नई दिल्ली, 11 अक्टूबर (आईएएनएस)। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक सेनानी, प्रखर चिंतक और समाजवाद के पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि 12 अक्टूबर को है। 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर में जन्मे लोहिया का जीवन विचार और कर्म के अद्भुत संगम की मिसाल है। ढाई साल की उम्र में मां चंदा देवी को खोने के बाद उनका पालन-पोषण दादी और परिवार की नाईन सरयूदेई ने किया। उनके पिता हीरालाल पेशे से शिक्षक और गांधीवादी थे, जिनके साथ वे बचपन से ही कांग्रेस अधिवेशनों में जाने लगे।
लोहिया की प्रारंभिक शिक्षा टंडन पाठशाला और विश्वेश्वरनाथ हाईस्कूल में हुई। लोकमान्य तिलक की मृत्यु पर 1920 में उन्होंने पहली बार स्कूल में हड़ताल करवाई। गांधीजी के आह्वान पर 10 साल की उम्र में ही स्कूल छोड़ दिया। 1921 में फैजाबाद किसान आंदोलन के दौरान जवाहरलाल नेहरू से उनकी पहली मुलाकात हुई। इंटर की पढ़ाई काशी विश्वविद्यालय से की और वहीं से खादी पहनना शुरू किया। 1927 में वे कलकत्ता के विद्यासागर कॉलेज आए और छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए। साइमन कमीशन के बहिष्कार आंदोलन में उन्होंने अहम भूमिका निभाई।
1930 में वे उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड और फिर बर्लिन गए। तीन महीने में जर्मन भाषा सीखी और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री प्रो. बर्नर जेम्बार्ट के निर्देशन में ‘नमक सत्याग्रह’ विषय पर शोध कर 1932 में बर्लिन विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। बर्लिन में ही उन्होंने लीग ऑफ नेशंस की बैठक में भगत सिंह की फांसी का विरोध करते हुए सीटी बजाकर सभागार में हंगामा खड़ा कर दिया था।
1933 में भारत लौटने पर लोहिया ने समाजवादी आंदोलन की नींव रखी। 17 मई 1934 को पटना में और 21-22 अक्टूबर 1934 को बॉम्बे में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में उनकी केंद्रीय भूमिका रही। 1935 में उन्हें कांग्रेस के परराष्ट्र विभाग का मंत्री बनाया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उन्होंने युद्ध-भर्ती और युद्ध-कर्ज का खुलकर विरोध किया, जिसके लिए 1940 में उन्हें दो साल की सख्त सजा हुई। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में जब सभी बड़े नेता गिरफ्तार हो गए, तब लोहिया ने भूमिगत रहकर आंदोलन को नेतृत्व दिया। अच्युत पटवर्धन और उषा मेहता के साथ मिलकर उन्होंने गुप्त रेडियो स्टेशन चलाया और ‘जंग आगे बढ़ो’ जैसी पुस्तिकाएं लिखीं। 1944 में गिरफ्तार होने पर उन्हें लाहौर किले की उसी अंधेरी कोठरी में रखा गया, जहां 14 साल पहले भगत सिंह को फांसी दी गई थी।
11 अप्रैल 1946 को जेल से रिहा होने के बाद 18 जून 1946 को उन्होंने गोवा में पुर्तगाली शासन के खिलाफ पहला सत्याग्रह किया और गोवा मुक्ति आंदोलन की अलख जगाई।
आजादी के बाद कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने समाजवादी आंदोलन को नई दिशा दी। 1949 में पटना सम्मेलन में उन्होंने ‘चौखंभा राज्य’ का विचार दिया, जिसमें गांव, मंडल, प्रांत और केंद्र को बराबर की शक्ति देने की बात थी। 1952 में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के गठन और बाद में 1955 में सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना में वे प्रमुख रहे।
लोहिया को ‘गैर-कांग्रेसवाद का शिल्पी’ कहा जाता है। उनका मानना था कि लंबे समय तक सत्ता में रहकर कांग्रेस अधिनायकवादी हो गई है। उनके इसी विचार का परिणाम था कि 1967 के चुनावों में 9 राज्यों में कांग्रेस हारी, जिसने आगे चलकर 1977 में केंद्र में पहली गैर-कांग्रेसी सरकार का रास्ता खोला। 1963 में फर्रुखाबाद उपचुनाव जीतकर वे लोकसभा पहुंचे और ‘तीन आना बनाम पंद्रह आना’ की उनकी बहस आज भी ऐतिहासिक मानी जाती है, जिसमें उन्होंने देश की गरीबी और प्रधानमंत्री पर होने वाले खर्च की तुलना की थी।
1957 में उन्होंने ‘अंग्रेजी हटाओ’ आंदोलन चलाया। वे कहते थे, इसका मतलब ‘हिंदी लाओ’ नहीं, बल्कि ‘मातृभाषा लाओ’ है। उनके अनुसार, यदि सरकारी काम ऐसी भाषा में चले जिसे करोड़ों लोग न समझें, तो वह जादू-टोना ही है। वे चाहते थे कि आम भारतीय अपनी भाषा पर गर्व करे।
30 सितंबर 1967 को पौरुष ग्रंथि के ऑपरेशन के लिए उन्हें दिल्ली के विलिंगडन अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 12 अक्टूबर 1967 को 57 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। कर्म और विचार की एकता के प्रतीक लोहिया आज भी भारतीय राजनीति में शुचिता और मौलिक देसी चिंतन के सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं।
–आईएएनएस
एससीएच/डीकेपी
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