भारी निवेश के बावजूद पटरी से उतरी पाकिस्तान की उच्च शिक्षा व्यवस्था : रिपोर्ट

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नई दिल्ली, 1 नवंबर (आईएएनएस)। करीब दो दशक पहले पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की महत्वाकांक्षी योजना अपने लक्ष्य से भटकती हुई नजर आ रही है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने देश के उच्च शिक्षा क्षेत्र में बड़े सुधारों की शुरुआत की थी। इसका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के कामकाज में व्यापक बदलाव लाना और उन्हें ‘उत्कृष्टता के केंद्र’ के रूप में विकसित करना था। रिपोर्टों के अनुसार, ये सुधार अब सफलता के बजाय असफलता की तस्वीर पेश कर रहे हैं। पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारी निवेश और बड़े पैमाने पर किए गए सुधारों के…

नई दिल्ली, 1 नवंबर (आईएएनएस)। करीब दो दशक पहले पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ की महत्वाकांक्षी योजना अपने लक्ष्य से भटकती हुई नजर आ रही है। जनरल परवेज मुशर्रफ ने देश के उच्च शिक्षा क्षेत्र में बड़े सुधारों की शुरुआत की थी। इसका मकसद कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के कामकाज में व्यापक बदलाव लाना और उन्हें ‘उत्कृष्टता के केंद्र’ के रूप में विकसित करना था। रिपोर्टों के अनुसार, ये सुधार अब सफलता के बजाय असफलता की तस्वीर पेश कर रहे हैं।

पाकिस्तानी अखबार ‘डॉन’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारी निवेश और बड़े पैमाने पर किए गए सुधारों के बावजूद पाकिस्तान का उच्च शिक्षा मॉडल उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान में इस समय लगभग 280 विश्वविद्यालय हैं, लाखों छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और शोध कार्यों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। इसके बावजूद विश्वविद्यालय लगातार बढ़ते कर्ज, कमजोर शैक्षणिक परिणामों और शोध की गुणवत्ता को लेकर उठ रहे सवालों से जूझ रहे हैं। इससे इन संस्थानों का संचालन मुश्किल होता जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, नए विश्वविद्यालय स्थापित करने पर अरबों रुपये खर्च किए गए। अमेरिका के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता भी किया गया, जिसके तहत उस समय दुनिया के सबसे बड़े ‘फुलब्राइट छात्रवृत्ति कार्यक्रम’ को शुरू किया गया था, लेकिन इतने बड़े प्रयासों के बावजूद अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो सके।

विश्वविद्यालयों की तेजी से बढ़ती संख्या पर चर्चा करते हुए रिपोर्ट कहती है कि यह विस्तार अब अपने ही बोझ तले दबता जा रहा है।यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर तब और चर्चा में आया, जब खैबर पख्तूनख्वा के लगभग सभी सरकारी विश्वविद्यालय गंभीर वित्तीय संकट का सामना करने लगे। इन संस्थानों ने पूरे क्षेत्र को राहत देने के लिए लगभग 25 अरब पाकिस्तानी रुपए के विशेष पैकेज की मांग भी की।

रिपोर्ट में कहा गया है, “2002 में पाकिस्तान को ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था में बदलने के लिए शुरू किए गए साहसिक सुधार अब जटिल या खतरनाक रूप ले चुके हैं, जो अपने 25वें वर्ष में लड़खड़ाते हुए प्रवेश कर रहा है। यह व्यवस्था इतनी बड़ी हो चुकी है कि इसे विफल होने नहीं दिया जा सकता और इसमें सुधार करना भी बेहद मुश्किल हो गया है।”

यह रिपोर्ट दरअसल एक इन्वेस्टिगेटिव सीरीज का हिस्सा है, जिसमें पाकिस्तान के शिक्षा क्षेत्र को प्रभावित करने वाली अनेक समस्याओं और चुनौतियों का विस्तार से अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुत से लोगों के लिए यह जानना हैरानी की बात हो सकती है कि उच्च शिक्षा व्यवस्था की मूल योजना तैयार करने वाले विशेषज्ञों ने शुरुआत में ही ऐसे संकट की आशंका जताई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, “उन्होंने 2002 की मूल ‘टास्क फोर्स’ रिपोर्ट में इन संभावित समस्याओं का स्पष्ट उल्लेख किया था। यही रिपोर्ट बाद में उच्च शिक्षा आयोग (एचईसी) ऑर्डिनेंस और पाकिस्तान के उच्च शिक्षा आयोग की स्थापना का आधार बनी।”

–आईएएनएस

एवाई/वीसी

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IANS Agency

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