Supreme Court Religion vs Law Hearing: सुप्रीम कोर्ट में ‘धर्म बनाम कानून’ से जुड़े अहम मामले की सुनवाई बुधवार को दूसरे दिन भी जारी रही। 9 जजों की संवैधानिक पीठ के सामने इस दौरान कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस हुई। सुनवाई की शुरुआत ही वरिष्ठ वकील राजीव धवन और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के बीच समय को लेकर तीखी नोकझोंक से हुई।
Supreme Court Religion vs Law Hearing: समय को लेकर शुरू हुआ विवाद

सुनवाई की शुरुआत ही राजीव धवन ने कोर्ट से शिकायत की कि सरकार की ओर से लंबी दलीलें दी जा रही हैं, जिससे याचिकाकर्ताओं को अपनी बात रखने का पर्याप्त मौका नहीं मिल पा रहा है। उन्होंने कहा कि अगर पूरा समय सॉलिसिटर जनरल ही ले लेंगे, तो बाकी पक्षों के वकीलों के पास कुछ कहने का अवसर नहीं बचेगा। इस पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हस्तक्षेप करते हुए सभी वरिष्ठ वकीलों को बराबर समय देने का भरोसा दिलाया। इस दौरान धवन और तुषार मेहता के बीच हल्की बहस भी देखने को मिली, जिसमें धवन ने मेहता को बीच में न बोलने की सलाह दी।
कोर्ट और धर्म के दायरे पर बहस
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अपनी दलील में कहा कि धर्मनिरपेक्ष अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन-सी धार्मिक प्रथा जरूरी है और कौन-सी नहीं। उनके अनुसार, अदालतें धार्मिक मामलों की विशेषज्ञ नहीं होतीं, इसलिए उन्हें आस्था के मुद्दों में सीमित भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सच्ची धर्मनिरपेक्षता का मतलब यह है कि राज्य धर्म में दखल न दे और धर्म भी शासन के काम में हस्तक्षेप न करे। कोर्ट ने इस तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब बात संवैधानिक मूल्यों की आती है, तो अदालत की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
Supreme Court Religion vs Law Hearing: धार्मिक प्रथाओं और कानून का टकराव

तुषार मेहता ने विभिन्न राज्यों के धार्मिक बंदोबस्त कानूनों का हवाला देते हुए कहा कि पुजारियों की नियुक्ति जैसे मामलों में सरकार का दखल धार्मिक स्वतंत्रता के सिद्धांत के खिलाफ हो सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि किसी धार्मिक संप्रदाय को सख्ती से परिभाषित करना आसान नहीं है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने शिरडी साईं बाबा और तिरुपति जैसे स्थलों का जिक्र किया, जहां अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग श्रद्धा से आते हैं। ऐसे मामलों में संप्रदाय की स्पष्ट सीमा तय करना मुश्किल हो जाता है।
बदलती सार्वजनिक नैतिकता पर टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने ‘सार्वजनिक नैतिकता’ के मुद्दे पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि नैतिकता कोई स्थिर अवधारणा नहीं है, बल्कि समय और समाज के साथ बदलती रहती है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जो चीजें 1950 के दशक में अनुचित मानी जाती थीं, वही आज सामान्य मानी जा सकती हैं। ऐसे में पुराने मानकों के आधार पर वर्तमान समाज का मूल्यांकन करना उचित नहीं होगा।
Supreme Court Religion vs Law Hearing: संवैधानिक नैतिकता का महत्व
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सॉलिसिटर जनरल के इस तर्क से असहमति जताई कि संवैधानिक नैतिकता न्यायिक समीक्षा का आधार नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 25 में ‘अंतरात्मा की स्वतंत्रता’ का उल्लेख है, जो हर व्यक्ति को अपने विचार और विश्वास के अनुसार जीने का अधिकार देता है। उन्होंने आगे कहा कि यदि समाज का कोई वर्ग संवैधानिक मूल्यों के आधार पर जीवन जीना चाहता है, तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, भले ही दूसरे लोग उससे सहमत हों या नहीं।
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