नन्हे कदमों ने थामा भोले का रास्ता, पीछे-पीछे चल पड़ीं मां और नानी

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Kanwar Yatra :  प्रशांत चौहान/ कांवड़ यात्रा में हर साल लाखों श्रद्धालु भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए निकलते हैं, लेकिन इस भीड़ के बीच एक परिवार अपनी अनोखी परंपरा के कारण अलग पहचान बना रहा है। यहां कांवड़ यात्रा की शुरुआत बड़ों की नहीं, बल्कि घर के सबसे छोटे बच्चों की जिद से होती है। भोलेनाथ के लिए हर साल जल लाने की उनकी इच्छा पूरे परिवार को एक साथ इस आस्था के सफर पर ले आती है। बच्चों के नन्हे कदम आगे बढ़ते हैं तो मां और नानी भी नंगे पांव उनके पीछे चल पड़ती हैं। वर्षों से निभाई…

Kanwar Yatra :  प्रशांत चौहान/ कांवड़ यात्रा में हर साल लाखों श्रद्धालु भोलेनाथ के जलाभिषेक के लिए निकलते हैं, लेकिन इस भीड़ के बीच एक परिवार अपनी अनोखी परंपरा के कारण अलग पहचान बना रहा है। यहां कांवड़ यात्रा की शुरुआत बड़ों की नहीं, बल्कि घर के सबसे छोटे बच्चों की जिद से होती है। भोलेनाथ के लिए हर साल जल लाने की उनकी इच्छा पूरे परिवार को एक साथ इस आस्था के सफर पर ले आती है। बच्चों के नन्हे कदम आगे बढ़ते हैं तो मां और नानी भी नंगे पांव उनके पीछे चल पड़ती हैं। वर्षों से निभाई जा रही यह परंपरा अब तीन पीढ़ियों को एक ही आस्था की डोर में बांध चुकी है। यह सिर्फ कांवड़ यात्रा नहीं, बल्कि संस्कार, विश्वास और पारिवारिक एकजुटता की ऐसी मिसाल है, जहां सबसे छोटे कदम पूरे परिवार का रास्ता तय करते हैं।

शाहदरा स्थित शंभूनाथ कांवड़ सेवा समिति के शिविर में ठहरीं करोल बाग निवासी 25 वर्षीय आशू अपने पांच बच्चों तमन्ना, वंश, वंशिका, दीपाली और तान्या के साथ कांवड़ यात्रा पर निकली हैं। आशू बताती हैं कि उनके सभी बच्चे जन्म से ही किसी न किसी रूप में कांवड़ यात्रा का हिस्सा रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी बेटी 11 वर्ष की है और इस बार वह अपनी 11वीं कांवड़ यात्रा कर रही है।।

आशू कहती हैं कि बच्चों के मन में भोलेनाथ के प्रति ऐसी श्रद्धा है कि यात्रा का समय आते ही वह खुद कांवड़ लाने की जिद करने लगते हैं। परिवार भी उनकी इस इच्छा को कभी नहीं टालता। यात्रा आसान नहीं होती। कई किलोमीटर तक नंगे पांव चलने से बच्चों के पैरों में दर्द होने लगता है। ऐसे में मां होने का फर्ज निभाते हुए आशू कभी उन्हें कंधों पर उठा लेती हैं तो कभी रास्ते में बिठाकर आराम कराती हैं। भूख लगने पर कभी शिविर में भोजन कराती हैं तो कभी बाहर से खाना खरीद कर खिलाती हैं। इसके बावजूद बच्चे पूरे रास्ते भोलेनाथ के भजनों पर झूमते-गाते आगे बढ़ते रहते हैं और थकान को अपने उत्साह पर हावी नहीं होने देते। आशू ने बताया कि वह पिछले 15 सालों से लगातार कांवड़ उठा रही हैं। शादी के बाद भी उन्होंने अपनी यह परंपरा नहीं छोड़ी। आज भी वह अपने पति, मां और अपने बच्चों के साथ कांवड़ यात्रा कर रही हैं।

बेटे-बेटियों से शुरू सफर, अब नाती-नातिनों पहुंचा

आशू की मां लक्ष्मी भी करीब 15 वर्षों से कांवड़ यात्रा कर रही हैं। वह बताती हैं कि पहले उन्होंने अपने बेटे-बेटियों के साथ यात्रा शुरू की थी और अब वही परंपरा नाती-नातिनों तक पहुंच गई है। वह हर साल स्कूल की छुट्टी कर कांवड़ लेने जाते हैं। उन्होंने बताया कि बच्चे पूरी यात्रा नाचते गाते ही पूरी कर लेते हैं। जब वह थक जाते हैं तो जहां जगह मिलती है। वहीं आराम कर लेती हैं।

उन्होंने बताया कि उन्होंने बच्चों से मना किया कि अगले वर्ष मत आना, लेकिन बच्चे नहीं माने और इस वर्ष भी कांवड़ उठाने के लिए निकल पड़े। उन्होंने बताया कि 30 जुलाई को उन्होंने दिल्ली से कांवड़ यात्रा शुरू की थी और कुछ दिन की यात्रा के बाद हरिद्वार पहुंच जल भरा और फिर दिल्ली की ओर वापस निकल पड़ी। करीब 225 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर दिल्ली पहुंच गई हैं।

Sumant Chaudhary