Delhi News : जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर विकसित देशों से आर्थिक सहायता और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने की मांग प्रमुखता से उठाएगा। तुर्किये के अंताल्या में 9 से 20 नवंबर तक आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप-31 में भारत का जोर इस बात पर रहेगा कि विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन समय पर उपलब्ध कराए जाएं और इसके लिए उन पर कर्ज का अतिरिक्त बोझ न डाला जाए। भारत का स्पष्ट मत है कि जलवायु संकट से निपटने की दिशा में विकसित देशों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
ग्लोबल साउथ की चिंताओं और हितों को उठाएगा भारत
केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को दिल्ली में कॉप-31 के लिए भारत की प्राथमिकताओं की जानकारी देते हुए कहा कि भारत सम्मेलन में विकासशील देशों, विशेषकर ग्लोबल साउथ की चिंताओं और हितों को मजबूती से उठाएगा। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए केवल घोषणाएं करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए आर्थिक सहायता और आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक देश की परिस्थितियां, क्षमताएं और विकास संबंधी जरूरतें अलग-अलग हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन के नाम पर सभी देशों के लिए एक जैसे लक्ष्य निर्धारित करना उचित नहीं है। भारत नए टॉप-डाउन लक्ष्यों और दबाव बनाने वाली व्यवस्थाओं का समर्थन नहीं करेगा। उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य देशों की अपनी परिस्थितियों और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित प्रतिबद्धताओं (एनडीसी) के अनुरूप ही तय होने चाहिए।
2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर भूमि बहाल करने का लक्ष्य
भूपेंद्र यादव ने जैव विविधता संरक्षण और भूमि क्षरण से निपटने से जुड़े अंतरराष्ट्रीय प्रयासों में भारत की भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि मंगोलिया में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम सम्मेलन (यूएनसीसीडी कॉप-17) में भारत ने वर्ष 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर से अधिक खराब हो चुकी भूमि को बहाल करने की प्रतिबद्धता दोहराई है।
उन्होंने कहा कि भूमि बहाली केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध खाद्य एवं जल सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और लोगों की आजीविका से भी है। मंत्री ने बताया कि भारत ने सूखे से निपटने के लिए केवल आपातकालीन राहत और प्रतिक्रिया पर निर्भर रहने के बजाय सूखा सहनशीलता विकसित करने की रणनीति अपनाने पर जोर दिया है।
इसके तहत वैज्ञानिक दृष्टिकोण और स्थानीय समुदायों की भागीदारी से चरागाहों की बहाली तथा पशुपालकों को संरक्षण गतिविधियों से जोड़ने की वकालत की गई। भारत ने घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को लेकर अपनी पहली मार्गदर्शिका भी जारी की है।
इस अवसर पर पर्यावरण मंत्रालय के सचिव नरेंद्र भूषण, अतिरिक्त सचिव डॉ. अमनदीप गर्ग और अशुतोष अग्निहोत्री, संयुक्त सचिव रजत अग्रवाल एवं उदय चौधरी तथा वन महानिरीक्षक डॉ. क्लेमेंट बेन सहित मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।


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