नई दिल्ली, 6 नवंबर (आईएएनएस)। पाकिस्तान का विदेशी कर्ज पिछले एक दशक में लगभग दोगुना होकर 2025 में 135.1 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। इस दौरान चीन पाकिस्तान का सबसे बड़ा द्विपक्षीय कर्जदाता बना हुआ है। एक रिपोर्ट में यह जानकारी दी गई है।
‘डॉन’ की ओर से किए गए विश्लेषण के अनुसार, पाकिस्तान का कुल विदेशी कर्ज 2015 में 68.7 अरब डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 135.1 अरब डॉलर हो गया। इस तरह दस वर्षों में इसमें करीब 97 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।
रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान के कुल विदेशी कर्ज में 107.1 अरब डॉलर सार्वजनिक और सरकार की गारंटी वाले कर्ज के रूप में शामिल हैं। वहीं, 17.6 अरब डॉलर निजी क्षेत्र के गैर-गारंटी वाले कर्ज और 10.5 अरब डॉलर अल्पकालिक देनदारियां हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की देनदारियों में बहुपक्षीय वित्तीय संस्थानों का हिस्सा 56.8 अरब डॉलर, जबकि द्विपक्षीय कर्जदाताओं का हिस्सा 42.4 अरब डॉलर है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि चीन 22.4 अरब डॉलर के बकाया कर्ज के साथ पाकिस्तान का सबसे बड़ा व्यक्तिगत कर्जदाता बनकर उभरा है। इसके बाद विश्व बैंक का 19.2 अरब डॉलर और एशियाई विकास बैंक (एडीबी) का 16.8 अरब डॉलर का कर्ज है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान को 2025 के दौरान प्रमुख वित्तीय संस्थानों और सहयोगी देशों से सहायता भी मिली। इसमें चीन की ओर से 2 अरब डॉलर के कर्ज की परिपक्वता अवधि बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के जारी सहायता कार्यक्रमों के तहत 2.3 अरब डॉलर की राशि जारी करना शामिल है।
मध्य पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान क्षेत्र में सकल राष्ट्रीय आय के अनुपात में विदेशी कर्ज में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई। यह स्थिति कर्ज चुकाने से जुड़े कुछ संकेतकों में सुधार के बावजूद लगातार बढ़ती देनदारियों को दर्शाती है।
वैश्विक स्तर पर भी निम्न और मध्यम आय वाले देशों का विदेशी कर्ज 2025 में 5.5 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड 9.4 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंच गया। सबसे गरीब देशों में कर्ज का स्तर इससे भी तेज गति से बढ़ा, जबकि कर्ज लेने की लागत ऊंची बनी रही।
रियायती वित्तपोषण के पात्र देशों को नई ऋण प्रतिबद्धताओं पर औसतन 8.2 प्रतिशत ब्याज दर चुकानी पड़ी, जो कई दशकों में सबसे ऊंचे स्तरों में से एक है। ‘डॉन’ की रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में कर्ज चुकाने का कुल भुगतान लगातार पांचवें वर्ष बढ़कर 1.4 लाख करोड़ डॉलर हो गया। यह मजबूत आर्थिक विकास और पूंजी के बेहतर प्रवाह के बावजूद इन देशों पर बने वित्तीय दबाव को रेखांकित करता है।
–आईएएनएस
डीएससी
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