मृत पक्षियों में अधिकतर को हिमालयन ग्रिफिन प्रजाति का माना जा रहा है, जो पहले से ही संकटग्रस्त श्रेणी में शामिल है।
दुधवा बफर जोन की डिप्टी डायरेक्टर कीर्ति चौधरी ने बताया कि उसी खेत में पांच अन्य गिद्ध बेहोशी की हालत में मिले थे। सूचना मिलते ही उन्हें तुरंत उपचार उपलब्ध कराया गया। इलाज के बाद जब उनकी हालत सामान्य हुई तो उन्हें दोबारा प्राकृतिक वातावरण में छोड़ दिया गया।
मृत कुत्तों के अवशेष खाने की आशंका
जांच के दौरान उसी खेत में कुछ दूरी पर मरे हुए कुत्ते भी पाए गए। अधिकारियों का अनुमान है कि गिद्धों ने इन कुत्तों के अवशेष खाए होंगे, जिनमें संभवतः कोई जहरीला पदार्थ मौजूद था। इसी कारण बड़ी संख्या में गिद्धों की मौत हो गई।
पशु चिकित्सकों की टीम ने कुल 23 गिद्धों का पोस्टमॉर्टम किया। दुधवा टाइगर रिजर्व के रीजनल डायरेक्टर और मुख्य वन संरक्षक डॉ. एच. राजमोहन के निर्देश पर दो मृत गिद्धों के साथ 23 गिद्धों के विसरा (आंतरिक अंगों के नमूने) को आगे की जांच के लिए बरेली स्थित इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टिट्यूट (IVRI) भेजा गया है।
पोस्टमॉर्टम में क्या सामने आया
पोस्टमॉर्टम टीम के सदस्य डॉ. दया शंकर के मुताबिक शुरुआती जांच में यह संकेत मिला है कि मरे हुए कुत्तों के शरीर में कोई जहरीला पदार्थ मौजूद था। इन्हीं अवशेषों को खाने के कारण 25 गिद्धों की मौत हुई और पांच अन्य बीमार पड़ गए। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि वह जहर किस प्रकार का था।
संकटग्रस्त प्रजाति है गिद्ध
विशेषज्ञों के अनुसार गिद्ध वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित प्रजाति हैं और इन्हें ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ श्रेणी में रखा गया है। इसलिए इस घटना को वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से बेहद गंभीर माना जा रहा है। इसका मतलब यह है कि गिद्ध पहले ही ऐसा पक्षी है जिसकी तादात लगातार घट रही है, ऐसे में यह एक बड़ी घटना में गिनी जा रही है.
वन विभाग के अधिकारी अब वैज्ञानिक विश्लेषण की रिपोर्ट का इंतजार कर रहे हैं, ताकि गिद्धों की मौत के वास्तविक कारण और इस्तेमाल किए गए जहरीले पदार्थ की पहचान की जा सके।
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