्वर ने सवाल किया कि भारत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्टैंडर्ड लिस्ट क्यों बनाए रख सकता है, लेकिन ओबीसी की गिनती के लिए वैज्ञानिक ढांचा क्यों नहीं विकसित कर सकता।
उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य पहले से ही पिछड़े वर्गों और सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े समुदायों की लिस्ट बनाए रखते हैं और उनके पास आरक्षण और कल्याणकारी कार्यक्रमों को लागू करने का दशकों का प्रशासनिक अनुभव है।
उन्होंने सुझाव दिया कि केंद्र सरकार सेंट्रल और स्टेट लिस्ट को एक साथ लाए, स्टैंडर्ड कास्ट कोड बनाए और एक ऐसा सिस्टम तैयार करे जिससे अलग-अलग नामों, उप-जातियों और क्षेत्रीय पहचानों को सही स्टैंडर्ड कैटेगरी से जोड़ा जा सके।
डिप्टी सीएम ने कहा कि कर्नाटक पहले ही एक बड़ा सामाजिक और शैक्षिक सर्वे कर चुका है, जबकि बिहार ने जाति-आधारित सर्वे किया है और तेलंगाना ने भी जाति की गिनती की है। उन्होंने केंद्र से राज्यों के अनुभव से सीखने और तरीका तय करने से पहले राज्य सरकारों, एक्सपर्ट्स, राजनीतिक पार्टियों और समुदाय के प्रतिनिधियों से सलाह-मशविरा करने की अपील की।
परमेश्वर ने जाति जनगणना को ‘सामाजिक न्याय का जरिया’ बताते हुए कहा कि आरक्षण, शिक्षा, रोजगार, कल्याण, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आर्थिक मौकों से जुड़ी नीतियां बनाने के लिए आज के समय के हिसाब से और पूरी जाति संबंधी जानकारी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि अहिंदा समुदायों (जिनमें अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित शामिल हैं) के लिए भरोसेमंद डाटा बहुत जरूरी है, ताकि उनके सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन का पता लगाया जा सके और विकास के मौकों तक उनकी बराबर पहुंच पक्की की जा सके।
परमेश्वर ने केंद्र सरकार से अपील की कि वह खुले तरीके (ओपन-एंडेड मेथोडोलॉजी) पर फिर से विचार करे, वैज्ञानिक रूप से स्टैंडर्ड नेशनल कास्ट लिस्ट और कोडिंग फ्रेमवर्क बनाए, राज्य-विशेष पहचानों की रक्षा करते हुए सेंट्रल और स्टेट ओबीसी/एसईबीसी लिस्ट में तालमेल बिठाए, और अलग-अलग नामों और उप-जातियों को मैप करने के लिए एक पारदर्शी सिस्टम बनाए।
उन्होंने उन समुदायों को रिकॉर्ड करने के लिए भी एक सिस्टम की मांग की, जो असल में लिस्ट में नहीं हैं, ताकि बाद में उनकी जांच की जा सके। साथ ही, उन्होंने राज्यों, राजनीतिक पार्टियों, सामाजिक न्याय के एक्सपर्ट्स और समुदाय के प्रतिनिधियों से बातचीत करने पर जोर दिया।
उन्होंने कहा, “भारत के लोगों ने जाति जनगणना की मांग सिर्फ इसलिए नहीं की थी कि सवाल-जवाब की लिस्ट में जाति से जुड़ा एक सवाल जोड़ा जा सके। उन्होंने इसकी मांग इसलिए की, क्योंकि भारत को अपनी सामाजिक बनावट के बारे में सच्चाई जानने की जरूरत है।”
परमेश्वर ने कहा कि केंद्र सरकार को या तो सही मायने में जाति जनगणना करानी चाहिए या यह बताना चाहिए कि वह “सच्चाई की गिनती करने से क्यों डर रही है।” उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जाति संबंधी डाटा का इस्तेमाल सामाजिक न्याय की अगली पीढ़ी तैयार करने के लिए किया जाना चाहिए।
–आईएएनएस
एएसएच/डीकेपी
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