यादों में परसाई : हंसाते-हंसाते व्यवस्था को दिखाया आईना, दशकों बाद भी उनकी लेखनी प्रासंगिक

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नई दिल्ली, 21 अगस्त (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य में व्यंग्य की बात हो और हरिशंकर परसाई का नाम न आए, ऐसा हो नहीं सकता। परसाई उन लेखकों में थे, जिन्होंने लोगों को सिर्फ हंसाया नहीं, बल्कि हंसते-हंसते उन्हें समाज की ऐसी सच्चाइयों से रूबरू कराया, जिनसे हम अक्सर आंखें चुराते हैं। उनकी कलम ने भ्रष्टाचार, पाखंड, अंधविश्वास, बेईमानी, राजनीतिक दिखावे और सामाजिक विसंगतियों पर ऐसा निशाना साधा कि पढ़ने वाला पहले मुस्कुराता है और फिर अचानक सोच में पड़ जाता है। हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1922 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गांव में हुआ था। उनका…

नई दिल्ली, 21 अगस्त (आईएएनएस)। हिंदी साहित्य में व्यंग्य की बात हो और हरिशंकर परसाई का नाम न आए, ऐसा हो नहीं सकता। परसाई उन लेखकों में थे, जिन्होंने लोगों को सिर्फ हंसाया नहीं, बल्कि हंसते-हंसते उन्हें समाज की ऐसी सच्चाइयों से रूबरू कराया, जिनसे हम अक्सर आंखें चुराते हैं। उनकी कलम ने भ्रष्टाचार, पाखंड, अंधविश्वास, बेईमानी, राजनीतिक दिखावे और सामाजिक विसंगतियों पर ऐसा निशाना साधा कि पढ़ने वाला पहले मुस्कुराता है और फिर अचानक सोच में पड़ जाता है।

हरिशंकर परसाई का जन्म 22 अगस्त 1922 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी गांव में हुआ था। उनका बचपन आसान नहीं रहा। छोटी उम्र में मां का निधन हो गया और बाद में पिता भी बीमारी के कारण चल बसे। परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। चार छोटे भाइयों की जिम्मेदारी के बीच उन्होंने जिंदगी को बेहद करीब से देखा। शायद यही वजह रही कि उनके लेखन में आम आदमी की परेशानियां और समाज की सच्चाई इतनी गहराई से दिखाई देती है।

परसाई ने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एमए किया और कुछ समय अध्यापन भी किया। उन्होंने नौकरी की, लेकिन आखिरकार सुरक्षित नौकरी छोड़कर स्वतंत्र लेखन का रास्ता चुना। 1947 के बाद उन्होंने पूरी तरह लेखन को अपना जीवन बना लिया। जबलपुर से उन्होंने ‘वसुधा’ नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली। इसे साहित्य जगत में सराहना मिली, लेकिन आर्थिक नुकसान के चलते कुछ समय बाद प्रकाशन बंद करना पड़ा।

परसाई की सबसे बड़ी खासियत थी कि उनका व्यंग्य सिर्फ हंसाने के लिए नहीं था। वह समाज की कमजोर नस पकड़ते थे और वहीं चोट करते थे। उनकी रचनाओं में गरीबी, शोषण, भ्रष्टाचार, धार्मिक पाखंड, अंधविश्वास और राजनीतिक अवसरवाद जैसे मुद्दे बार-बार सामने आते हैं। वह जिस समस्या पर लिखते, उसे केवल ऊपर-ऊपर से नहीं देखते थे, बल्कि उसकी जड़ तक पहुंचने की कोशिश करते थे।

उनकी भाषा भी आम लोगों के बेहद करीब थी। ऐसा लगता है, जैसे कोई लेखक किताब में बैठकर भाषण नहीं दे रहा, बल्कि सामने बैठकर आपसे बातचीत कर रहा हो। उनके शब्दों में तीखापन जरूर था, लेकिन वह बोझिल नहीं लगता था। वह गंभीर से गंभीर बात को भी इतनी सहजता से कह देते थे कि पाठक पहले हंसता और फिर खुद से सवाल करने लगता।

‘प्रेमचंद के फटे जूते’ हो या ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’, ‘सदाचार का ताबीज’ हो या ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’, परसाई की रचनाओं में अपने समय का समाज साफ दिखाई देता है। उन्होंने दिखावे की राजनीति, खोखले आदर्शों और अवसरवाद पर जमकर व्यंग्य किया। ‘भोलाराम का जीव’ जैसी रचनाओं में भी व्यवस्था की जटिलताओं और आम आदमी की बेबसी को बेहद प्रभावी ढंग से सामने रखा गया।

उनका कॉलम ‘परसाई से पूछें’ भी काफी लोकप्रिय हुआ। इसमें पाठक उनसे सवाल पूछते थे और वह अपने अंदाज में जवाब देते थे। शुरुआत में सवाल हल्के-फुल्के और फिल्मी किस्म के होते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने पाठकों को गंभीर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों की तरफ मोड़ा। इस तरह उनका लेखन सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम पाठक से सीधा संवाद बन गया।

उन्हें 1982 में ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

10 अगस्त 1995 को जबलपुर में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके व्यंग्य समय के साथ पुराने नहीं पड़े। आज सोशल मीडिया पर उनके लिखे वाक्य और विचार अक्सर दिखाई देते हैं।

–आईएएनएस

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