AIIMS News : कैंसर के खिलाफ जंग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को नई ताकत के रूप में देखा जा रहा है। इसी दिशा में दिल्ली एम्स के बायोकैमिस्ट्री विभाग और सी-डैक पुणे ने मिलकर आई ओंकोलॉजी डॉट एआई नामक एआई आधारित डिजिटल प्लेटफॉर्म विकसित किया है। यह प्लेटफॉर्म खासतौर पर ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर समेत कैंसर की जल्द पहचान, रोकथाम और इलाज में चिकित्सकों की मदद करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।
अब एम्स के इस मॉडल को ब्रिक्स हेल्थ जर्नल में प्रकाशित एक पेपर में शामिल किया गया है। दुनिया में कैंसर का बढ़ता बोझ स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। ब्रिक्स देशों में दुनिया की 40 प्रतिशत से अधिक आबादी रहती है और यहां हर साल करीब 90 लाख नए कैंसर के मामले सामने आते हैं, जबकि लगभग 46.6 लाख लोगों की मौत कैंसर से होती है। ऐसे में शुरुआती चरण में बीमारी की पहचान और समय पर इलाज उपलब्ध कराना बेहद महत्वपूर्ण है।
एम्स के बायोकैमिस्ट्री विभाग में लंबे समय से कैंसर के क्षेत्र में आधुनिक तकनीक और एआई के इस्तेमाल पर काम किया जा रहा है। विभाग के प्रोफेसर डॉ. अशोक शर्मा के मुताबिक, आई ओंकोलॉजी डॉट एआई कैंसर का जल्दी पता लगाने और उपचार में सहायता देने वाला एआई आधारित प्लेटफॉर्म है। इसे एम्स दिल्ली और सी-डैक पुणे ने संयुक्त रूप से विकसित किया है। प्लेटफॉर्म का मरीजों पर ट्रायल भी किया जा चुका है और फिलहाल यह पायलट-क्लिनिकल चरण में है।
महिलाओं के दो प्रमुख कैंसर पर फोकस
ब्रिक्स देशों में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर प्रमुख कैंसरों में शामिल है और कई देशों में यह महिलाओं में सबसे आम कैंसर है। वहीं ओवेरियन कैंसर के मामले अपेक्षाकृत कम हैं, लेकिन इसकी पहचान अक्सर देर से होती है। कई मरीज लक्षण बढ़ने और बीमारी के एडवांस स्टेज में पहुंचने के बाद डॉक्टर के पास आते हैं। ऐसे में एआई आधारित तकनीक शुरुआती जोखिम की पहचान और विशेषज्ञों को निर्णय लेने में सहायता देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता के संदर्भ में डिजिटल ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में सहयोग का महत्व और बढ़ गया है।
विभिन्न देशों के अनुभव, तकनीक और स्वास्थ्य मॉडल साझा करने से कैंसर की रोकथाम और उपचार को बेहतर बनाया जा सकता है। आई ओंकोलॉजी डॉट एआई इसी दिशा में एआई, डिजिटल हेल्थ और विशेषज्ञ चिकित्सा को जोड़ने की भारतीय पहल के रूप में सामने आया है। भविष्य में ऐसी तकनीकें ग्लोबल साउथ और अन्य विकासशील देशों में मरीजों की समय पर जांच, सही उपचार और विशेषज्ञ चिकित्सा तक पहुंच बढ़ाने में मददगार हो सकती हैं।


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