मोदी मिल फ्लाईओवर के नीचे मिला 300 साल पुरानी ‘सराय जुलियाना’ का सुराग

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Sarai Juliana : मथुरा रोड स्थित मोदी मिल फ्लाईओवर के नीचे वर्षों से अनदेखे पड़े खंडहर दिल्ली के करीब 300 साल पुराने इतिहास की निशानी हो सकते हैं। यहां पीडब्ल्यूडी के हरित क्षेत्र में पुरानी दीवारों, मेहराब, लखौरी ईंटों और पानी से भरे एक पुराने कुएं के अवशेष मिले हैं। एमसीडी के हेरिटेज सेल ने संभावना जताई है कि ये अवशेष 18वीं सदी की ‘सराय जुलियाना’ के हैं। माना जा रहा है कि इसे मुगल दरबार में खास प्रभाव रखने वाली पुर्तगाली महिला डोना जुलियाना डायस दा कोस्टा ने यात्रियों के ठहरने के लिए बनवाया था। एमसीडी अब इस ढांचे…

Sarai Juliana : मथुरा रोड स्थित मोदी मिल फ्लाईओवर के नीचे वर्षों से अनदेखे पड़े खंडहर दिल्ली के करीब 300 साल पुराने इतिहास की निशानी हो सकते हैं। यहां पीडब्ल्यूडी के हरित क्षेत्र में पुरानी दीवारों, मेहराब, लखौरी ईंटों और पानी से भरे एक पुराने कुएं के अवशेष मिले हैं। एमसीडी के हेरिटेज सेल ने संभावना जताई है कि ये अवशेष 18वीं सदी की ‘सराय जुलियाना’ के हैं। माना जा रहा है कि इसे मुगल दरबार में खास प्रभाव रखने वाली पुर्तगाली महिला डोना जुलियाना डायस दा कोस्टा ने यात्रियों के ठहरने के लिए बनवाया था।

एमसीडी अब इस ढांचे को विरासत स्थल के रूप में अधिसूचित करने की योजना बना रहा है।
हेरिटेज सेल के सदस्य सचिव डॉ. अकील अहमद के मुताबिक ऐतिहासिक दस्तावेजों और मौके पर मौजूद अवशेषों को मिलाने पर इसके सराय जुलियाना होने के संकेत मिलते हैं। उन्होंने कहा कि, पूर्व राष्ट्रीय संग्रहालय निदेशक रघुराज सिंह चौहान और अभिलेखविद् मधुकर तिवारी की पुस्तक जुलियाना नामा के अनुसार पुर्तगाली महिला डोना जुलियाना ने वर्ष 1720 में मुहम्मद शाह ‘रंगीला’ के शासनकाल के दौरान ओखला में यह सराय बनवाई थी। यहां मुख्य रूप से यूरोपीय यात्रियों के ठहरने की व्यवस्था थी। खासबात है कि इस सराय का मथुरा रोड के किनारे होना इसकी पहचान को मजबूत करने वाली अहम कड़ी माना जा रहा है।

उन्होंने कहा कि इतिहास के अनुसार, आज की मथुरा रोड कभी शेरशाह सूरी के समय विकसित सड़क-ए-आजम का हिस्सा थी। यह प्रमुख मार्ग पेशावर और लाहौर से दिल्ली व आगरा होते हुए बंगाल की तरफ जाता था और बाद में ग्रैंड ट्रंक रोड का आधार बना। उस समय व्यापारी, सैनिक, अधिकारी, तीर्थयात्री और विदेशी मुसाफिर इसी रास्ते से लंबी यात्राएं करते थे। उनके ठहरने के लिए मुख्य मार्ग पर सराय, कुएं और अन्य सुविधाएं विकसित की जाती थीं।

डॉ. अकील अहमद के अनुसार सराय जुलियाना में कम से कम 15 कमरे थे। यहां पर यात्रियों के पशुओं को रखने के लिए अलग जगह के साथ शाकाहारी और मांसाहारी भोजन तैयार करने की अलग-अलग व्यवस्था थी। मौजूदा खंडहर के पास मिला गोलाकार कुआं इसकी पहचान का महत्वपूर्ण प्रमाण माना जा रहा है। कुएं का ऊपरी हिस्सा बाद में सीमेंट से ठीक कर जाली से ढक दिया गया, लेकिन अंदर पुरानी चिनाई मौजूद है और आज भी पानी दिखाई देता है।

यहां मिली छोटी और पतली लखौरी ईंटें मुगलकालीन निर्माण में इस्तेमाल होती थीं। बची हुई मेहराब और दीवारों से भी संकेत मिलता है कि मूल सराय काफी बड़े क्षेत्र में बनी थी। दिल्ली में उस दौर में यात्रियों के लिए ऐसी कई सराय थीं। हुमायूं के मकबरे के पास अरब की सराय, सराय काले खां और मौजूदा दिल्ली चिड़ियाघर परिसर की अजीमगंज सराय भी इसी व्यवस्था का हिस्सा थीं।

Sumant Chaudhary