आईब्रिक्स में नवीन जिंदल को मिला ‘गुड फेलो अवार्ड’

Summary :

Naveen Jindal Receives Good Fellow Award/ सतेन्द्र त्रिपाठी : देश के आम नागरिक को सम्मान के साथ तिरंगा फहराने का अधिकार दिलाने के लिए करीब एक दशक तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले भाजपा सांसद, उद्योगपति एवं समाजसेवी नवीन जिंदल को रविवार को दिल्ली में आयोजित आईब्रिक्स सम्मेलन में ‘गुड फेलो अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। नवीन जिंदल को यह सम्मान नेतृत्व, नवाचार, समाजसेवा और सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान के साथ राष्ट्रीय ध्वज को लेकर किए गए उनके ऐतिहासिक प्रयासों के लिए दिया गया। सॉवरेन वेल्थ फंड इंस्टीट्यूट (एसडब्ल्यूएफआई) के चेयरमैन लक्ष्मी नारायणन ने जिंदल को ‘ग्लोबल ऑर्डर ऑफ आउटस्टैंडिंग…

Naveen Jindal Receives Good Fellow Award/ सतेन्द्र त्रिपाठी : देश के आम नागरिक को सम्मान के साथ तिरंगा फहराने का अधिकार दिलाने के लिए करीब एक दशक तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाले भाजपा सांसद, उद्योगपति एवं समाजसेवी नवीन जिंदल को रविवार को दिल्ली में आयोजित आईब्रिक्स सम्मेलन में ‘गुड फेलो अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। नवीन जिंदल को यह सम्मान नेतृत्व, नवाचार, समाजसेवा और सामाजिक क्षेत्र में उनके योगदान के साथ राष्ट्रीय ध्वज को लेकर किए गए उनके ऐतिहासिक प्रयासों के लिए दिया गया।

सॉवरेन वेल्थ फंड इंस्टीट्यूट (एसडब्ल्यूएफआई) के चेयरमैन लक्ष्मी नारायणन ने जिंदल को ‘ग्लोबल ऑर्डर ऑफ आउटस्टैंडिंग डिसरप्टर्स’ फेलो प्रोग्राम के तहत यह सम्मान प्रदान किया। इस दौरान उनके नेतृत्व, संपत्ति निर्माण और समाज के लिए किए गए कार्यों का भी उल्लेख किया गया। नवीन जिंदल की पहचान उद्योग और राजनीति के अलावा उस लंबी कानूनी लड़ाई से भी जुड़ी है, जिसने राष्ट्रीय ध्वज फहराने को लेकर देश में बड़ा बदलाव किया। उनकी इस लड़ाई के बाद 23 जनवरी 2004 को सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया और सम्मान एवं निर्धारित नियमों के पालन के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराने के नागरिकों के अधिकार को मान्यता मिली।

एक अधिकारी के रोकने से शुरू हुई थी तिरंगे की लड़ाई

इस लड़ाई की शुरुआत 1993 में हुई थी। नवीन जिंदल अपने कारखाना परिसर में प्रतिदिन तिरंगा फहराना चाहते थे, लेकिन एक अधिकारी ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया। उस समय राष्ट्रीय ध्वज फहराने से जुड़े नियम काफी सख्त थे और आम नागरिक के लिए हर दिन तिरंगा फहराना सहज नहीं था। नवीन जिंदल ने कहा कि वह जब अमेरिका में थे तो वहां पर वह अपने हॉस्टल में तिरंगा लगाए थे और अपने ही देश में वह तिरंगा नहीं फहरा पा रहे।

यही बात उन्हें नागवार गुजरी और जिंदल ने इस व्यवस्था को चुनौती देने का फैसला किया। उनका तर्क था कि राष्ट्रीय ध्वज केवल सरकारी प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहना चाहिए और प्रत्येक भारतीय नागरिक को उसका सम्मान करते हुए तिरंगा फहराने का अधिकार होना चाहिए। वर्ष 1995 में उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मामला आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कानूनी लड़ाई करीब एक दशक तक चली। आखिरकार 23 जनवरी 2004 को

सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सम्मान के साथ राष्ट्रीय ध्वज फहराना नागरिक के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है, हालांकि यह अधिकार राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े कानूनों और नियमों के अधीन रहेगा। करीब दो दशक बाद आईब्रिक्स के मंच पर जिंदल को मिला सम्मान उनकी उसी लंबी लड़ाई और सार्वजनिक जीवन में योगदान की एक और पहचान के रूप में सामने आया।

 

 

Sumant Chaudhary