“हिंदुस्तान अब गुलाम नहीं रह सकता…” नेताजी सुभाष चंद्र बोस की दूरदृष्टि और पराक्रम की अनकही कहानी

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti: “गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए एक दिल-एक प्राण होकर कटिबद्ध हो जाइए। हिंदुस्तान अब गुलाम नहीं रह सकता और न कोई ताकत इसे गुलाम रख सकती है।” ‘नेताजी’ सुभाष चंद्र बोस का यह जोशीला भाषण मात्र नहीं था, बल्कि वह दृढ़ संकल्प था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला डाली। जब पूरा देश ब्रिटिश साम्राज्य से आजादी पाने की जद्दोजहद में उबल रहा था, तब देश और देश के बाहर कई वीर आजादी के इस अग्निकुंड में ‘आजाद हिंदुस्तान’ की लौ प्रज्वलित कर रहे थे, जिनसे अंग्रेज भी खौफ खाते थे। ऐसे ही महान सपूत थे, नेताजी सुभाष चंद्र बोस।

“हमारे रास्ते में आएगी भूख, प्यास, तकलीफ, मुसीबतें और मौतें। कोई नहीं कह सकता है कि इस जंग में कितने लोग शामिल होंगे, उनमें से कितने लोग जिंदा बचेंगे। कोई बात नहीं है कि हम जिंदा रहेंगे या मरेंगे। कोई बात नहीं है, बात यह है कि आखिर में हमारी कामयाबी होगी। हिंदुस्तान आजाद होगा।”

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti: ‘पराक्रम दिवस’ की कहानी

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti
Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti

23 जनवरी 1897 को ब्रिटिश काल में बंगाल प्रेसीडेंसी के अंदर कटक में जन्मे सुभाष चंद्र बोस पराक्रमी थे, इसीलिए वर्तमान पूरा हिंदुस्तान उनके जन्मदिवस को ‘पराक्रम दिवस‘ के तौर पर मनाता है। सुभाष चंद्र बोस पूरे देश के नेताजी थे, हैं और रहेंगे, क्योंकि उनका इतना विराट व्यक्तित्व है कि व्याख्या के लिए शब्द भी कम पड़ जाएं और इतनी दूर की दृष्टि थी कि वहां तक देखने के लिए कई जन्म कम पड़ जाएं।

‘मैं ये जानकर बेहद आनंदित हूं कि आप ये महसूस कर चुके हैं कि आजादी हासिल करने की जिम्मेदारी सिर्फ देश में रह रहे लोगों के कंधों की जिम्मेदारी नहीं है। हर भारतीय, चाहे वो जहां भी रह रहा हो, उसे आखिरी लड़ाई में अपना योगदान देना होगा।’

अपनी मां से किया था यह प्रश्न

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरुद्ध लड़ने का उनका उत्साह उनके इस प्रश्न में झलकता है। 15 वर्षीय सुभाष ने 1912 में अपनी मां से यह प्रश्न पूछा था, “इस स्वार्थी युग में, कितने निस्वार्थ पुत्र अपनी मां के लिए अपने निजी हितों का पूर्णतः त्याग करने को तैयार हैं?”1921 में भारतीय सिविल सेवा से इस्तीफा देकर यह कदम उठाने की कगार पर खड़े होकर उन्होंने अपने बड़े भाई शरत को लिखा, “केवल त्याग और कष्ट की भूमि पर ही हम अपने राष्ट्र का निर्माण कर सकते हैं।”

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti: ‘त्याग’ के सिद्धांत मानते थे नेताजी

अपने माता-पिता के प्रभाव में ही नेताजी ने अपने बचपन से लेकर 1945 में दक्षिण पूर्व एशिया के युद्धक्षेत्रों में अपने शानदार कार्यकाल के अंतिम दिनों तक हिंदू धर्मग्रंथों के प्रति गहरा प्रेम विकसित किया। वे हमेशा अपनी वर्दी की सामने वाली जेब में भगवत गीता की एक प्रति रखते थे और रात के सन्नाटे में गहन ध्यान में लीन हो जाते थे। बोस ने उपनिषदों के ‘त्याग’ के सिद्धांत को अपनाया था, जिसके साथ उन्होंने देश और उसके मेहनतकश लोगों के लिए अथक परिश्रम करने का संकल्प लिया।”मैं सुभाष चंद्र बोस, अपने जीवन की अंतिम सांस तक स्वतंत्रता के पवित्र युद्ध को जारी रखूंगा।”

जब देश के पहले राष्ट्राध्यक्ष बने थे बोस

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti
Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti

वर्ष 1943 और दिन 21 अक्टूबर, यह सिर्फ एक तारीख मात्र नहीं, बल्कि भारत के इतिहास का वह क्षण था, जब सुभाष चंद्र बोस हिंदुस्तान की अंतरिम सरकार बना चुके थे। 21 अक्टूबर 1943 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर में भारत की अंतरिम सरकार ‘आजाद हिंद सरकार’ की स्थापना की। ‘नेताजी’ देश के पहले राष्ट्राध्यक्ष बने।

आजाद हिंद सरकार को उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक मान्यता मिली। चीन, जर्मनी, जापान, कोरिया और इटली सहित दस से अधिक देशों ने इस सरकार को मान्यता दी, जिससे भारत की आजादी की लड़ाई को वैश्विक मंच पर नई मजबूती और पहचान प्राप्त हुई। इससे पहले, नेताजी के नेतृत्व में ‘आजाद हिंदू फौज’ ने अपनी बहादुरी से न सिर्फ गोरी सेना को कई मोर्चों पर हराया था, बल्कि भारत के एक बड़े भूभाग को आजाद भी करा लिया था।

फिर, 26 अगस्त, 1943 को आईएनए की सीधी कमान संभालने के दिन उन्होंने कहा, “मैं प्रार्थना करता हूं कि ईश्वर मुझे हर परिस्थिति में, चाहे वह कितनी भी कठिन या चुनौतीपूर्ण क्यों न हो, भारतीयों के प्रति अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए आवश्यक शक्ति प्रदान करें।”

Netaji Subhash Chandra Bose Jayanti: आजाद हिंद फौज और स्वतंत्रता आंदोलन

आजाद हिंद फौज ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक अमिट छाप छोड़ी। इसके सैनिकों की वीरता और बलिदान ने भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़ने वाले लोगों में नई ऊर्जा और उत्साह का संचार किया। आजाद हिंद फौज के सैनिकों पर चले मुकदमे (लाल किला ट्रायल) ने देश भर में देशभक्ति की लहर पैदा कर दी थी और ब्रिटिश राज की नींव को हिलाने का काम किया। यह दिवस नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज के वीर सेनानियों के अदम्य साहस, देशभक्ति और बलिदान को नमन करने का दिन है।–आईएएनएस

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