शाहजहांपुर, 8 अगस्त (आईएएनएस)। देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी का फंदा चूमने वाले अमर शहीद क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि आजाद भारत में भी दशकों तक विकास की मुख्यधारा से कटे रहने का दर्द सहती रही। जिस गांव की मिट्टी ने देश को ऐसा वीर सपूत दिया, उसी गांव की तीन पीढ़ियां हर साल बारिश के मौसम में दुनिया से कट जाने की मजबूरी झेलती रहीं। सरकारें बदलती रहीं, लेकिन उनकी यह पीड़ा बनी रही।
आखिरकार, उनका यह दर्द महसूस किया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने। उत्तर प्रदेश में सरकार बनने पर जैसे ही यह मामला सीएम योगी के संज्ञान में आया, उन्होंने खन्नौत नदी पर पीपे के बजाय पक्के पुल का निर्माण कराया। इतना ही नहीं, मुख्यमंत्री पुल के उद्घाटन पर स्वयं शहीद के पैतृक गांव नवादा पहुंचे और ठाकुर रोशन सिंह के परिवार से मिले। वहां मौजूद ग्रामीणों की आंखों में सीएम के प्रति कृतज्ञता के भाव से आंसू छलक उठे। यह सिर्फ एक पुल का उद्घाटन नहीं, बल्कि शहादत को मिले सम्मान और वर्षों की उपेक्षा के अंत का भावुक क्षण था।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का नाम अमर बलिदानियों में दर्ज है। उनका जन्म 19 दिसंबर 1892 को शाहजहांपुर जिले के नवादा गांव में ठाकुर जंगी सिंह और कौशल्या देवी के घर हुआ था। बचपन से ही वह अदम्य साहसी, कुशल पहलवान व अचूक निशानेबाज थे। वह युवावस्था में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से जुड़े और बाद में हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के सक्रिय क्रांतिकारी बन गए। 1922 में चौरी-चौरा कांड के विरोध में बरेली में हुए प्रदर्शन के दौरान अंग्रेजों ने लाठीचार्ज किया। इसी दौरान रोशन सिंह भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़े और एक अंग्रेज अधिकारी की बंदूक छीन ली।
उन्होंने हवा में फायरिंग कर लाठीचार्ज रुकवाया। इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दो वर्ष की कठोर कैद की सजा दी। जेल से रिहा होने के बाद उनका झुकाव पूरी तरह क्रांतिकारी आंदोलन की ओर हो गया और वह अंग्रेज हुकूमत की आंख की किरकिरी बन गए। दिसंबर 1924 में एचआरए ने संगठन के लिए धन जुटाने के उद्देश्य से पीलीभीत की बिसलपुर तहसील के बमरौली गांव में कार्रवाई की। इस दौरान हुई गोलीबारी में एक व्यक्ति की मौत हो गई। ठाकुर रोशन सिंह पर हत्या का मामला दर्ज किया गया, लेकिन वह अंग्रेजों के हाथ नहीं आए।
बाद में 1925 के काकोरी कांड के बाद ब्रिटिश सरकार ने ठाकुर रोशन सिंह को भी गिरफ्तार कर मुकदमे में शामिल किया। भले ही वह काकोरी ट्रेन लूट की घटना में प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं थे, लेकिन संगठन से जुड़े होने के कारण उन्हें भी पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां व राजेंद्र नाथ लाहिड़ी के साथ दोषी ठहराया गया।
अदालत में जब उन्हें विभिन्न धाराओं में सजा सुनाई जा रही थी, तब रोशन सिंह ने निर्भीक होकर कहा, “मुझे भी वही सजा दो जो बिस्मिल को मिली है।” आखिरकार जज ने उन्हें फांसी की सजा सुना दी। 19 दिसंबर 1927 को प्रयागराज की नैनी जेल में उन्होंने गीता का पाठ करने के उपरांत वंदे मातरम् का गगनभेदी उद्घोष करते हुए फांसी के फंदे को चूम लिया। देश आजाद हो गया, लेकिन क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह का पैतृक गांव नवादा दशकों तक बुनियादी सुविधाओं से वंचित रहा। खन्नौत नदी पर पुल न होने के कारण हर भारी बारिश और बाढ़ की वजह से पूरा इलाका चार से पांच महीने तक मुख्य मार्गों से कट जाता था। मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते थे, बच्चों की पढ़ाई रुक जाती थी और किसानों की फसल समय पर बाजारों तक नहीं पहुंच पाती थी।
यह दर्द गांव की एक नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों ने लगतार दशकों तक झेला। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश की बागडोर संभालने के कुछ समय बाद ही नवादा गांव के लोग उनसे मिले। इन लोगों ने मुख्यमंत्री को गांव की पीड़ा से अवगत कराते हुए खन्नौत नदी पर पीपे का पुल बनवाने का अनुरोध किया। अमर शहीद के गांव की उपेक्षा से द्रवित सीएम ने 25 फरवरी 2018 को शाहजहांपुर में विकास परियोजनाओं के साथ खन्नौत नदी पर पक्के पुल, सड़कों व डिग्री कॉलेज जैसी परियोजनाओं को मंजूरी दी।
पक्का पुल बनने के बाद, 30 दिसंबर 2018 को मुख्यमंत्री स्वयं नवादा गांव में ठाकुर रोशन सिंह के पैतृक घर पहुंचे। मुख्यमंत्री ने शहीद की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित की और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान किया। योगी आदित्यनाथ का भाव देखकर वर्षों से उपेक्षा झेल रहे शहीद के परिजन और ग्रामीण भावुक हो उठे। कई बुजुर्गों की आंखों से आंसू छलक पड़े। गांव वालों के लिए यह सिर्फ मुख्यमंत्री का दौरा नहीं, बल्कि उस बलिदान का सम्मान था, जिसकी प्रतीक्षा दशकों से थी।
खन्नौत नदी पर बना पक्का पुल आज नवादा, दरोवस्त और आसपास के गांवों के लिए नई जिंदगी बन चुका है। अब एम्बुलेंस समय पर पहुंच रही है, छात्र आसानी से स्कूल और कॉलेज जा रहे हैं और किसानों की उपज बाजारों तक पहुंचने लगी है। गांव में डिग्री कॉलेज और शहीद के घर को स्मारक के रूप में विकसित किए जाने से नई पीढ़ी को भी उनके बलिदान से प्रेरणा मिल रही है।
क्रांतिकारी ठाकुर रोशन सिंह की जन्मभूमि की यह कहानी सिर्फ एक पुल बनने की नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सम्मान की है, जिसका इंतजार गांव की तीन पीढ़ियां करती रहीं। आज वह दर्द इतिहास बन चुका है और नवादा की धरती आने वाली पीढ़ियों को हमेशा देशभक्ति, बलिदान और सम्मान का संदेश देती रहेगी।
–आईएएनएस
विकेटी/डीकेपी
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