नई दिल्ली, (पंजाब केसरी) : सरकारों का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होता कि वे नागरिकों को कितनी स्वतंत्रता देती हैं, बल्कि इस आधार पर भी होता है कि वे लोकतांत्रिक संस्थाओं को कितना मज़बूत बनाती हैं। हर संप्रभु लोकतंत्र को अंततः एक समान चुनौती का सामना करना पड़ता है वैध विदेशी परोपकारी सहयोग का स्वागत करते हुए यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि विदेशी धन का उपयोग घरेलू राजनीति को प्रभावित करने, विकास कार्यों में बाधा डालने या राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर करने के लिए न हो।
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 इसी संतुलन को स्थापित करने की दिशा में भारत का नवीनतम प्रयास है। इस विधेयक को लेकर चल रही बहस को अक्सर “नियमन बनाम नागरिक समाज” के रूप में प्रस्तुत किया गया है। लेकिन यह दृष्टिकोण मूल प्रश्न को सरल बनाकर पेश करता है। असली सवाल यह नहीं है कि विदेशी वित्तपोषण की अनुमति होनी चाहिए या नहीं। भारत ने कभी भी वास्तविक परोपकारी विदेशी सहयोग का विरोध नहीं किया है। वास्तविक प्रश्न यह है कि देश में आने वाला प्रत्येक विदेशी अंशदान पूरी तरह पारदर्शी हो, कानून के प्रति जवाबदेह हो और भारतीय संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप हो। प्रस्तावित संशोधन इसी सिद्धांत को और सुदृढ़ करने का प्रयास करते हैं।
जवाबदेही पर आधारित एक कानून…
विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) कई दशकों से गैर-सरकारी संगठनों, ट्रस्टों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संगठनों द्वारा विदेशी अंशदान प्राप्त करने और उसके उपयोग को विनियमित करता आया है। आम धारणा के विपरीत, इस कानून का उद्देश्य विदेशी वित्तपोषण को रोकना नहीं है। इसका उद्देश्य एक ऐसा नियामक ढांचा उपलब्ध कराना है जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि विदेशी धन उसी उद्देश्य के लिए उपयोग हो, जिसके लिए वह प्राप्त किया गया है, और उसका भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं या सार्वजनिक व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।ऐसी निगरानी की आवश्यकता विदेशी अंशदान के बढ़ते पैमाने से भी स्पष्ट होती है।
वर्ष 2019 से 2022 के बीच 13,500 से अधिक संगठनों को ₹55,700 करोड़ से अधिक का विदेशी अंशदान प्राप्त हुआ। इनमें से अधिकांश संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत और सामुदायिक कल्याण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। उनके योगदान का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन विदेशी धन के इस विशाल प्रवाह के साथ उतनी ही मजबूत जवाबदेही व्यवस्था भी आवश्यक हो जाती है।विधेयक के समर्थकों का तर्क है कि पारदर्शिता वास्तविक सामाजिक संगठनों पर बोझ नहीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी सुरक्षा है। एक प्रभावी अनुपालन व्यवस्था उन संस्थाओं को अलग पहचान देती है जो ईमानदारी से कार्य कर रही हैं और उन संस्थाओं से भी, जो विदेशी धन का उपयोग भारतीय कानून के विपरीत उद्देश्यों के लिए करती हैं।
कानूनी खामियों को दूर करने की दिशा में…
प्रस्तावित विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक लंबे समय से मौजूद नियामकीय खामियों को समाप्त करने का प्रयास है।वर्तमान व्यवस्था में कई बार ऐसा होता था कि किसी संगठन का FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाने, रद्द होने या स्वयं वापस कर दिए जाने के बाद भी विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियाँ लंबे समय तक उसी संगठन के नियंत्रण में बनी रहती थीं। प्रस्तावित संशोधन के तहत ऐसी स्थिति में एक नामित प्राधिकरण इन परिसंपत्तियों की अस्थायी अभिरक्षा ले सकेगा। इसका उद्देश्य स्पष्ट है विदेशी धन से निर्मित संपत्तियाँ तब तक सुरक्षित और नियामकीय निगरानी में रहें, जब तक कानून उनके अंतिम निपटारे का निर्णय न कर दे।
विधेयक तथाकथित “लैप्स एंड कीप” (Lapse-and-Keep) व्यवस्था को भी समाप्त करता है, जिसके कारण कुछ संगठन केवल पंजीकरण समाप्त हो जाने के बावजूद विदेशी धन से अर्जित परिसंपत्तियों पर अनिश्चितकाल तक नियंत्रण बनाए रख सकते थे। साथ ही, यह प्रमुख पदाधिकारियों को विदेशी अंशदान के वैधानिक और पारदर्शी उपयोग के लिए व्यक्तिगत रूप से जवाबदेह भी बनाता है।जो संस्थाएँ विधिसम्मत अभिलेख रखती हैं और कानूनी प्रावधानों का पालन करती हैं, उनके लिए ये बदलाव अतिरिक्त बोझ नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में वित्तीय अनुशासन को मजबूत करने की दिशा में एक कदम हैं।



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