Atma Shradh in Pitru Paksha: बिहार के गया जी में जीवित इंसान भी कर सकता है अपना पिंडदान? जानें ‘आत्मश्राद्ध’ से जुड़ी अनोखी परंपरा

Summary :

यह आर्टिकल पितृपक्ष में किए जाने वाले श्राद्ध और पिंडदान के महत्व पर प्रकाश डालता है, विशेष रूप से बिहार के गया में निभाई जाने वाली एक अनूठी परंपरा 'आत्मश्राद्ध' के बारे में बताता है। गया के जनार्दन मंदिर में जीवित लोग भी अपना श्राद्ध कर सकते हैं। ऐसा वे लोग करते हैं जिनकी कोई संतान नहीं होती या जिन्हें लगता है कि उनकी मृत्यु के बाद कोई उनका पिंडदान नहीं करेगा। इस आत्मश्राद्ध का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मृत्यु के बाद उनकी आत्मा भटके नहीं और उन्हें मोक्ष मिल सके।

Atma Shradh in Pitru Paksha: पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों की याद और उनकी आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं। गया, काशी, बद्रीनाथ, हरिद्वार और उज्जैन जैसे कई धार्मिक स्थानों पर पिंडदान किया जाता है। यहां लोग दूर-दूर से आकर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध-पूजा करते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बिहार के गयाजी में सिर्फ मृत हुए लोगों का ही नहीं, बल्कि जीवित लोगों का भी श्राद्ध किया जाता है। लेकिन, ऐसा क्यों आइए जानें।

गया का जनार्दन मंदिर क्यों हैं खास?

Janardan Temple Gaya
Janardan Temple Gaya (Source: Social Media)
गया में पिंडदान के लिए कई पवित्र जगहें हैं। इन्हीं में से एक ‘जनार्दन मंदिर’ है, जहां खुद का श्राद्ध करने की परंपरा है। यह मंदिर भस्मकूट पर्वत पर मां मंगला गौरी मंदिर के उत्तर की तरफ मौजूद है। माना जाता है कि यहां लोग अपने जीते-जी अपना श्राद्ध करने आते हैं, जिसे ‘आत्मश्राद्ध’ कहा जाता है। यहां भगवान विष्णु ‘जनार्दन स्वामी’ के रूप में विराजते हैं और उन्हें पिंड चढ़ाने से व्यक्ति को मोक्ष मिलता है।

 

जीवित लोग अपना श्राद्ध क्यों करते हैं?

Atma Shradh in Pitru Paksha
Atma Shradh in Pitru Paksha (AI Generated)
जिन लोगों के कोई संतान नहीं हैं, या जिन्हें लगता है कि मृत्यु के बाद उनका पिंडदान करने वाला कोई नहीं होगा, वे लोग मृत्यु से पहले ही यहां आकर अपना श्राद्ध कर देते हैं। ऐसा करने से उनकी मृत्यु के बाद उनकी आत्मा भटकती नहीं और उन्हें मोक्ष मिल जाता है। इसके अलावा, जो लोग साधु-संत बन जाते हैं या दुनियादारी छोड़कर संन्यास ले लेते हैं, वे भी अपना आत्मश्राद्ध करते हैं।

3 दिन चलती है आत्मश्राद्ध की प्रक्रिया (Self Shradh Ritual)

आत्मश्राद्ध की यह पूरी पूजा तीन दिनों में संपन्न होती है। गया पहुंचकर सबसे पहले पूजा का संकल्प लिया जाता है और प्रायश्चित किया जाता है। इसके बाद जनार्दन स्वामी मंदिर में पूजा और मंत्रों का जाप होता है। फिर नियम के अनुसार भगवान को पिंड चढ़ाया जाता है।

दही-चावल से बनाए जाते हैं तीन पिंड

आत्मश्राद्ध में दही और चावल को मिलाकर तीन पिंड बनाए जाते हैं। फिर इन्हें भगवान जनार्दन स्वामी को चढ़ाया जाता है। इस पूजा में तिल का इस्तेमाल नहीं होता, जबकि आम श्राद्ध में तिल बहुत जरूरी माना जाता है। पिंड चढ़ाते समय व्यक्ति भगवान से प्रार्थना करता है कि उसे मृत्यु के बाद मोक्ष मिले।
आत्मश्राद्ध करने के बाद का जीवन

आत्मश्राद्ध करने के बाद व्यक्ति को धार्मिक रूप से ‘मृत’ मान लिया जाता है, इसलिए उसके जीवन के नियम पूरी तरह बदल जाते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने परिवार और समाज के सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर एक संन्यासी या साधु की तरह सादा जीवन बिताने लगता है। वह दोबारा सांसारिक सुख-सुविधाओं या पारिवारिक मोह-माया में नहीं बंधता और अपना बाकी जीवन केवल भगवान की भक्ति और साधना में लगाता है।

Disclaimer: इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथियों, कहानियों या मान्यताओं पर आधारित है। पंजाब केसरी इसकी सत्यता की पुष्टि नहीं करता है।

Khushi Srivastava

खुशी श्रीवास्तव मीडिया इंडस्ट्री में करीब 3 साल का अनुभव रखती हैं। वायरल कंटेंट, लाइफस्टाइल, हेल्थ और वास्तु शास्त्र टिप्स पर प्रमुखता से काम किया है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज से मास्टर ऑफ मास कम्यूनिकेशन की पढ़ाई के बाद पहली बार पत्रकारिता के श्रेत्र में कदम रखा। इसके बाद अमर उजाला प्रिंट (प्रयागराज) में इंटर्नशिप की। फिलहाल खुशी, पंजाब केसरी दिल्ली के डिजिटल प्लैटफॉर्म के लिए कंटेंट राइटिंग का काम करती हैं।