नई दिल्ली, 12 मार्च (आईएएनएस)। भारत के रणनीतिक तेल भंडार और 40 तेल निर्यातक देशों से आपूर्ति ने यह सुनिश्चित करने में मदद की है कि देश वैश्विक ऊर्जा संकट जैसी स्थितियों का मजबूती से सामना कर पाए। यह जानकारी एक वरिष्ठ अधिकारी द्वारा गुरुवार को दी गई।
सरकारी आधिकारी ने कहा कि कहा कि देश का व्यापक आर्थिक आधार काफी मजबूत है। हमारे पास 11-12 महीनों तक सामान को आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। यह अगले पांच वर्षों के देश के तेल आयात के बिल चुकाने के लिए भी पर्याप्त है।
इसके साथ देश के पास 70 दिनों से अधिक की बाजार मांग को पूरा करने के लिए कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का भंडार मौजूद है। वहीं, देश ने कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए मध्य पूर्व से निर्भरता घटाई है।
अधिकारी ने कहा कि यह सरकार की इस स्थिति से निपटने की बहुसंबद्ध नीति व्यावहारिक आर्थिक कूटनीति को दर्शाता है जिसमें रूसी कच्चे तेल की खरीद, आवश्यक वस्तु अधिनियम का प्रयोग और संप्रभुता से समझौता किए बिना आपूर्ति में विविधता लाना शामिल है।
यह संकट मुद्रास्फीति की तुलना में विकास पर अधिक प्रभाव डालता है, जिससे सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) को व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए नीतिगत लचीलापन प्राप्त होता है।
भारत की मुद्रास्फीति दर लगभग 2.75 प्रतिशत है, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है। रूस से कच्चे तेल के आयात, ईंधन कर में लचीलेपन और एलपीजी की विनियमित कीमतों के कारण उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें नियंत्रण में बनी हुई हैं।
उदाहरण के लिए, जापान में मुद्रास्फीति दर 5 प्रतिशत है और यह सुदूर पूर्वी देश होर्मुज जलडमरूमध्य से निर्यात होने वाले कच्चे तेल पर 75 से 90 प्रतिशत तक निर्भर है। दूसरी ओर, भारत ने होर्मुज जलडमरूमध्य से आने वाली आपूर्ति पर अपनी निर्भरता को काफी कम करने के लिए अन्य देशों से ऊर्जा आयात में विविधता लाई है, जो पहले लगभग 50 प्रतिशत थी और बाद में घटकर 20 प्रतिशत हो गई।
पश्चिमी दबाव के बावजूद, भारत रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद जारी रखे हुए है, जो कुल आयात का लगभग एक तिहाई है। अधिकारी ने बताया कि इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका जैसे अन्य देशों से भी तेल आयात किया जा रहा है, जो राजनीतिक गठबंधन के बजाय विविधीकरण को दर्शाता है।
भारत के पास दो महीने से अधिक का भंडार है, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों के पास केवल 30 दिन या उससे भी कम का भंडार है। परिणामस्वरूप, पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 55 रुपए प्रति लीटर की भारी वृद्धि हुई है, वहीं श्रीलंका में भी घबराहट में खरीदारी के चलते ईंधन की कीमतें बढ़ा दी गई हैं और बांग्लादेश को ऊर्जा राशनिंग लागू करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।
–आईएएनएस
एबीएस/
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