48 साल बाद भी जिंदा है दरिंदे रंगा-बिल्ला का खौफ…

Summary :

Delhi Crime News : 70 के दशक में राजधानी दिल्ली में हुए एक अपराध ने न केवल पूरे देश को हिला कर रख दिया था, बल्कि हमेशा हमेशा के लिए दिल्ली में रहने वालों की सोच को बदल कर रख दिया। 48 साल बीत गए, लेकिन दिल्ली की उस मनहूस शाम की सिहरन आज भी कम नहीं हुई है। 26 अगस्त, 1978 को जब नौसेना अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 16 साल की बेटी गीता और 14 साल का बेटा संजय घर से निकले, तो वे कभी वापस नहीं लौटे। दो मासूम बच्चों के इस नृशंस हत्याकांड ने पूरे…

Delhi Crime News : 70 के दशक में राजधानी दिल्ली में हुए एक अपराध ने न केवल पूरे देश को हिला कर रख दिया था, बल्कि हमेशा हमेशा के लिए दिल्ली में रहने वालों की सोच को बदल कर रख दिया। 48 साल बीत गए, लेकिन दिल्ली की उस मनहूस शाम की सिहरन आज भी कम नहीं हुई है। 26 अगस्त, 1978 को जब नौसेना अधिकारी कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 16 साल की बेटी गीता और 14 साल का बेटा संजय घर से निकले, तो वे कभी वापस नहीं लौटे। दो मासूम बच्चों के इस नृशंस हत्याकांड ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था। इमरजेंसी के बाद की अस्थिरता के माहौल में यह घटना न सिर्फ दो जिंदगियों का खात्मा थी, बल्कि मध्यमवर्गीय परिवारों की सुरक्षा की भावना पर गहरा घाव थी।

इस घटना ने राजधानी दिल्ली की मासूमियत को हमेशा-हमेशा के लिए छीन लिया और एक दूसरे को शक की नजर से देखने के नए दौर का आरंभ हो गया। हम बात कर रहे हंै साल 1978 में दिल्ली में हुई गीता और संजय चोपड़ा के अपहरण, रेप और हत्या मामले की। रंगा-बिल्ला नाम के दो अपराधियों द्वारा किए गए इस अपराध ने दिल्ली में बच्चों और लड़कियों की सुरक्षा को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया था। पेश है पंजाब केसरी के मेट्रो एडिटर सतेन्द्र त्रिपाठी, प्रमुख संवाददाता राहुल शर्मा, वसीम सैफी और वरिष्ठ संवाददाता रीतेश मिश्रा की विशेष रिपोर्ट…

बता दें कि रंगा (कुलजीत सिंह) और बिल्ला (जसबीर सिंह) मूल रूप से मुंबई (तब बॉम्बे) के शातिर अपराधी थे, जिन पर मुंबई पुलिस के रिकॉर्ड में चोरी, फिरौती के लिए अपहरण की कोशिश और अन्य गंभीर अपराधों के कई मामले दर्ज थे। बताया जाता है कि दोनों मुंबई की आॅर्थर रोड जेल से भागे थे, कई मामलों में वांछित थे। 31 जनवरी, 1982 को गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा हत्याकांड मामले में दोनों को तिहाड़ जेल में एक साथ फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था।

8 सितंबर, 1978 की रात को, लांस नायक गुरतेज सिंह और एवी शेट्टी, कालका मेल के एक डिब्बे में दूसरे फौजी जवानों के साथ यात्रा कर रहे थे। ट्रेन जब आगरा सिटी रेलवे स्टेशन पहुंचने से पहले यमुना पुल के पास पहुंची और उसकी रफ्तार थोड़ी कम हुई तो दो आम नागरिक डिब्बे में घुस आए। दोनों ने कहा कि वे भी सेना से ही हंै। ट्रेन में मौजूद जवानों ने जब उनसे परिचय पत्र दिखाने को कहा तो वे नहीं दिखा पाए। जवानों ने चोर या लुटेरा होने के शक में उन दोनों को पकड़ लिया। तभी उन्हें अखबार में छपी बिल्ला की तस्वीर दिखी, जिसके बाद जवानों ने दोनों को दिल्ली पहुंचकर पुलिस के हवाले कर दिया।

दरअसल दिल्ली में रहने वाले इंडियन नेवी के कैप्टन मदन मोहन चोपड़ा की 16 साल की बेटी गीता को 26 अगस्त को ऑल इंडिया रेडियो के युवा वाणी कार्यक्रम में हिस्सा लेना था। रात आठ बजे होने वाले कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गीता चोपड़ा अपने छोटे भाई 14 साल के संजय चोपड़ा के साथ धौला कुआं में सर्विसेज ऑफिसर्स एन्क्लेव स्थित अपने घर से शाम 6.15 बजे निकली थी और अपने पिता कैप्टन चोपड़ा को ब्रॉडकास्ट खत्म होने के बाद रात 9 बजे रेडियो स्टेशन के गेट से उन्हें पिक करने को कहा था। गीता चोपड़ा ‘जीसस एंड मैरी कॉलेज’ में सेकंड ईयर की स्टूडेंट थीं, जबकि संजय चोपड़ा ‘मॉडर्न स्कूल’ में 10वीं क्लास के स्टूडेंट थे। लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था। ठीक इसी दिन दिल्ली में दो शातिर अपराधी जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला और कुलजीत सिंह उर्फ रंगा ने लूटने के इरादे से, लिफ्ट देने के बहाने भाई-बहन को अगवा कर लिया।

इस दौरान जब उन्हें पता चला कि वे एक नेवी ऑफिसर के बच्चे हैं तो उन्होंने दोनों की नृशंस हत्या कर दी। हांलाकि अपनी जान बचाने के लिए गीता और संजय ने अपनी आखिरी सांस तक संघर्ष किया, लेकिन वे अपनी जान नहीं बचा सके।

रंगा-बिल्ला की दिल्ली की सड़कों पर दौड़ रही कार को रोकने की दो अनजान लोगों ने कोशिश की, जो कि नाकाम रहे। 26, अगस्त 1978 को शाम 6.30 बजे, भगवान दास नामक व्यक्ति बंगला साहिब गुरुद्वारे से अपने स्कूटर पर गोल डाक खाना के पास से गुजर रहे थे, तभी उन्होंने योग आश्रम के पास एक फिएट कार खड़ी देखी। जब उन्होंने गाड़ी के अंदर से मदद के लिए चीखें सुनीं तो वे तेजी से उसकी ओर बढ़े। उन्होंने देखा कि एक लड़की ड्राइवर के बाल खींच रही थी, जबकि एक लड़का बगल में बैठे पैसेंजर से लड़ रहा था। दास के कार तक पहुंचने से पहले ही कार वहां से निकलकर उनकी आंखों से ओझल हो गई।

ऐसे ही दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी में उस समय युवा जूनियर इंजीनियर रहे इंदरजीत सिंह नोआटा घर लौट रहे थे, उन्होंने देखा कि कार की पिछली सीट पर बैठे एक लड़के और लड़की की ड्राइवर और उसके बगल में बैठे व्यक्ति के साथ हाथापाई हो रही थी। लड़के ने पीछे के शीशे से उनकी ओर देखा और मदद के लिए हाथ हिलाते हुए अपना खून से लथपथ दाहिना कंधा दिखाया। सिंह ने कार का पीछा करने की कोशिश की, लेकिन आखिरकार कार उनकी स्कूटर की रफ्तार से तेज निकली और दिल्ली की सड़कों पर गुम हो गई।

घटना के दो दिन बाद 28 अगस्त, 1978 की आधी रात को मवेशी चराने वाले धनी राम ने ‘अपर रिज’ के घने जंगल में दो लाशें देखीं और गश्त कर रहे हेड कॉन्स्टेबल को इसकी सूचना दी। जिसके बाद मौके पर पहुंचे कैप्टन चोपड़ा और उनकी पत्नी ने गीता व संजय के बुरी तरह सड़-गल चुके शवों की पहचान की। बाद में हुए पोस्टमॉर्टम में गीता चोपड़ा की मौत की वजह गर्दन के ऊपरी हिस्से पर चार इंच का गहरा घाव बताया गया, जिससे उनका निचला जबड़ा पूरी तरह टूट गया था और खून की सभी मुख्य नसें कट गई थीं। उनकी कलाइयों और उंगलियों पर भी बचाव की कोशिश में लगे गहरे घाव थे। संजय के शरीर पर भी धारदार चीज से लगे 21 अलग-अलग घाव थे। हांलाकि, बाद में फॉरेंसिक जांच से पता चला कि चोपड़ा भाई-बहन ने हमलावरों का मुकाबला किया था। हाथापाई के दौरान, संजय ने शायद किसी भारी चीज से बिल्ला के माथे पर वार भी किया था।

हत्या की वारदात को अंजाम देने के वक्त संजय द्वारा बिल्ला के सिर पर भारी चीज से किया वार ही दोनों के पाप का गवाह बन गया। सिर में लगी चोट के बाद 26 अगस्त की रात लगभग 10:15 बजे बिल्ला इमरजेंसी इलाज के लिए विलिंगडन अस्पताल (वर्तमान में आरएमएल) पहुंचा। उसने अपना नाम ‘विनोद’ बताया और कहा कि उसके माथे पर पांच इंच का गहरा घाव है। रंगा भी उसके साथ था। उसने अपना नाम ‘हरभजन सिंह’ बताया। क्योंकि यह एक मेडिको-लीगल केस था, इसलिए अस्पताल में ड्यूटी पर मौजूद सिपाही रणबीर सिंह ने उससे चोट के बारे में पूछताछ की।

बिल्ला ने बताया कि दो-तीन लोगों ने काली मंदिर के पास बंगला साहिब गुरुद्वारा रोड पर उसकी घड़ी छीन ली और उसे घायल कर दिया। रणबीर ने रंगा से भी पूछताछ की, जिसने दावा किया कि वह बिल्ला को घटना वाली जगह से अपनी कार में लाया था। सिपाही ने मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन को सूचना दी और दोनों से कहा गया कि वे पुलिस को उस जगह पर ले जाएं। जांच करने पर पुलिस को हाथापाई या खून के कोई निशान नहीं मिले। दोनों लोगों से पुलिस स्टेशन में रिपोर्ट करने को कहा गया, लेकिन वे थाने नहीं पहुंचे, उनके दिए गए पते भी गलत निकले। मगर बाद में बिल्ला का अस्पताल जाना पुलिस के लिए बहुत अहम साबित हुआ। जांच के दौरान असिस्टेंट सीएमओ ने खोपड़ी का एक्स-रे करवाने का आदेश दिया और एक्स-रे की मंजूरी के लिए बिल्ला के बाएं हाथ के अंगूठे का निशान लिया। यही अंगूठे का निशान और एक्स-रे इस केस में एक अहम कड़ी साबित हुए। उस समय राजेन्द्र नगर के थानाध्यक्ष राम सिंह की टीम ने सराहनीय कार्य​ किया था।

जब फांसी पर लटकाने के दो घंटे बाद भी जिंदा था रंगा: सुनील गुप्ता

 

राजधानी में वर्ष 1978 में दिल दहला देने वाले जघन्य अपराध बहन-भाई गीता चोपड़ा और संजय चोपड़ा हत्याकांड पर बनी वेब सीरीज ने एक बार दिल्ली ही नहीं, देश की जनता के बीच उस अपराध को एक बार फिर से दोबारा चर्चा में लाकर खड़ा कर दिया है। 26 अगस्त, 1978 के दिन हुआ अपराध, 48 साल बाद भी उस अपहरण, यौन अत्याचार और हत्याकांड की नृशंस वारदात को याद कर लोगों के रोंगटे खड़े कर रहा है। तिहाड़ जेल से 35 वर्षों की सर्विस के बाद लीगल एडवाइजर के पद से सेवानिवृत्त हुए सुनील गुप्ता ने रंगा-बिल्ला यानी कुलजीत सिंह और जसबीर सिंह को फांसी दिए जाने वाले पल को खुद अपनी आंखों से देखा था। पंजाब केसरी से विशेष बातचीत में सुनील गुप्ता ने 31 जनवरी, 1982 के फांसी वाले दिन को लेकर अनेक किस्से बयां किए। पेश हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश…

कहा जाता है कि फांसी के बावजूद रंगा बच गया था ?

यह बिल्कुल सही बात है। दरअसल फांसी दिए जाने के दो घंटे बाद नियमानुसार फंदे पर लटके व्यक्ति की जांच की जाती है कि कहीं फांसी पर लटका शख्स जीवित तो नहीं। जांच के दौरान पाया गया कि रंगा की सांसें चल रही थीं। उसके बाद कुछ समझ नहीं आया कि क्या किया जाए। कानूनी आधार से स्पष्ट था कि उनके लिए सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट आदेश था, ‘हैंग टिल डेथ’। जब रंगा फंदे पर झूलता रहा तो उस समय जेल स्टाफ हंसराज ने वहां मौजूद अधिकारियों को कहा कि साहब मैं रंगा के पांव पकड़ कर लटक जाता हूं। फिर ऐसा ही किया गया क्योंकि नीचे खींचे जाने से रंगा की गर्दन फंदे में पूरी तरह से फंस गई और उसके प्राण निकल गए। रंगा क्योंकि दुबला-पतला था तो उसके सांस रोके जाने से फांसी दिए जाने पर वह बच निकला था। इस तरह दोबारा उसके पांव पकड़ कर जब जेलकर्मी लटका तो उसकी मौत हो पाई।

दोनों जेल में रहने के दौरान एक-दूसरे के साथ कैसा बर्ताव करते थे ?

रंगा-बिल्ला की कभी जेल में बंद दूसरे कैदियों से हाथापाई या झगड़ा नहीं हुआ, लेकिन दोनों में कई बार आपस में झगड़ा हुआ जिस पर उन्हें जेलर द्वारा वार्निंग देकर छोड़ गया। दरअसल रंगा के चेहरे पर शिकन नहीं रहती थी, वह जेल में भी खुशमिजाज था, लेकिन बिल्ला को इस बात का बेहद मलाल था कि उसकी वजह से दोनों को फांसी की सजा होने जा रही थी। बिल्ला कई बार कहता था कि रंगा यदि तूने गलत काम नहीं किया होता तो हमें फांसी न होती। बिल्ला को मलाल था कि उसे फांसी होने के बाद आखिर उसके परिवार का क्या होगा। गीता चोपड़ा के साथ यौन अत्याचार भी किया गया था जिसके बाद गीता की हत्या कर दी गई थी। उससे पहले रंगा-बिल्ला का विरोध करने पर संजय की भी हत्या कर दी गई थी। दोनों भाई-बहन की हत्या दिल्ली ही नहीं, देश में चर्चा का विषय बन गई थी। देशभर में इन दोनों अपराधियों को लेकर बेहद रोष व्याप्त था। भारतीय न्याय प्रणाली में इस केस को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ (Rarest of Rare Cases) के सिद्धांत की श्रेणी में रखा गया जिस कारण महज 3 साल 5 माह में ही दोनों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

रंगा-बिल्ला को जिस दिन फांसी दी गई, उस दिन आप भी वहां मौजूद रहे थे, उस पल को बयां कीजिए ?

मैं 8 मई, 1981 को तिहाड़ जेल में बतौर सहायक अधीक्षक भर्ती हुआ था। उस दौरान कुलजीत सिंह यानी रंगा और जसबीर सिंह यानी बिल्ला जेल में बंद थे। फांसी से ठीक पहले वाली रात मेरे मन में अजीब से बेचैनी रही कि आखिर क्या होगा और कैसे होगा क्योंकि वह मेरे कार्यकाल में तिहाड़ जेल में दी जाने वाली पहली फांसी थी। नियमानुसार सुबह करीब 7 बजे एडीएम, जेल अधीक्षक, जेल प्रशासन, डॉक्टर और अन्य विभागों से जुड़े अधिकारी और कर्मचारी मौजूद थे। उस समय दानिक्स अधिकारी एबी शुक्ला तिहाड़ जेल में जेल अधीक्षक थे जिनके हाथ में रूमाल था और उसे हिलाने का संकेत मिलते ही लीवर खींचकर रंगा-बिल्ला को फांसी दे दी गई।

दोनों जेल में रहने के दौरान एक-दूसरे के साथ कैसा बर्ताव करते थे ?

रंगा-बिल्ला की कभी जेल में बंद दूसरे कैदियों से हाथापाई या झगड़ा नहीं हुआ, लेकिन दोनों में कई बार आपस में झगड़ा हुआ जिस पर उन्हें जेलर द्वारा वार्निंग देकर छोड़ गया। दरअसल रंगा के चेहरे पर शिकन नहीं रहती थी, वह जेल में भी खुशमिजाज था, लेकिन बिल्ला को इस बात का बेहद मलाल था कि उसकी वजह से दोनों को फांसी की सजा होने जा रही थी। बिल्ला कई बार कहता था कि रंगा यदि तूने गलत काम नहीं किया होता तो हमें फांसी न होती। बिल्ला को मलाल था कि उसे फांसी होने के बाद आखिर उसके परिवार का क्या होगा। गीता चोपड़ा के साथ यौन अत्याचार भी किया गया था जिसके बाद गीता की हत्या कर दी गई थी। उससे पहले रंगा-बिल्ला का विरोध करने पर संजय की भी हत्या कर दी गई थी। दोनों भाई-बहन की हत्या दिल्ली ही नहीं, देश में चर्चा का विषय बन गई थी। देशभर में इन दोनों अपराधियों को लेकर बेहद रोष व्याप्त था। भारतीय न्याय प्रणाली में इस केस को ‘दुर्लभतम से दुर्लभ’ (Rarest of Rare Cases) के सिद्धांत की श्रेणी में रखा गया जिस कारण महज 3 साल 5 माह में ही दोनों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया।

जेल में किसी खेल या दूसरी गतिविधि में क्या दोनों शामिल हुए कभी ?

रंगा-बिल्ला दोनों बैडमिंटन खेला करते थे। दरअसल नियमानुसार फांसी की सजा पाने वाले कैदी के लिए फांसी दिए जाने से करीब 15 दिन पहले अदालत से ब्लैक वारंट जारी किया जाता है। उससे पहले फांसी की सजा पाने वाला कैदी भी जेल में सामान्य कैदियों की तरह ही रहता है। उनके साथ भी ऐसा ही किया गया। वे दोनों खेल गतिविधि में भी शामिल रहते थे। यूं भी जेल में एक सूत्र रहता है कि जेलर ‘होस्ट और कैदी गेस्ट’ है। इसे ध्यान में रखकर ही नियमों का पालन होता है।

फांसी से पूर्व क्या-क्या तैयारी की गई थीं ?

फांसी दिए जाने से पूर्व की सभी गाइडलाइंस का पालन किया गया और विशेष रूप से फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए मेरठ से कल्लू और फरीदकोट से फकीरा को बुलाया गया था। उन दिनों रंगा-बिल्ला केस पूरे देश में चर्चा का विषय था तो तिहाड़ जेल के आसपास कई किलोमीटर तक सुरक्षा इंतजाम लगाकर पुलिस बल तैनात किया गया था। जनता में उन दोनों को लेकर काफी आक्रोश था और उस कारण भी जेल प्रशासन और पुलिस पर काफी दबाव भी था।

फांसी के बाद कोई यादगार पल जो आपको आज भी याद हो ?

हां, उन दिनों जेल अधीक्षक, दानिक्स अधिकारी एबी शुक्ला का रूमाल बड़ा मशहूर था। दरअसल फांसी दिए जाने वाले दिन तय कार्यक्रम के अनुसार उनके रूमाल का इशारा करते ही जल्लाद को लीवर दबाकर दोनों को फांसी पर लटकाना था। यह सब हुआ भी उसी के अनुसार, लेकिन एबी शुक्ला का रूमाल उन दिनों फांसी दिए जाने के बाद भी चर्चाओं में आ गया। लोग उनसे मिलने के लिए आते या उनके घर जाते तो बड़ी उत्सुकता के साथ रूमाल देखने की जिद करते या उसका किस्सा सुनते थे। रूमाल सफेद रंग का था। रंगा-बिल्ला को दी गई फांसी और रूमाल का जिक्र मैंने अपनी बुक में भी किया है।

Sumant Chaudhary