केरल हाई कोर्ट ने आईएएस अधिकारी की माफी खारिज की, न्यायपालिका से न टकराने चेतावनी दी

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कोच्चि, 10 जुलाई (आईएएनएस)। केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को आईएएस अधिकारी और काजू विभाग के सचिव के. बिजू द्वारा ‘मल्टी-करोड़ कैशू डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’ भ्रष्टाचार मामले में अभियोजन स्वीकृति संबंधी विवादास्पद सरकारी आदेश के संबंध में दी गई बिना शर्त माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही उन्हें कोर्ट द्वारा इंगित महत्वपूर्ण कमियों को शामिल करते हुए एक नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने हलफनामा लौटाते हुए राज्य के नौकरशाहों को कड़ा संदेश दिया और सिविल सेवकों को न्यायपालिका से जुड़े मामलों में सरकार का मोहरा बनने के खिलाफ चेतावनी दी। न्यायाधीश ने…

कोच्चि, 10 जुलाई (आईएएनएस)। केरल हाई कोर्ट ने शुक्रवार को आईएएस अधिकारी और काजू विभाग के सचिव के. बिजू द्वारा ‘मल्टी-करोड़ कैशू डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन’ भ्रष्टाचार मामले में अभियोजन स्वीकृति संबंधी विवादास्पद सरकारी आदेश के संबंध में दी गई बिना शर्त माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

इसके साथ ही उन्हें कोर्ट द्वारा इंगित महत्वपूर्ण कमियों को शामिल करते हुए एक नया हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया।

कोर्ट ने हलफनामा लौटाते हुए राज्य के नौकरशाहों को कड़ा संदेश दिया और सिविल सेवकों को न्यायपालिका से जुड़े मामलों में सरकार का मोहरा बनने के खिलाफ चेतावनी दी।

न्यायाधीश ने चेतावनी देते हुए कहा कि कोर्ट से टकराव करने की कोशिश न करें। यदि आप ऐसा करते हैं, तो कोई भी सरकार आपकी रक्षा नहीं कर सकती। उन्होंने आगे कहा कि सरकारी अधिकारी जनता की सेवा के लिए हैं, न कि केवल सरकार का बचाव करने के लिए।

नेपोलियन बोनापार्ट को उद्धृत करते हुए अदालत ने कहा कि एक बहादुर व्यक्ति केवल एक बार मरता है।

यह अवमानना ​​कार्यवाही काजू विकास निगम आयात भ्रष्टाचार मामले में अभियुक्तों (आईएनटीयूसी नेता आर. चंद्रशेखरन भी शामिल) पर मुकदमा चलाने के लिए सीबीआई को मंजूरी देने वाले सरकारी आदेश के विरुद्ध शुरू हुई।

हाई कोर्ट ने इससे पहले आदेश की शब्दावली पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा था कि इससे यह आभास होता है कि सरकार ने हाई कोर्ट के दबाव में ही अभियोजन की मंजूरी दी है, जिससे न्यायपालिका पर जिम्मेदारी डाली जा रही है।

अदालत के समक्ष पेश होने के लिए समन मिलने पर बिजू ने एक हलफनामा प्रस्तुत कर बिना शर्त खेद व्यक्त किया।

उन्होंने स्वीकार किया कि आदेश में प्रयुक्त भाषा अनुचित थी, हालांकि यह जानबूझकर नहीं की गई थी, और यह भी माना कि इस तरह की शब्दावली किसी भी वैध सरकारी आदेश में नहीं होनी चाहिए थी।

उन्होंने उन सभी अभिव्यक्तियों को भी वापस ले लिया जिन्हें हाई कोर्ट के अधिकार या विवेक पर सवाल उठाने के रूप में समझा जा सकता है।

हालांकि, अदालत ने माफी को अपूर्ण पाया और कहा कि इसमें इस बात का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है कि सरकार ने भ्रष्टाचार के आरोपों में प्रथम दृष्टया मामला पाए जाने के बाद ही अभियोजन की मंजूरी दी थी।

–आईएएनएस

एमएस/

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