Chhattisgarh Rural Economy Growth: छत्तीसगढ़ में औषधीय पौधों (जड़ी-बूटी) की खेती और नवाचार आधारित कृषि मॉडलों के जरिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई गति मिल रही है। विभिन्न जिलों में बड़े पैमाने पर औषधीय पौधों का रोपण कर किसानों और विशेष रूप से महिला स्व-सहायता समूहों को रोजगार के नए अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ ट्राइबल, लोकल हेल्थ ट्रेडिशंस एवं मेडिसिनल प्लांट्स बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी जे. ए. सी. एस. राव के मार्गदर्शन में यह पहल तेजी से आगे बढ़ रही है। उनके अनुसार, औषधीय खेती के माध्यम से ग्रामीणों, खासकर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। घरों की बाड़ी से लेकर वन क्षेत्रों और अनुपयोगी सरकारी भूमि तक औषधीय खेती का विस्तार किया जा रहा है। सिंदूरी, सतावर, अश्वगंधा, सर्पगंधा, मंडूकपर्णी, तुलसी, नीम और गिलोय जैसे पौधों का रोपण कर ग्रामीणों क आत्मनिर्भर बनाया जा रहा है। वहीं नदी-नालों के किनारे वेटीवर (खस) की खेती से पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ आय के नए स्रोत भी विकसित हो रहे हैं।
महिला सशक्तिकरण की दिशा में कन्वर्जेंस मॉडल की सफलता
महिला सशक्तिकरण की दिशा में “कन्वर्जेंस मॉडल” प्रभावी साबित हो रहा है। इसके तहत महिलाओं को लेमनग्रास जैसी लाभकारी फसलों की खेती से जोड़ा गया है, जिससे उन्हें नियमित आय मिल रही है। तेल उत्पादन के लिए आसवन इकाइयों की स्थापना और उत्पादों की सुनिश्चित खरीद व्यवस्था ने इस पहल को और मजबूत बनाया है। घर-आंगन में की जाने वाली इस खेती से महिलाएं सालाना 30 से 40 हजार रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं। राज्य के बिलासपुर, कांकेर, धमतरी, कोरबा और गरियाबंद जिलों में हजारों महिलाएं औषधीय खेती से जुड़कर आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।


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