असम के लिए सरकार द्वारा नामित समिति के अध्यक्ष ने दिया इस्तीफा

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असम समझौते के छठे उपबंध के कार्यान्वयन का आकलन करने के लिए केंद्र द्वारा नामित समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए एम पी बेजबरुआ ने इसका

असम समझौते के छठे उपबंध के कार्यान्वयन का आकलन करने के लिए केंद्र द्वारा नामित समिति के अध्यक्ष नियुक्त किए गए एम पी बेजबरुआ ने इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है जिससे नौ सदस्यीय समिति को झटका लगा है।

बेजबरुआ इस उच्च स्तरीय समिति के पांचवे सदस्य हैं जिन्होंने इसका हिस्सा बनने से इनकार किया है। उन्होंने इस संबंध में गृह मंत्रालय को पत्र लिखा है। गृह मंत्रालय द्वारा गठित समिति को पहले से ही छोड़ चुके लोगों में असम साहित्य सभा के दो अध्यक्ष -नागेन सैकिया और रोंगबोंग तेरांग, शिक्षाविद् मुकुंद राजबंग्शी और प्रभावशाली अखिल असम छात्र संघ का एक प्रतिनिधि शामिल है।

असम विधानसभा और स्थानीय निकायों में असमिया लोगों के लिए कितनी सीटें आरक्षित की जाएं, इसके मूल्यांकन के साथ-साथ अन्य सुरक्षा उपाय मुहैया कराने के लिए सरकार की ओर से छह जनवरी को एक समिति गठित की गई थी।

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असम समझौते के छठे उपबंध में कहा गया है कि असम के लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषायी पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षा और प्रचार करने के लिए उन्हें ‘‘संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय मुहैया कराए जाए।’’

बेजबरुआ ने नई दिल्ली में पीटीआई-भाषा को बताया, “मैंने गृह मंत्रालय को बता दिया कि मेरे लिए ऐसे में समिति में बने रहना ठीक नहीं होगा जब नागरिक समाज के प्रतिनिधियों ने समिति का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है। नागरिक समाज के सदस्यों के बिना एक समिति का अध्यक्ष बने रहने के कोई मायने नहीं है।”

पूर्व केंद्रीय पर्यटन सचिव ने गुवाहाटी में एक स्थानीय टेलीविजन चैनल से कहा कि जब उनसे समिति का अध्यक्ष बनने के लिए कहा गया तब उन्हें लगा कि असम समझौते के उपबंध 6 को लागू करने में हम कुछ योगदान दे सकते है। लेकिन तब से कुछ चीजें हुई और समिति में बने रहने की मुझे कोई वजह नजर नहीं आती।

बेजबरुआ ने कहा, ‘‘यह समिति असम के लोगों के लिए है और अगर उन्हें लगता है कि इसकी कोई जरुरत नहीं है तो इसमें बने रहने का कोई मतलब नहीं है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘इसके अलावा आसू और तीन अन्य सम्मानित सदस्यों ने समिति का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया और इससे यह निष्क्रिय बन गई। लोगों ने समिति को स्वीकार नहीं किया और मुझे भी इसमें बने रहने की कोई वजह नहीं दिखाई देती।’’

सैकिया और तेरांग लोकसभा नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के बाद इसके कार्य संचालन को लेकर आपत्तियों का हवाला देते हुए समिति से हट गए। उन्होंने कहा कि यह विधेयक असम की संस्कृति और पहचान के लिए खतरा है।

आसू ने भी इसका हिस्सा बनने से इनकार कर दिया। उसने कहा, ‘‘केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने असम में वोट मांगने के लिए लोकसभा चुनाव से महज तीन महीने पहले समिति बनाई।’’ समिति के अन्य सदस्यों में पूर्व आईएएस अधिकारी सुभाष दास, ‘द सेंटीनल’ के पूर्व संपादक धीरेंद्र नाथ बेजबरुआ और असम के महाधिवक्ता बी रमेश शामिल हैं।

Desk Team